लेबनान की घटनायें मध्यपूर्व की सामरिक स्थिति में बदलाव को मजबूती से सामने लाती रही हैं। साथ ही ये सामने लाती रही हैं मयपूर्व में अमेरिकी प्रशासन के प्रयासों की विफलता। 2006 में इजराईल द्वारा लेबनान पर हमले को नये मयपूर्व की प्रसव वेदना बताने वाली अमेरिकी विदेश सचिव हिजबुल्ला के हाथों इजराईल की पराजय के बाद युद्धविराम के प्रयासों का समर्थन करती नजर आईं। 2006 के इजराईल–हिजबुल्ला युद्ध ने अपनी इच्छा का नया मयपूर्व बनाने के अमेरिकी प्रयासों को करारा झटका दिया। इराकी जनता के गौरवपूर्ण राष्ट्रीय युद्ध की पृष्ठभूमि में इजराईल के खिलाफ हिजबुल्ला की सफलता ने अमेरिकी साम्राज्यवाद की ताकत की सीमा को विश्व जनता के सामने नंगा कर दिया। नया मध्यपूर्व बनाना तो दूर, अमेरिका को पुराना मध्यपूर्व बचाने के लिए जुटना पड़ा। Keep reading →
April 30, 2008
नई आर्थिक नीतियां और बढ़ता खाद्य संकट – आशीष
बढ़ते खाद्य संकट तथा बढ़ती कीमतों की मुख्य दोषी केन्द्र व राज्य सरकारों द्वारा लागू की जा रही नयी आर्थिक नीतियां ही है, भले ही शासक दल इस दोष को अन्यथा मोड़ने का प्रयास करें। सरकारी आंकड़े स्वयं इसका सबूत है।
वित्तमंत्री श्री चिदम्बरम ने बेशर्मी से इस महंगाई के लिए अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में गेहूँ की बढ़ी हुई कीमत 2200 रुपये कुन्तल पर दोष मढ़ा है और बजट भाषण में कहा कि अन्तर्राष्ट्रीय बाजारों में गेहूँ के दाम 88 फीसदी बढ़ गये है और चावल के दाम 15 फीसदी। वास्तव में उन्हें सबसे पहले इस बात का जवाब देना चाहिए था कि क्यों भारत जैसा कृषि प्रधान देश गेहूँ के लिए विदेशों से आयात पर निर्भर हो गया जबकि भारत को अनाज का निर्यातक होना चाहिये। विश्व व्यापार संगठन व विश्व बैंक के निर्देशों पर लागू की जा रही नयी आर्थिक नीति इसकी अनुमति नहीं देती। वे भारत में खेती को और असुरक्षित बनाना चाहते है। इससे किसानों की जमीन से बेदखली तेजी से होगी तथा साम्राज्यवादियों व दलाल शासक वर्गों द्वारा प्राकृतिक संसाधनों तथा सस्ते श्रम का शोषण तेज हो सकेगा।
एक ओर लोग बेरोजगार और भूखे है, दूसरी ओर सरकार उनकी खेती की जमीनें बड़े पैमाने पर व्यावसायिक एवं कारपोरेट गिद्धों को विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाने, उद्योग लगाने, शहरी आवास योजनाओं, व्यावसायिक इलाकों का निर्माण करने, गंगा एक्सप्रेस–वे जैसी योजनाएं लागू करने तथा खेती में व्यावसायिक खेती व बायोडीजल के लिए कारपोरेट फार्मिंग कराने के लिए दे रही है। इन जमीनों को ये घराने सस्ते दाम पर खरीदकर, मूल्य वृद्धि का लाभ उठाकर महंगा बेचकर भारी मुनाफा कमाते है जिसे भारत सरकार विकास दर में वृद्धि गिनती है।
