November 25, 2006...12:04 am
इतिहास के पन्नो से : तेभागा आंदोलन
- आशीष
बंगाल का तेभागा आंदोलन फसल का दो–तिहाई हिस्सा उत्पीडि़त बटाईदार किसानों (बरगादारों) को दिलाने का आंदोलन था। यह बंगाल के 28 में से 15 जिलों में फैला, विशेषकर उत्तरी और तटवर्ती सुन्दरबन क्षेत्रों में। किसान सभा के आवाह्न पर लड़े गए इस आंदोलन में लगभग 50 लाख किसानों ने भाग लिया और इसे खेतिहर मजदूरों का भी व्यापक समर्थन प्राप्त हुआ।
1946 वह वर्ष था जब भारत के लोगों के आंदोलन बड़े पैमाने पर उमड़ रहे थे। केन्द्रीय नौसेना हड़ताल समिति के आवाह्न पर फरवरी में बम्बई, कराची और मद्रास के नौसैनिकों की हड़ताल हुई। जब बम्बई के बन्दरगाह मजदूरों ने इसका समर्थन किया तो, बकौल नौसेना हड़ताल कमेटी, पहली बार सैनिकों और आम आदमियों का खून एक ही उद्देश्य के लिए सड़कों पर बहा। इस लड़ाई में 250 जानें गईं।
ऐसे वर्ष में सितम्बर 1946 में किसान सभा ने तेभागा चाई का आवाह्न किया। यह अगस्त 1946 में कलकत्ता में हुए साम्प्रदायिक कत्लेआम के तुरन्त बाद किया गया जिसके बाद अक्तूबर में पूर्वी जिले नोवाखौली में भी साम्प्रदायिक दंगे हुए। आन्दोलन के मुख्य इलाके की किसान जनता हिन्दू और मुसलमान दोनों समुदायों की थी। आदिवासी किसानों ने भी इसमें भाग लिया। यह आन्दोलन अंग्रेजी शासन के दौरान शुरू हुआ जब मुस्लिम लीग का सुहरावर्दी मंत्रिमंडल राज कर रहा था। जब गांधी जी हिन्दू–मुस्लिम मैत्री और प्रार्थना सभाओं का नारा लेकर सामन्तों के साथ नोवाखौली के ग्रामीण अंचल में दौरा कर रहे थे तब इस वर्ग संघर्ष ने दोनों सम्प्रदायों के दसियों लाख किसानों को प्रेरित करके अपने पीछे समेट लिया। इस संघर्ष ने उन सभी जमींदारों को निशाना बनाया जो साम्प्रदायिक घृणा फैलाने में सक्रिय रहे। इस संघर्ष ने तमाम प्रतिकूल दुष्प्रचार तथा साम्प्रदायिक उकसावे का मुकाबला करते हुए वर्गीय आधार पर जनता की वास्तविक एकता स्थापित की और साम्प्रदायिक शक्तियों को हतोत्साहित कर दिया। किसानों ने तीव्र पुलिस दमन और अत्याचार का मुकाबला करते हुए नवम्बर 1946 से फरवरी 1947 के बीच फसल के दो–तिहाई हिस्से पर अपने कब्जे को बरकरार रखा।
इससे पहले 1940 में भू–राजस्व आयोग ने इस मांग के पक्ष में संस्तुति दे दी थी। 1946 में यह आन्दोलन निज खलने धान तोले (अपने खलिहान में धान एकत्रा करो) के नारे के साथ शुरू हुआ। गांव स्तर की छोटी बैठकें की गईं, पर्चे बांटे गये, रैलियां निकाली गय। पहली भिड़न्त दिनाजपुर जिले के अटवारी थाने में हुई। इससे पहले भी इस केन्द्र पर अधियारों ने इस तरह के संघर्ष किये थे। एक बैठक के बाद सुबह–सुबह किसान सभा के सदस्य एक बटाईदार की फसल काटने चले गये। पुलिस ने आकर एक नेता को गिरतार कर लिया पर इससे किसान निराश नहीं हुए। अगले दिन कटाई जारी रही। जब पुलिस ने आकर सभी किसानों पर हमला बोला, एक नौजवान विधवा के नेतृत्व में महिला किसानों ने लाठियां लेकर पुलिस को खदेड़ दिया। इसकी खबर चारों ओर फैली और कुछ दिन के लिए आन्दोलन थमा रहा।
