April 30, 2008

नई आर्थिक नीतियां और बढ़ता खाद्य संकट - आशीष

बढ़ते खाद्य संकट तथा बढ़ती कीमतों की मुख्य दोषी केन्द्र राज्य सरकारों द्वारा लागू की जा रही नयी आर्थिक नीतियां ही है, भले ही शासक दल इस दोष को अन्यथा मोड़ने का प्रयास करें। सरकारी आंकड़े स्वयं इसका सबूत है।
वित्तमंत्री श्री चिदम्बरम ने बेशर्मी से इस महंगाई के लिए अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में गेहूँ की बढ़ी हुई कीमत 2200 रुपये कुन्तल पर दोष मढ़ा है और बजट भाषण में कहा कि अन्तर्राष्ट्रीय बाजारों में गेहूँ के दाम 88 फीसदी बढ़ गये है और चावल के दाम 15 फीसदी। वास्तव में उन्हें सबसे पहले इस बात का जवाब देना चाहिए था कि क्यों भारत जैसा कृषि प्रधान देश गेहूँ के लिए विदेशों से आयात पर निर्भर हो गया जबकि भारत को अनाज का निर्यातक होना चाहिये। विश्व व्यापार संगठन विश्व बैंक के निर्देशों पर लागू की जा रही नयी आर्थिक नीति इसकी अनुमति नहीं देती। वे भारत में खेती को और असुरक्षित बनाना चाहते है। इससे किसानों की जमीन से बेदखली तेजी से होगी तथा साम्राज्यवादियों दलाल शासक वर्गों द्वारा प्राकृतिक संसाधनों तथा सस्ते श्रम का शोषण तेज हो सकेगा।

एक ओर लोग बेरोजगार और भूखे है, दूसरी ओर सरकार उनकी खेती की जमीनें बड़े पैमाने पर व्यावसायिक एवं कारपोरेट गिद्धों को विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाने, उद्योग लगाने, शहरी आवास योजनाओं, व्यावसायिक इलाकों का निर्माण करने, गंगा एक्सप्रेसवे जैसी योजनाएं लागू करने तथा खेती में व्यावसायिक खेती बायोडीजल के लिए कारपोरेट फार्मिंग कराने के लिए दे रही है। इन जमीनों को ये घराने सस्ते दाम पर खरीदकर, मूल्य वृद्धि का लाभ उठाकर महंगा बेचकर भारी मुनाफा कमाते है जिसे भारत सरकार विकास दर में वृद्धि गिनती है।

यही नहीं, उपरोक्त सभी कामों के लिए सरकार उद्योगपतियों को करों में भारी छूट दे रही है। इन्हें सफल करने के लिए सरकार का बकों का पैसा लगा रही है, जबकि खेती की लागत के तमाम सामानों, विशेषकर डीजल, आदि पर भारी कर लागू है और अन्य सुविधाओं में कोई छूट नहीं है। आर्थिक संकट के नाम पर खाद पर सब्सिडी, राशन व्यवस्था, खाद्य सुरक्षा आदि पर से सरकारी खर्च लगातार घटाया जा रहा है। परिणाम यह है कि अनाज का उत्पादन बढ़ना बंद हो गया है और अनाज पैदा करने वाला क्षेत्राफल लगातार घट रहा है। Keep reading →

April 29, 2008

बढ़ती महंगाई, सरकार व शासक पार्टियां

बजट भाषण में वित्तमंत्री चिदम्बरम ने स्वीकार किया था कि महंगाई की दर बढ़ने वाली है जब उन्होंने विश्व बाजार में खाद्य फसलों की बढ़ती कीमतों का जिक्र किया था। इस भाषण से यह संकेत मिला कि भारत सरकार महंगाई को `विश्व संकटके नाम लिख खुद को बचाने की तैयारी में है।

पिछले एक माह में तीव्र गति से महंगाई दर 7.4 प्रतिशत तक पहुंच गयी और सरकार ने `विश्व महंगाईतथा `हम महंगाई आयात कर रहे हैं‘ (कपिल सिब्बल, केन्द्रीय विज्ञान मंत्री) का ढिंढोरा पीटना शुरू किया। परन्तु, सरकारें जितना भी चाहें, जनता यह बात आसानी से समझ रही है कि सरकारों की नीतियां ही भारत को दुनिया भर में खाद्य फसलों की कमी का शिकार बना रही हैं तथा चौतरफे रूप से महंगाई बढ़ा रही हैं।