यही नहीं, उपरोक्त सभी कामों के लिए सरकार उद्योगपतियों को करों में भारी छूट दे रही है। इन्हें सफल करने के लिए सरकार का व बकों का पैसा लगा रही है, जबकि खेती की लागत के तमाम सामानों, विशेषकर डीजल, आदि पर भारी कर लागू है और अन्य सुविधाओं में कोई छूट नहीं है। आर्थिक संकट के नाम पर खाद पर सब्सिडी, राशन व्यवस्था, खाद्य सुरक्षा आदि पर से सरकारी खर्च लगातार घटाया जा रहा है। परिणाम यह है कि अनाज का उत्पादन बढ़ना बंद हो गया है और अनाज पैदा करने वाला क्षेत्राफल लगातार घट रहा है। Keep reading →
April 29, 2008
बढ़ती महंगाई, सरकार व शासक पार्टियां
बजट भाषण में वित्तमंत्री चिदम्बरम ने स्वीकार किया था कि महंगाई की दर बढ़ने वाली है जब उन्होंने विश्व बाजार में खाद्य फसलों की बढ़ती कीमतों का जिक्र किया था। इस भाषण से यह संकेत मिला कि भारत सरकार महंगाई को `विश्व संकट‘ के नाम लिख खुद को बचाने की तैयारी में है।
पिछले एक माह में तीव्र गति से महंगाई दर 7.4 प्रतिशत तक पहुंच गयी और सरकार ने `विश्व महंगाई‘ तथा `हम महंगाई आयात कर रहे हैं‘ (कपिल सिब्बल, केन्द्रीय विज्ञान मंत्री) का ढिंढोरा पीटना शुरू किया। परन्तु, सरकारें जितना भी चाहें, जनता यह बात आसानी से समझ रही है कि सरकारों की नीतियां ही भारत को दुनिया भर में खाद्य फसलों की कमी का शिकार बना रही हैं तथा चौतरफे रूप से महंगाई बढ़ा रही हैं।
विश्व बाजार में जो भी चल रहा है, भारत में खाद्य फसलों की उपलब्धि के संकट का सीधा रिश्ता कृषि नीतियों से है। वैश्वीकरण के दौर में ठोस समझ रही है किसानों को खेती से हटाकर अन्य ग्रामीण कार्यों से जोड़ना है। इसी के अनुकूल तमाम नीतियां बनीं। बढ़ते आयात को मदद देने के लिए भारत में सार्वजनिक क्षेत्रा में खाद की कम्पनियां बंद कर दी गयीं। विश्व व्यापार संगठन की शर्तों के तहत गेहूं का आयात (कम से कम 3 प्रतिशत) शुरू हुआ, किसानों को हमारे जैसे देशों में दी जा रही सब्सिडी सहायता बंद की गई जबकि साम्राज्यवादी देशों में यह कायम रही, मंडियों में निजी कम्पनियों व बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिए रास्ते खोल दिये गये, सरकारों द्वारा किसानों को दिया जा रहा न्यूनतम समर्थन मूल्य (एम.एस.पी.) लागत से कम रखी गई, राशन व्यवस्था इतनी संकुचित कर दी गई कि वह अप्रभावी हो गई, देश में खाद्य तेलों के उत्पादन को बहुत कम कर दिया गया ताकि आयात के रास्ते खुलें आदि। 1995 में विश्व व्यापार संगठन में भारत को शामिल करने के विरोधो के दौरान जितने सवाल उठाये गये थे वे तमाम अब सच्चाई के रूप में सामने आ रहे हैं। ये साम्राज्यवाद–परस्त नीतियां ही भारत में मौजूदा कमरतोड़ महंगाई के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं; विश्व संकट का असर दूसरी बात है और अगर `महंगाई आयात हो रही है‘ तो यह इसलिए कि शासक ऐसा चाहते हैं। Keep reading →
April 20, 2008
बी.सी.सी.एल (धनबाद) – कोयला मजदूरों का सफल संघर्ष