जिले के नेताओं ने बैठक करके आन्दोलन जारी रखने का फैसला किया। गिरतारी से बचने के लिए वे सभी अपने इलाके में भूमिगत हो गये। वे सूर्यास्त के बाद ही गांव–गांव जाकर देर रात बैठक किया करते थे। उनके निर्देश पर सभी किसान लाठियां लेकर चलने लगे और यह आम प्रचलन बन गया। आवश्यकता पड़ने पर इन्कलाब का नारा लगाकर आस–पास के गांवों से सहयोग जुटाया जाने लगा। लाठी और लाल झण्डा लिये किसान बड़ी तादाद में एकत्रा होने लगे। जमींदारों (जोतदारों)के लठैतों के मुकाबले में किसानों के ‘लठैत’ संगठित होने लगे। जल्द ही आन्दोलन जिले के तीस में से बाइस थानों में फैल गया। आन्दोलन का सबसे ज्यादा असर ठाकुरगांव तहसील में रहा।
जैसे–जैसे आन्दोलन फैलता गया पार्टी उभरते हुए किसान नेताओं के माध्यम से इसका दिशा–निर्देशन करती रही। नई कतारें भूमिगत नेताओं के लिए भूमिगत अड्डे तय करती थीं, संदेश वाहक का काम करती थीं, आम किसानों की बैठकें कराया करती थीं, आपस में संपर्क रखा करती थीं और वरिष्ठ नेताओं की भूमिगत बैठकें आयोजित किया करती थीं। इनमें ऐसे भी उदाहरण थे जहां पति–पत्नी दोनों अपनी सारी सम्पत्ति पार्टी के नाम करके पूर्णकालिक कार्यकर्ता बन गये। ऐसे नेता थे जिन्होंने बहादुरी से तमाम खतरों का सामना करते हुए कठिनाईयों को पार करके आन्दोलन को आगे बढ़ाया। कई महिला कार्यकर्त्ताओ ने पार्टी का काम करना शुरू कर साथ–साथ पढ़ना–लिखना भी सीखा। ऐसे बहुत से उदाहरण थे जहां पुरुष संकोच कर जाते थे पर महिलायें पहलकदमी लेती थीं और पुरुष पीछे–पीछे भाग लेते थे। ये सभी इस आन्दोलन के सम्मानित उदाहरण बनते चले गये और नेताओं की कुर्बानी ने आम जनता को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। इसी संघर्ष में पचगढ़ में का0 चारू मजूमदार ने भी किसानों का नेतृत्व करने में अपना पहला अनुभव ग्रहण किया।
इस आन्दोलन के दौरान बटाई पर किसान (बरगादार) सैकड़ों की संख्या में जाकर फसल काटकर अपने खलिहान में ले आया करते थे। 4 जनवरी, 1947 को दिनाजपुर जिले के चिरीरबन्दर क्षेत्रा के तालपुकुर गांव के एक किसान संघर्ष पर पुलिस ने गोलियां चलाई जिसमें एक भूमिहीन किसान समीरूद्दीन एवं एक संथाल शिवराम मारे गये। पुलिस भारी संख्या में नेताओं को गिरतार करने आयी तो चार सौ किसानों ने एकत्रा होकर इस पुलिस छापे का मुकाबला किया। उद्वेलित आदिवासियों ने एक पुलिस वाले को पकड़कर अपने तीर से उसके शरीर को भेद दिया जिससे उसकी मृत्यु हो गयी। जिन नेताओं को पुलिस पकड़ने आयी थी वे बच गये। जनता ने पूरे इलाके में राहत समितियां बनाकर जरूरतमन्द क्षेत्रों में सहयोग पहुंचाया। इसी घटना को चिरीरबन्दर घटना कहते हैं। उसी के बाद सरकार ने बरगादार कानून प्रस्तावित करके प्रतिरोध को थामने का प्रयास किया। परन्तु, यह कानून पारित नहीं किया जा सका।