विश्व बाजार में जो भी चल रहा है, भारत में खाद्य फसलों की उपलब्धि के संकट का सीधा रिश्ता कृषि नीतियों से है। वैश्वीकरण के दौर में ठोस समझ रही है किसानों को खेती से हटाकर अन्य ग्रामीण कार्यों से जोड़ना है। इसी के अनुकूल तमाम नीतियां बनीं। बढ़ते आयात को मदद देने के लिए भारत में सार्वजनिक क्षेत्रा में खाद की कम्पनियां बंद कर दी गयीं। विश्व व्यापार संगठन की शर्तों के तहत गेहूं का आयात (कम से कम 3 प्रतिशत) शुरू हुआ, किसानों को हमारे जैसे देशों में दी जा रही सब्सिडी सहायता बंद की गई जबकि साम्राज्यवादी देशों में यह कायम रही, मंडियों में निजी कम्पनियों बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिए रास्ते खोल दिये गये, सरकारों द्वारा किसानों को दिया जा रहा न्यूनतम समर्थन मूल्य (एम.एस.पी.) लागत से कम रखी गई, राशन व्यवस्था इतनी संकुचित कर दी गई कि वह अप्रभावी हो गई, देश में खाद्य तेलों के उत्पादन को बहुत कम कर दिया गया ताकि आयात के रास्ते खुलें आदि। 1995 में विश्व व्यापार संगठन में भारत को शामिल करने के विरोधो के दौरान जितने सवाल उठाये गये थे वे तमाम अब सच्चाई के रूप में सामने रहे हैं। ये साम्राज्यवादपरस्त नीतियां ही भारत में मौजूदा कमरतोड़ महंगाई के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं; विश्व संकट का असर दूसरी बात है और अगर `महंगाई आयात हो रही हैतो यह इसलिए कि शासक ऐसा चाहते हैं। Keep reading →

April 20, 2008

बी.सी.सी.एल (धनबाद) - कोयला मजदूरों का सफल संघर्ष

इफ्टू से संबंधित झारखण्ड माइंस लाल झण्डा यूनियन के नेतृत्व में भारत कोकिंग कोल लि., धनबाद में पीसरेट मजदूरों ने एक वर्ष के अंतराल में पुन: एक बार सफल संघर्ष किया। ज्ञात हो कि जुलाई 2005 में सम्पन्न एवं 1.7.2001 से लागू सातवें राष्ट्रीय कोयला वेतन समझौते के अंतर्गत पीसरेटेड मजदूरों के साथ भेदभाव हुआ था एवं सभी मजदूरों के लिए निर्धारित रु. 1185 प्रतिमाह के निश्चित लाभ से कम वेतन बढोत्री उन्हें मिली थी। इफ्टू यूनियन द्वारा पीसरेट मजदूर संघर्ष कमेटी गठित कर दो वर्ष तक संघर्ष चलाया गया था जिसके फलस्वरूप श्रम विभाग में 27 जून, 2007 को त्रिपक्षीय समझौता हुआ कि इस कमी को पूरा करने के लिए वेतन में आवश्यक बढोत्री की जायेगी। तदानुसार अगले माह जुलाई 2007 से पीसरेट मजदूरों को 50 रु. से 500 रु. प्रतिमाह की वेतन बढोत्री का भुगतान भी शुरू हो गया।

कोयला उद्योग में केन्द्र सरकार द्वारा वेतन समझौते का एकाधिकार केवल पांच मान्यताप्राप्त यूनियनों (इंटक, बी.एम.एस., एच.एम.एस., एटक, सीटू) को दिया गया है इसलिए उनके वेतन समझौते को मजदूरों द्वारा बदलवाने से उनका चिंतित होना स्वाभाविक था। इनमें से कुछ ने भ्रामक प्रचार कर इसका श्रेय खुद लेने का प्रयास किया और दूसरी तरफ प्रबन्धन के समक्ष सवाल खड़ा किया कि इफ्टू यूनियन के साथ समझौता कैसे किया गया ।

तदानुसार प्रबन्धन का सुर भी बदलने लगा। कंपनी के 17,000 पीसरेट मजदूरों के 01.07.’01 से 30.06.’07 के 72 महीनों के इस वेतन बढोत्री के करीब 20 करोड़ रुपये के एरियर के भुगतान में आनाकनी करना प्रबन्धन ने शुरू कर दिया। पहले उसने श्रम विभाग को इस आशय का पत्र लिखा कि राष्ट्रीय कोयला वेतन समझौता से संबंधित इस मामले पर गैरमान्यताप्राप्त यूनियन के साथ कोई समझौता करना ही गलत था। फिर कंपनी का घाटा, पैसे की कमी इत्यादि बहाने बनाकर टालमटोल करने लगा जिससे ऊब कर मजदूरों ने पुन: संघर्ष करने का निर्णय लिया। Keep reading →

April 10, 2008

कम्युनिस्ट क्रांतिकारी बु‌द्धिजीवी का. राजेन्द्र षडंगी को लाल सलाम!