इफ्टू से संबंधित झारखण्ड माइंस लाल झण्डा यूनियन के नेतृत्व में भारत कोकिंग कोल लि., धनबाद में पीस–रेट मजदूरों ने एक वर्ष के अंतराल में पुन: एक बार सफल संघर्ष किया। ज्ञात हो कि जुलाई 2005 में सम्पन्न एवं 1.7.2001 से लागू सातवें राष्ट्रीय कोयला वेतन समझौते के अंतर्गत पीस–रेटेड मजदूरों के साथ भेदभाव हुआ था एवं सभी मजदूरों के लिए निर्धारित रु. 1185 प्रतिमाह के निश्चित लाभ से कम वेतन बढोत्री उन्हें मिली थी। इफ्टू यूनियन द्वारा पीस–रेट मजदूर संघर्ष कमेटी गठित कर दो वर्ष तक संघर्ष चलाया गया था जिसके फलस्वरूप श्रम विभाग में 27 जून, 2007 को त्रिपक्षीय समझौता हुआ कि इस कमी को पूरा करने के लिए वेतन में आवश्यक बढोत्री की जायेगी। तदानुसार अगले माह जुलाई 2007 से पीस–रेट मजदूरों को 50 रु. से 500 रु. प्रतिमाह की वेतन बढोत्री का भुगतान भी शुरू हो गया।
कोयला उद्योग में केन्द्र सरकार द्वारा वेतन समझौते का एकाधिकार केवल पांच मान्यताप्राप्त यूनियनों (इंटक, बी.एम.एस., एच.एम.एस., एटक, सीटू) को दिया गया है इसलिए उनके वेतन समझौते को मजदूरों द्वारा बदलवाने से उनका चिंतित होना स्वाभाविक था। इनमें से कुछ ने भ्रामक प्रचार कर इसका श्रेय खुद लेने का प्रयास किया और दूसरी तरफ प्रबन्धन के समक्ष सवाल खड़ा किया कि इफ्टू यूनियन के साथ समझौता कैसे किया गया ।
तदानुसार प्रबन्धन का सुर भी बदलने लगा। कंपनी के 17,000 पीस–रेट मजदूरों के 01.07.’01 से 30.06.’07 के 72 महीनों के इस वेतन बढोत्री के करीब 20 करोड़ रुपये के एरियर के भुगतान में आनाकनी करना प्रबन्धन ने शुरू कर दिया। पहले उसने श्रम विभाग को इस आशय का पत्र लिखा कि राष्ट्रीय कोयला वेतन समझौता से संबंधित इस मामले पर गैर–मान्यताप्राप्त यूनियन के साथ कोई समझौता करना ही गलत था। फिर कंपनी का घाटा, पैसे की कमी इत्यादि बहाने बनाकर टालमटोल करने लगा जिससे ऊब कर मजदूरों ने पुन: संघर्ष करने का निर्णय लिया। Keep reading →
April 10, 2008
कम्युनिस्ट क्रांतिकारी बुद्धिजीवी का. राजेन्द्र षडंगी को लाल सलाम!
प्रखर कम्युनिस्ट क्रांतिकारी बुद्धिजीवी, कृषि पर साम्राज्यवादी हमले के प्रबल विरोधी तथा जबरन विस्थापन के विरुद्ध जन संघर्षों की राष्ट्रीय स्तर पर उभरती आवाज का. राजेन्द्र षडंगी का 27 मार्च, 2008 को भुवनेश्वर में निधन हो गया। वे 48 वर्ष के थे।
का. राजेन्द्र का जन्म 15 जून, 1960 को उड़ीसा के खोरदा जिले के नारिसो गांव में हुआ था। पारिसो के प्राथमिक स्कूल में प्राथमिक शिक्षा पाने के बाद उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा भुवनेश्वर के सैनिक स्कूल में प्राप्त की। कटक के राविन्शा कॉलिज से विज्ञान में स्नातक शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने उत्कल विश्वविद्यालय वाणी विहार से सांख्यिकी में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त की। तदोपरांत उन्होंने कोलकाता स्थित भारतीय सांख्यिकी संस्थान से आपरेशनल प्रबन्धन तथा गुणवत्ता नियंत्राण में स्नातकोत्तर डिप्लोमा प्राप्त किया।