6 जनवरी, 1947 को समस्या का समाधान ढूंढ़ने के लिये जिलाधिकारी ने खुली बैठक आहूत की। एक बड़ा पंडाल लगाया गया और सभी जमींदार ताकत के साथ उपस्थित हुए। इस बैठक में किसान नेताओं को भी बुलाया गया था। चारा ओर से हजारों की संख्या में किसान एकत्रित हुए पर वे इसलिए पंडाल में नहीं गये क्योंकि इस बात की कोई उम्मीद नहीं थी कि जमींदार ‘‘तेभागा’’ की मांग मान लेंगे। किसानों ने अपनी अलग बैठक करके ‘‘तेभागा’’ की मांग पर जोर दिया। जिलाधिकारी दलबल के साथ इस बैठक में आ पहुँचे। किसानों ने अपने भूमिगत नेताओं के नेतृत्व में एक बड़ा जुलूस निकाला। पुलिस कोई गिरतारी नहीं कर पायी। जमींदार भी इस प्रदर्शन को देखने के लिए आ गये और लगाया गया पंडाल खाली पड़ा रह गया।
जनवरी के दूसरे हफ़्ते में रंगपुर में भिड़न्त हुई। कुछ मुसलमान जमींदारों ने हथियारबंद गुण्डों के साथ कटी हुई फसल ले जाने के लिए एक बरगादार के घर पर हमला किया। दोनों समुदायों के किसानों ने मिलकर इसका मुकाबला किया पर इसमें एक हिन्दू किसान मारा गया। खबर आग की तरह फैल गई और तीन हजार किसान वहां एकत्रा हो गये। साम्प्रदायिक तनाव के माहौल को देखते हुए किसान सभा ने जमींदार के घर पर हमला करने से किसानों को रोक दिया। इलाके व बाजार में रैलियां निकाली गयीं और जमींदारों का सफल बहिष्कार करके उन्हें गांव छोड़ने पर मजबूर कर दिया। आन्दोलन और फैल गया।
मैमनसिंह जिले के हजांग आदिवासियों ने भी टंका लगान घटाने और उसे रुपये के रूप में बदलने के लिए संघर्ष शुरू किया। यह लगान फसल पर ली जाती थी और पैदावार कमजोर होने पर भी देनी पड़ती थी। इसकी कीमत इन आदिवासी किसानों को चुकानी होती थी। बटाई पर खेत लेने का अधिकार भी सुरक्षित नहीं था। वनों की जिस जमीन को आदिवासी जोतते थे वह जमींदारों को दे दी गई थी और वे इसके ‘मालिक’ बन गये थे। इस इलाके में आदिवासियों को पुलिस से मोर्चा लेना पड़ा। बहेरटोली गांव में पुलिस ने नेताओं को गिरतार करने के लिए छापा मारा। यहां दो महिलाओं का बलात्कार किया और एक को खींचकर ले गये। हजांगों ने भी उन्हें अपने तीर कमानों से खदेड़ा। इस संघर्ष में पुलिस ने दो नेताओं को मार दिया। पर अन्त में हजांगों के प्रतिरोध के सामने उन्हें पीछे हटना पड़ा। इस हमले में हजांगों ने भी दो पुलिसवालों को मार गिराया और उनकी राइफलें छीन लीं। बाद में ईस्टर्न फ़्रन्टीयर राइफल्स की सेवा लेकर आदिवासियों पर तीव्र दमन किया गया।
मिदनापुर में भी पुलिस के साथ संघर्ष हुआ और पुलिस ने विरोध कर रहे किसानों पर गोलियां चलायीं। महिला व पुरुष मिलकर अपने विरोध प्रदर्शनों को बढ़ाते गये। जमींदारों ने हर जगह धान की चोरी का केस किसानों के विरुद्ध दर्ज कराए।
दिनाजपुर और दुआर्स में 1830 के बाद कछार की बहुत सारी जमीन पर चाय बागान लगाकार उसे खेती योग्य बनाया गया था और इस काम के लिए वहां पर संथालों व राजवंशियों को बसाया गया था। कुछ सालों तक बिना लगान के खेती कराने के बाद, वहां पर पैदावार पर कर लगाकर उसका मूल्यांकन किया गया और फिर जमीन पर लगान तय कर दी गयी। इस प्रक्रिया में इन खेतों पर काम कर रहे बटाईदारों को बेदखल करके ज्यादा लगान देने वाले किसानों के साथ बन्दोबस्त किया गया था। जिन बरगादारों ने इस इलाके में विद्रोह किया वे वही लोग थे जिन्हें जमींदारों और सूदखारों ने बेदखल कर दिया था।
