September 24, 2006...11:32 pm

कोला कम्पनियों के समर्थन में भारत सरकार

Jump to Comments

अगर कोला कोला और पेप्सी कोला भारत में पेय पदार्थों में कीटनाशकों के प्रतिशत पर ध्यान नहीं रखते तो क्या हुआ? देश में पीने के पानी, सब्जियों, फलों इत्यादि में भी तो कीटनाशक हैं! वर्तमान में चल रही इस सवाल पर बहस में भारत सरकार तथा अधिकांश राज्य सरकारों का यही रवैया है।
5 अगस्त, 2003 को सी.एस.ई. नामक संस्था ने दावा किया था कि इन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के पेय में कीटनाशकों की मात्रा ऊंची है। उसी दिन उक्त दोनों कम्पनियों ने घोषणा की कि उनके पदार्थों की नियमित जांच होती है और उनमें कीटनाशक नहीं होते। अगस्त 2003 में ही संसद ने भी जे.पी.सी. बनायी। कमेटी ने फरवरी ’04 में अपनी रिपोर्ट में कहा कि बेहतर हो कि हम इन पदार्थों को कीटनाशकों से मुक्त करायें। परन्तु, जे.पी.सी. ने किसी कार्रवाई का प्रस्ताव नहीं रखा। स्वास्थ्य मंत्रालय ने जे.पी.सी. की अनुशंसाओं के आधार पर कहा कि वह मानक तय करेगी। ब्यूरो आफ़ इण्डियन स्टैण्डर्ड ने इस बारे में तीन वर्षों में बीस बैठकें की, पर मानक तय नहीं किये। सी.एस.ई. के अनुसार हमारे देश में कोक और पेप्सी में कीटनाशकों का स्तर पश्चिमी देशों में इन कम्पनियों के पदार्थों में इनके स्तर से तीस गुना ज्यादा है। 2004 में उच्चतम न्यायालय ने कोका कोला को आदेश दिया था कि वह हानिकारक कीटनाशकों की उपस्थिति का उल्लेख अपने पदार्थों पर करे। परन्तु, न कम्पनियों ने इसका पालन किया और न न्यायालय ने ही इसकी परवाह की।
2006 में सी.एस.ई. ने पेय पदार्थों में कीटनाशकों के उसी स्तर पर होने का आरोप लगाया कि उनका स्तर यूरोपीय संघ द्वारा मान्य स्तर से अधिक है। इन कम्पनियों द्वारा इसका खंडन तो अपेक्षित ही था। परन्तु, स्वास्थ्य मंत्रालय ने इन आंकड़ों के खिलाफ तेज हमला किया। इस आरोप की जांच करने की जगह स्वास्थ्य मंत्री श्री रामदौस ने बेशर्मी के साथ दावा किया कि सरकार द्वारा जांचे गये 39 नमूनों में से ‘केवल’ तीन में कीटनाशकों की मात्रा ऊंची पायी गयी। बेहयाई की हद यह है कि एक भी नमूने में कीटनाशकों की मौजूदगी से चिंतित होने की जगह सरकार बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के पक्ष में उतर आयी और उनके पेय पदार्थों को सुरक्षित घोषित कर दिया। साथ ही, प्रचार मायमों के जरिये यह प्रचारित करने की कोशिश की गयी कि हमारी चीनी तथा पानी में कीटनाशक हैं। आश्चर्य यह है कि ये विशालकाय बहुराष्ट्रीय कम्पनियां, जो अपने मुनाफे के लिये हमारे जल संसाधनों को खत्म कर रही हैं, कीटनाशकों से शुद्धि के उपाय क्यों नहीं करतीं। सरकारों को देश की जनता के स्वास्थ्य से ज्यादा चिंता विदेशी पूंजी निवेश पर इसके प्रभाव को लेकर है। ‘वामपंथी’ बुद्धदेव भी इसमें पीछे क्यों रहें ? बंगाल सी.पी.एम. ने दावा किया कि जांच के अनुसार इन कम्पनियों के पेय पदार्थ कीटनाशकों से सुरक्षित हैं।
जहां एक ओर बहुराष्ट्रीय कम्पनियां भारत के कृषि क्षेत्रा में अपनी पकड़ को मजबूत बनाते हुए बड़े पैमाने पर कीटनाशकों का इस्तेमाल करा रही हैं तथा अपने कीटनाशक बेच रही हैं, जिससे पानी व खाद्य पदार्थों में कीटनाशकों की मात्रा बढ़ी है, वहीं दूसरी ओर वे इस मौजूदगी को दिखाकर अपने पेय पदार्थों में कीटनाशकों के ऊंचे स्तर को जायज ठहरा रही हैं। दोनों हालतों में उनको मोटा मुनाफा है व इसका कुप्रभाव देश की जनता को भुगतना पड़ता है। इसकी देखभाल करने के लिये उनके दलाल शासक हैं।

Leave a Reply

You must be logged in to post a comment.

You must be logged in to post a comment.