शिक्षा पूरी करने के बाद 1983 में का. राजेन्द्र नेशनल डेयरी डवलैपमेंट बोर्ड, आनन्द में अधिकारी के रूप में नियुक्त हुए तथा वरिष्ठ अधिकारी के पद पर पदोत हुए। खाद्य तेलों के क्षेत्रा में एन.डी.डी.बी. के हस्तक्षेप के साथ एन.डी.बी.बी. ने उन्हें आयल उड़ीसा भेजा तथा उन्होंने उड़ीसा सरकार के उपक्रम पश्चिम उड़ीसा सहकारी तेल बीज निगम के प्रबंध निदेशक का कार्यभार संभाला। वहां बार–बार अन्य निदेशकों से उनका टकराव हुआ। साथ ही, नरसिंह राव–मनमोहन सिंह की नई आर्थिक नीतियों के दौर में सरकार की नीति खाद्य तेलों के घरेलू उत्पादन के खिलाफ रही। इसके चलते उन्होंने निगम के प्रबंध निदेशक पद से इस्तीफा दे दिया।
1999 में उड़ीसा के तटीय क्षेत्रो पर महाचक्रवात के विनाश के बाद राहत–कार्यों में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभायी। इन राहत–कार्यों के दौरान अनेक बुद्धिजीवियों से उनके संबंध स्थापित हुए जो बाद के वर्षों में भी उनके सक्रिय सहयोगी रहे। इन्होनें मिलकर लोकपख्य की स्थापना की तथा का. राजेन्द्र इसके संयोजक रहे। काशीपुर में उत्कल एल्यूमिना से विस्थापित आदिवासियों पर दमन के खिलाफ विरोध में उन्होंने सक्रिय हिस्सेदारी की।
महाचक्रवात पर राहत–कार्यों के बाद वे जनता के मुद्दों पर संघर्षों में जुट गये। Keep reading →
April 5, 2008
पोस्को के विरुद्ध जुझारु प्रदर्शन
बहुराष्ट्रीय कम्पनी पोस्को के प्रबंधकों तथा नवीन पटनायक सरकार ने बड़े जोर–शोर से प्रचार किया था कि 1 अप्रैल को पोस्को स्टील प्लांट का शिलान्यास किया जायेगा। उड़ीसा प्रांत के स्थापना दिवस 1 अप्रैल को उन्होंने उड़ीसा की प्राकृतिक संपदा की लूट के प्रतीक पोस्को स्टील प्लांट की स्थापना के लिए चुना। बहुराष्ट्रीय कम्पनी तथा उसके दलाल राजनेताओं की चुनौती को स्वीकार करते हुए पोस्को प्रतिरोध संग्राम समिति तथा प्रदेश के विस्थापन–विरोधी जनान्दोलनों व राजनैतिक संगठनों ने इसके विरुद्ध एक व्यापक जन समावेश की घोषणा की। विकल्प जन समावेश के लिए बालीतूठा को चुना गया जहां 29 नवम्बर, 2007 को पोस्को समर्थक बीजद नेता दामोदर राउत के गुंडों ने पुलिस के सहयोग से पोस्को–विरोधी आन्दोलनकारियों पर सशस्त्रा हमला किया था। पोस्को समर्थक गुंडावाहिनी, पुलिस तथा राजनेताओं को चुनौती देते हुए संघर्षशील जनता ने उन्हें पीछे धकेलने का निर्णय ले लिया।
क्षेत्र की पोस्को–विरोधी किसान जनता के दृढ़ निश्चय तथा प्रदेश व देश भर के जनवादी व क्रांतिकारी शक्तियों से मिलने वाले समर्थन को देखते हुए पोस्को तथा उसके अनुगामी नवीन सरकार ने 1 अप्रैल के कार्यक्रम को स्थगित करने की घोषणा कर दी। इसका मकसद पोस्को–विरोधियों के 1 अप्रैल के कार्यक्रम को महत्वहीन बनाना था। पोस्को तथा उड़ीसा सरकार की इस चाल को समझते हुए पोस्को प्रतिरोध संग्राम समिति तथा समर्थक संगठनों ने 1 अप्रैल के विकल्प समावेश को और जोर–शोर से आयोजित करने की घोषणा की। सरकार ने कार्यक्रम को विफल करने के लिए क्षेत्र में निषेधाज्ञा लागू कर दी।