शुरुआती दौर के बाद प्रस्तावित कानून के जोश में और प्रारम्भिक विजय के उत्साह में कई जगहों पर आन्दोलन ‘तेभागा’ से आगे बढ़ कर ‘खोलान भांगा’, यानी, जमींदारों के भंडारों से धान निकाल लाओ की ओर आगे बढ़ गया। जमींदारों की निजी सम्पत्ति पर इस तरह का हमला करने की राजनीतिक संगठनात्मक तैयारी नहीं थी और इससे आन्दोलन को धक्का लगा। यही नहीं, जो हमले किये गये वे हर जगह जोतदारों के विरुद्ध नहीं थे और विशेषकर असंगठित क्षेत्रों में धनी किसानों को भी निशाना बनाया गया। इससे सामाजिक तनाव व राजनीतिक दिक्कतें बढ़ गयीं। इसने जोतदारों को भी, जो गांव छोड़कर भाग चुके थे, सक्रिय होने का अवसर दे दिया। उन्होंने खुद धान एकत्रा करने के प्रयास बन्द कर दिये। उन्होंने जोतदार समितियां बनाईं, पैसा एकत्रा किया, मुस्लिम लीग और कांगे्रस पर दबाव बनाने के लिए तार भेजे। सरकार उनकी मांग के सामने झुकी और भारी संख्या में पुलिस भेजी गयी। धान की लूट के कई केस दर्ज किये गये।
बालुरघाट तहसील में जनवरी के अन्त में किसानों ने धान की कटाई करके अपने खलिहान में रखना शुरू किया। रानीसंखेल में 2 फरवरी, 1947 को एक महिला कार्यकत्र्ता के नेतृत्व में किसानों ने नेताओं की गिरतारी करने आए दरोगा की बन्दूक छीन ली। उसे तो बाद में छोड़ दिया गया पर पुलिस ने भारी संख्या में हमला बोला और संगठनात्मक तैयारी के अभाव में इसका प्रतिरोध नहीं किया जा सका। पुलिस ने भयंकर आतंक मचाया।
इसी दौर में खानपुर की घटना हुई। 20 फरवरी को सुबह–सुबह दिनाजपुर जिले के खानपुर गांव में एक पुलिस दल नेताओं को गिरतार करने आया तो मजदूरों व किसानों ने इसका जमकर विरोध किया। पुलिस ने बेरहमी से गोलियां दागीं और 22 किसान शहीद हो गए। इसी को खानपुर घटना कहते ह।
इस दौर में आन्दोलन उतार–चढ़ाव में चला। कुछ जगह बरगादार डर के मारे धान काटने गये ही नहीं। कुछ जगह उन्होंने पूरी फसल काट ली और कुछ जगह समर्पण कर दिया।
भाकपा के कुछ नेताओं ने ‘जोतने वाले को जमीन’ के नारे के आधार पर आन्दोलन को आगे बढ़ाने का प्रस्ताव रखा पर पुलिस और जमींदारों के हमले का प्रतिरोध करने के फौरी सवाल पर कोई हल नहीं सुझाया गया। आन्दोलन भटकने लगा। जनगोलबंदी जारी रही और 25 फरवरी को हजारों की संख्या में किसान ठाकुरगांव में एकत्रा हुए। इस सभा को गैरकानूनी घोषित किया गया और वापस जाते हुए किसानों पर भी गोलियां दाग कर 5 किसानों को मार दिया गया।
परिस्थिति का मुकाबला करने के लिए सही रणनैतिक समझदारी और उपयुक्त नई कार्यनीति की आवश्यकता थी। पर इसका मूल्यांकन नहीं किया गया और नये प्रस्तावित कानून पर आशा टिकी रही। भाकपा आगे बढ़ती हुई जुझारु शक्तियों को सही दिशा देने में नाकामयाब रही। वर्ग संघर्ष को जारी रखने के काम पर अपनी एकाग्रता को बनाए रखने में वह नाकामयाब रही।