प्रखर कम्युनिस्ट क्रांतिकारी बुद्धिजीवी, कृषि पर साम्राज्यवादी हमले के प्रबल विरोधी तथा जबरन विस्थापन के विरुद्ध जन संघर्षों की राष्ट्रीय स्तर पर उभरती आवाज का. राजेन्द्र षडंगी का 27 मार्च, 2008 को भुवनेश्वर में निधन हो गया। वे 48 वर्ष के थे।

का. राजेन्द्र का जन्म 15 जून, 1960 को उड़ीसा के खोरदा जिले के नारिसो गांव में हुआ था। पारिसो के प्राथमिक स्कूल में प्राथमिक शिक्षा पाने के बाद उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा भुवनेश्वर के सैनिक स्कूल में प्राप्त की। कटक के राविन्शा कॉलिज से विज्ञान में स्नातक शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने उत्कल विश्वविद्यालय वाणी विहार से सांख्यिकी में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त की। तदोपरांत उन्होंने कोलकाता स्थित भारतीय सांख्यिकी संस्थान से आपरेशनल प्रबन्धन तथा गुणवत्ता नियंत्राण में स्नातकोत्तर डिप्लोमा प्राप्त किया।

शिक्षा पूरी करने के बाद 1983 में का. राजेन्द्र नेशनल डेयरी डवलैपमेंट बोर्ड, आनन्द में धिकारी के रूप में नियुक्त हुए तथा वरिष्ठ धिकारी के पद पर पदोत हुए। खाद्य तेलों के क्षेत्रा में एन.डी.डी.बी. के हस्तक्षेप के साथ एन.डी.बी.बी. ने उन्हें आयल उड़ीसा भेजा तथा उन्होंने उड़ीसा सरकार के उपक्रम पश्चिम उड़ीसा सहकारी तेल बीज निगम के प्रबंध निदेशक का कार्यभार संभाला। वहां बारबार अन्य निदेशकों से उनका टकराव हुआ। साथ ही, नरसिंह रावमनमोहन सिंह की नई आर्थिक नीतियों के दौर में सरकार की नीति खाद्य तेलों के घरेलू उत्पादन के खिलाफ रही। इसके चलते उन्होंने निगम के प्रबंध निदेशक पद से इस्तीफा दे दिया।

1999 में उड़ीसा के तटीय क्षेत्रो पर महाचक्रवात के विनाश के बाद राहतकार्यों में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभायी। इन राहतकार्यों के दौरान अनेक बुद्धिजीवियों से उनके संबंध स्थापित हुए जो बाद के वर्षों में भी उनके सक्रिय सहयोगी रहे। इन्होनें मिलकर लोकपख्य की स्थापना की तथा का. राजेन्द्र इसके संयोजक रहे। काशीपुर में उत्कल एल्यूमिना से विस्थापित आदिवासियों पर दमन के खिलाफ विरोध में उन्होंने सक्रिय हिस्सेदारी की।

महाचक्रवात पर राहतकार्यों के बाद वे जनता के मुद्दों पर संघर्षों में जुट गये। Keep reading →

April 5, 2008

पोस्को के विरुद्ध जुझारु प्रदर्शन

बहुराष्ट्रीय कम्पनी पोस्को के प्रबंधकों तथा नवीन पटनायक सरकार ने बड़े जोरशोर से प्रचार किया था कि 1 अप्रैल को पोस्को स्टील प्लांट का शिलान्यास किया जायेगा। उड़ीसा प्रांत के स्थापना दिवस 1 अप्रैल को उन्होंने उड़ीसा की प्राकृतिक संपदा की लूट के प्रतीक पोस्को स्टील प्लांट की स्थापना के लिए चुना। बहुराष्ट्रीय कम्पनी तथा उसके दलाल राजनेताओं की चुनौती को स्वीकार करते हुए पोस्को प्रतिरोध संग्राम समिति तथा प्रदेश के विस्थापनविरोधी जनान्दोलनों राजनैतिक संगठनों ने इसके विरुद्ध एक व्यापक जन समावेश की घोषणा की। विकल्प जन समावेश के लिए बालीतूठा को चुना गया जहां 29 नवम्बर, 2007 को पोस्को समर्थक बीजद नेता दामोदर राउत के गुंडों ने पुलिस के सहयोग से पोस्कोविरोधी आन्दोलनकारियों पर सशस्त्रा हमला किया था। पोस्को समर्थक गुंडावाहिनी, पुलिस तथा राजनेताओं को चुनौती देते हुए संघर्षशील जनता ने उन्हें पीछे धकेलने का निर्णय ले लिया।

क्षेत्र की पोस्कोविरोधी किसान जनता के दृढ़ निश्चय तथा प्रदेश देश भर के जनवादी क्रांतिकारी शक्तियों से मिलने वाले समर्थन को देखते हुए पोस्को तथा उसके अनुगामी नवीन सरकार ने 1 अप्रैल के कार्यक्रम को स्थगित करने की घोषणा कर दी। इसका मकसद पोस्कोविरोधियों के 1 अप्रैल के कार्यक्रम को महत्वहीन बनाना था। पोस्को तथा उड़ीसा सरकार की इस चाल को समझते हुए पोस्को प्रतिरोध संग्राम समिति तथा समर्थक संगठनों ने 1 अप्रैल के विकल्प समावेश को और जोरशोर से आयोजित करने की घोषणा की। सरकार ने कार्यक्रम को विफल करने के लिए क्षेत्र में निषेधाज्ञा लागू कर दी।

सरकारी प्रचार तथा प्रशासन के