सरकारी प्रचार तथा प्रशासन के प्रयास विफल करते हुए हजारों–हजार की संख्या में जनता बालीतूठा पहुंची। कलिंगनगर, गंजाम, कालाहांडी तथा अन्य क्षेत्रो से आये हजार से अधिक कार्यकर्ता ढिनकिया, नुआगांव व गढ़कुजंग के हजारों लोगों के साथ बालीतूठा गये। इस विशाल समावेश ने पुलिस द्वारा लगाये गये बांस के अवरोधों को तहस–नहस कर दिया तथा संघर्षशील जनता ने पुलिस को पीछे हटने को बाध्य किया। जिस स्थान पर 29 नवम्बर को पोस्को समर्थक गुंडों ने संघर्षशील जनता पर हमला किया था तथा बड़ी संख्या में महिलाओं व बच्चों को घायल किया था, उसी स्थान से जनता ने पोस्को, उसके गुंडों तथा पोस्को समर्थक सरकार के खिलाफ संघर्ष तेज करने का ऐलान किया।
बालीतूठा में विकल्प समावेश को संबोधित करते हुए पोस्को प्रतिरोध संग्राम समिति के नेता अभय साहू ने सर्वप्रथम लोकपख्य के संयोजक क्रांतिकारी बुद्धिजीवी का. राजेन्द्र षडंगी को श्रद्धांजलि दी जिन्होंने 1 अप्रैल के इस कार्यक्रम को आयोजित करने के लिए अथक प्रयास किया था तथा जिसकी सफलता में उनका बड़ा योगदान है। अभय साहू ने कहा कि उड़ीसा सरकार द्वारा पोस्को–स्थापना को उत्कल दिवस के साथ जोड़ने के प्रयास को विफल कर दिया गया है। निषेधाज्ञा का उल्लंघन कर विकल्प समावेश की सफलता इस बात का स्पष्ट चिन्ह है कि पोस्को को क्षेत्र से भगा दिया गया है। साथ ही उन्होंने चेतावनी दी कि यदि राज्य सरकार पोस्को योजना स्थापित करने के प्रयास जारी रखेगी तो संघर्ष भी कई गुना तेज किया जायेगा।
विकल्प समावेश को संबोधित करने वालों में अन्य विस्थापन–विरोधी आन्दोलनों के नेता तथा इन आन्दोलनों का समर्थन करने वाले नेता शामिल थे जिन्होंने पोस्को के खिलाफ संघर्ष का समर्थन करने के साथ पोस्को योजना को रद्द किये जाने की मांग की। 1 अप्रैल के विकल्प समावेश ने आन्दोलन को बल प्रदान किया है तथा पोस्को समर्थकों व राज्य सरकार के सामने गंभीर चुनौती पेश की है।
April 2, 2008
सासाराम (बिहार) – जन–विरोधी नीतियों के खिलाफ रैली
बिहार की नितीश–मोदी सरकार के ढाई साल के शासन की किसान–मजदूर–विरोधी नीतियों का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देने लगा है। भूमि सुधारों के संदर्भ में गठित बंदोपायाय आयोग की रिपोर्ट को सरकार ने ठंडे बस्ते में डाल रखा है। जन वितरण प्रणाली से प्राप्त होने वाले अनाज एवं केरोसीन तेल की मात्रा लगातार घटाई जा रही है। जहां गरीबी रेखा से नीचे (बी.पी.