दूसरी ओर भारतीय राजसत्ता दो महत्वपूर्ण राजनैतिक सवालों से घिरे होने के बावजूद, एक अंगे्रजों से स्थानीय शासकों के हाथों सत्ता का हस्तान्तरण और दूसरा साम्प्रदायिक दंगे और देश का बंटवारा, उसकी राज्य मशीनरी ने वर्ग युद्ध को दबाने पर अपना यान केन्द्रित रखा।
‘स्वतंत्र’ भारत की शक्तियां बटाईदार किसानों की आंशिक मांगों का समर्थन नहीं कर पायीं। उन्होंने आन्दोलन को ‘गैरकानूनी अराजकतावाद’ और ‘ अधिकार का अनादर’ करार दिया। अपने दमन के औचित्य को समझाने के लिए किसान सभा की ‘जनअदालतों’, ‘एक्शन कमेटियां’ आदि का बढ़ा–चढ़ा कर हवाला दिया गया। किसानों के विरुद्ध कई केस दर्ज किये गये और उन्हें सजाएं दी गयीं। मुस्लिम लीग मुख्यमंत्री सुहरावर्दी ने बयान दिया कि ‘‘हम आजादी के कगार पर ह। हमें संवैधानिक रास्ते से आजादी की ओर बढ़ना चाहिए ताकि हम इसके फलों का भोग कर सकें।’’
जैसा बताया गया कि सरकार ने बरगादार कानून प्रस्तावित किया था पर उसे पारित नहीं किया गया। 1950 के दशक में कई साल बाद यह कानून बना और इसमें लगभग वे सभी प्रावाधान थे जो प्रस्तावित कानून में लिखे थे। इसमें यह प्रावाधान था कि जब जोतदार खाद, जानवर व अन्य औजार मुहैया करायेगा तो बरगादार को आधि फसल मिलेगी। ऐसा नहीं होने पर उसे फसल का दो–तिहाई हिस्सा मिलेगा। अगर जोतदार बीज देता है तो यह उसे अलग से वापस किया जाएगा। कानून का नकारात्मक पक्ष यह था कि जमीन के ‘दुरूपयोग’ की स्थिति में या अपने इस्तेमाल के लिए जोतदार को यह अधिकार था कि वह बटाईदार (बरगादार) को बेदखल कर सके।
इस आन्दोलन में 140 से ज्यादा किसानों ने अपनी जान की कुर्बानी दी।
इस आन्दोलन की विफलता के कारणों में सबसे पहला तो यही है कि तत्कालिक राजसत्ता और बड़े जमींदारों, बड़े दलाल पूंजीपतियों के हाथों सत्ता के हस्तांतरण के वर्ग चरित्र को नहीं समझा गया। उनसे गलत उम्मीद की गयी कि वे कानून पारित करके शांतिपूर्वक ढंग से मांगों का समााान कर देंगे। दूसरी कमी थी कि इस आंदोलन का जनाधार और समर्थन फसल के दो–तिहाई हिस्से के लिए था और संघर्ष के फौरी कदम इसी मांग तक सीमित रखे जाने चाहिये थे। स्वत:स्फूर्त ढंग से जमींदारों के गोदामों पर हमलों को सख्ती से रोका जाना चाहिये था। यही नहीं, बड़े जमींदारों के अलगाव को बनाए रखने के लिए केवल उन्ही पर हमला बोला जाना चाहिये था और किसान तबकों पर हमले रोकने चाहिये थे। फसल के दो–तिहाई हिस्से की मांग पर जन गोलबन्दी जारी रखनी चाहिये थी ताकि एक ओर जमींदारों के गोदामों पर हमले रोके जा सकें और दूसरी ओर सरकार पर उम्मीद रखकर आंदोलन कमजोर न हो। तीसरी आवश्यकता थी कि ग्रामीण क्षेत्रों में अद्र्धसामंती संबंधो को देखते हुए और पार्टी ढांचे की कमजोरी के मद्देनजर संघर्ष के क्षेत्रों में पार्टी गठन और सामंतों व पुलिस हमले के की ठोस योजना बनाई जानी चाहिये थी।
(यह लेख ए0आर0 देसाई द्वारा सम्पादित, भारत में किसान आंदोलन (अंग्रेजी मूल) तथा एम0ए0 रसूल द्वारा सम्पादित अखिल भारतीय किसान सभा का इतिहास से लिए गये तथ्यों पर आधारित है।)
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