एल.) के लोगों के लिए 45 किलो अनाज को घटाकर 25 किलो कर दिया गया है, वहीं केरोसीन तेल की मात्रा 4 लीटर से घटाकर ग्रामीण क्षेत्रो में 3 लीटर तथा शहरी क्षेत्रो में ढाई लीटर कर दी गई है। कुल मिलाकर जन कल्याण की योजनाओं में बड़े पैमाने पर कटौती की जा रही है। किसानों के लिए सिंचाई के साधनों का प्रबंध तो दूर की बात है, पुराने साधनों की मरम्मत व देखरेख भी नहीं की जा रही है। सोन कमांड की नहरों की हालत जीर्ण–शीर्ण है तथा 30 सालों से अधिक समय से दुर्गावती जलाशय परियोजना आधी–आधूरी लटकी हुई है। कैमूर की तराई में लगातार सूखे जैसी स्थिति बनी हुई है। पूरे रोहतास जिले में, यहां तक कि सासाराम, विक्रमगंज, डेहरी जैसे शहरों में भी बिजली–पानी का तीव्र संकट है। बिजली कनेक्शन का काम बड़े माफियाओं को सौंपा गया है। सरकारी अस्पतालों का प्रबंध भी सरकार ने पिछले कुछ समय से बड़े ठेकेदारों को सौंप दिया है। खाद की आपूर्ति के मामले में लगान–रसीद को आवश्यक बनाकर सरकार ने गरीब किसानों तथा बटाईदारों की खेती को चौपट कर दिया है। इससे धान की फसल काफी प्रभावित हुई है। नितीश–मोदी सरकार ने सुशासन के नाम पर नौकरशाही केन्द्रित शासन को मजबूत किया तथा जनता के आन्दोलनों को कुचलने के लिए पुलिस द्वारा बर्बर सामूहिक दमन किया गया। नौकरशाह, पुलिसतंत्र को मजबूत करना ही नितीश–मोदी की सरकार के शासन की मुख्य उपलब्धि रही है। Keep reading →
April 2, 2008
कलिंगनगर तथा पोस्को–विरोधी आंदोलन : कारपोरेट द्वारा कुचलने की कोशिशें
(का. राजेन्द्र षडंगी ने कलिंगनगर तथा पोस्को–विरोधी आंदोलनों के समक्ष मौजूदा चुनौतियों के बारे में एक पत्र 20 मार्च को देश भर में भेजा था।हम यहां उक्त पत्र का संक्षिप्त अनुवाद प्रकाशित कर रहे ह। – संपादक)
13 मार्च, 2008 को टाटा के गुंडों ने कलिंगनगर आन्दोलन के कार्यकर्ता जोगेन जमुदा पर दिनदहाड़े गोली चलाई। 19 मार्च को विश्वस्त सूत्रो से जानकारी मिली कि टाटा की जाजपुर रोड स्थित इकाई में प्राइवेट सुरक्षाकर्मी के रूप में लगभग 70 सशस्त्रा गुंडे ठहरे हुए हैं। यह स्थान कलिंगनगर से पांच किलोमीटर दूर है। 29 नवम्बर, 2007 को पोस्को के गुंडों ने बालीतुठा में पोस्को स्टील प्लांट का विरोध कर रहे लोगों पर बमों से हमला किया। पोस्को के दबाव में प्रशासन ने ढाई साल से रूके सर्वे कार्य को भारी पुलिस बंदोबस्त के बीच शुरू कराया। ये अलग–थलग घटनायें नहीं हैं बल्कि बड़ी कम्पनियों की नई कार्ययोजना है। पुलिस व प्रशासन द्वारा विस्थापन, सेज, जन–विरोधी औद्योगिकरण व भूमि अधिग्रहण के खिलाफ जनता के संघर्ष को दमन के जरिये कुचलने की खबरें आती रही हैं। 2 जनवरी, 2006 को कलिंगनगर में पुलिस की गोलियों से 14 लोगों की शहादत अभी भी ताजा है। बिड़ला द्वारा बॉक्साईट खनन का विरोध कर रहे काशीपुर के आदिवासियों पर पुलिस गोलीबारी में तीन की हत्या तथा टाटा द्वारा चिल्का झील पर कब्जे के विरोध में पांच लोगों की हत्या उल्लेखनीय है। इन घटनाओं की जनवादी ताकतों व बुद्धिजीवियों ने व्यापक विरोध किया। लगता है अब कारपोरेट केवल सरकार पर निर्भर रहने की जगह विरोध को कुचलने में खुद भी आगे आ रहे हैं तथा सरकार कारपोरेट की गुंडा वाहिनी को वैधता प्रदान कर रही है। इस प्रकार विरोध का दमन करने के लिए सरकार व कारपोरेट मिलकर प्रयासरत हैं। Keep reading →
April 2, 2008
बोकारो (झारखण्ड) – बी.एस.एल. विस्थापितों का संघर्ष
झारखण्ड स्थित सार्वजनिक क्षेत्र के बोकारो स्टील प्लांट (बी.एस.एल.) के विस्थापितों का संघर्ष फिर भड़क उठा है। विस्थापन क्षेत्र के बदराटाण्ड गांव में बी.एस.एल. प्रबन्धन बाउंड्री दीवार बनाना चाह रहा था जिसका विस्थापित विरोध कर रहे थे। 6 मार्च, ‘08 को प्रशासन भारी पुलिस बल के साथ पहुंचा और आंसू गैस, लाठियों व रबड़ की गोलियों से विस्थापितों पर हमला किया जिसमें कई को गंभीर चोटें आईं। विस्थापितों के कार्यालय का झण्डा फाड़ दिया गया, कार्यालय का सामान लूट लिया गया व कई मोटरसाइकिलों व साइकिलों को गाड़ी से कुचल दिया गया। इस दमन के विरोध में अगले दिन 7 मार्च को बोकारो बंद का आवाह्न किया गया जिसे जनता का व्यापक समर्थन मिला। बंद के दौरान आक्रोशित जनता ने लाठियां भांजते पुलिस को कई जगह मुंहतोड़ जवाब दिया जिसमें दो पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हुए। विस्थापितों के व्यापक रोष को देखते हुए प्रबन्धन ने दीवार का निर्माण रोक दिया। विस्थापितों ने थोड़ी दूरी तक जो दीवार बनी थी उसे तोड़ डाला। Keep reading →
April 1, 2008
शहीद भगत सिंह तथा समकालीन कम्युनिस्ट आंदोलन–२ – एस. एस. महल
भगत सिंह के राजनैतिक रूप से सक्रिय होने के समय रूस में सर्वहारा क्रांति विजयी हो चुकी थी तथा लेनिन के नेतृत्व में कम्युनिस्ट इंटरनेशनल स्थापित की जा चुकी थी। 1922 में कोमिन्टर्न ने उपनिवेशों में क्रांति के सम्बंध में लेनिन की थीसिस ग्रहण की थी जिसमें उपनिवेशों में साम्राज्यवाद–विरोधी संघर्षों का समर्थन किया गया था। इस प्रक्रिया में सोवियत क्रांति उपनिवेशों के संघर्ष पर गहरा प्रभाव डाल रही थी। इसी समय भारतीय मुस्लिमों में काफी युवक खलीफा की रक्षा के लिए तुर्की की ओर चले। इनमें से अनेक तुर्की तो नहीं पहुंच पाये पर ताशकंद होते हुए मास्को पहुंच गये जहां सुदूर पूर्व के मेहनतकशों के विश्वविद्यालय में उन्होंने शिक्षा ग्रहण की तथा कम्युनिस्ट बनकर भारत लौटे। गदर पार्टी के कुछ अनुयायी भी भारत में विद्रोह करने के असफल प्रयास के बाद राजनैतिक –विचारधारात्मक प्रशिक्षण के लिए रूस पहुंचे और कम्युनिस्ट बनकर लौटे। अनेक अन्य प्रवासी भारतीय भी रुसी क्रांति से काफी प्रभावित थे जिनमें एम.एन. रॉय प्रमुख थे जिन्होंने कम्युनिस्ट इंटरनेशलन में हिस्सेदारी की। साथ ही क्रांतिकारी आन्दोलन के अनेक नेता व कार्यकर्ता भी माक्र्सवादी बने। इस प्रकार सोवियत क्रांति के प्रभाव में कम्युनिस्ट पार्टी के निर्माण का आधार तैयार हुआ। उस स्थिति में कम्युनिस्ट बनने वाले भगत सिंह अकेले नहीं थे। अत: कम्युनिस्ट के रूप में भगत सिंह के विकास को तत्कालीन कम्युनिस्ट आंदोलन की पृष्ठभूमि तथा संघर्ष के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। Keep reading →