October 7, 2007...2:51 pm

भ्रूण के साथ लिंग भेद, सरकारों की बहकी नीतियां व महिलाओं का दोयम दर्जा

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मादा भ्रूणों की गर्भ में पहचान कर गर्भपात द्वारा उनकी हत्याओं की बढ़ती संख्या के खिलाफ लड़ने के लिए निकली है केन्द्र सरकार की महिला सशक्तिकरण मंत्री श्रीमती रेनुका चौधरी। भारत की सामाजिक सच्चाईयों को बिल्कुल अनदेखा कर सरकारी मशीनरी की असलियत के प्रति आंखें बंद कर तथा भारत के शासकों की नीतियों का इस सवाल से संबंध देखे बिना उन्होंने घोषणा की कि ऐसी हत्याओं को रोकने के लिए भारत में सभी गर्भ पंजीकृत होने चाहिए। इससे भ्रूण हत्या व नवजात बच्चियों को पैदा होते ही मार देना मुश्किल हो जायेगा और ऐसा करने वालों को पकड़ना संभव हो जायेगा। इस तरह किसी जादुगरनी की भांति, ठोस हालातों से मुकाबला छोड़, रेनुका चौधरी इस गम्भीर समस्या का हल करने वाली हैं। साथ ही उन्होंने गर्भपात के आसानकानूनों के खिलाफ कुछ टिप्पणियां कीं जिन्हें सुनकर भारत के महिला आन्दोलन को कांपना चाहिए।

परन्तु गंभीर महिला आन्दोलन से राय कौन पूछने गया? अंग्रेजी दैनिक अखबार स्वयंसेवी संगठनों से, स्लिमिंग क्लिनिकों की मालकिनों से टिप्पणियां लेने तक सीमित रहे। इन सब की राय लगभग रेनुका चौधरी से सहमति की थी। इससे पहले भी, आंध्र प्रदेश में रेनुका चौधरी ने घोषणा की थी कि औरतों को मादा गर्भ को नष्ट नहीं करना चाहिए बल्कि बच्ची पैदा होने पर उसे सरकार को दे देना चाहिए। सरकारें ऐसी बच्चियों का पालनपोषण करेंगी।

जिस देश के केन्द्रीय मंत्री की इस समस्या के प्रति इतनी सतही समझ हो व उससे निपटने के लिए इस तरह के समाधान हों, क्या यह आश्चर्यजनक है कि समस्या समाधानहीन होकर और व्यापक ही होती जा रही है ? हाल ही में, उड़ीसा में भुवनेश्वर में मिले हड्डियों के ढेरों ने संकेत दिया है कि यह समस्या वहां भी व्यापक है।

भ्रूण हत्यायें : दोषी डाक्टर, दोषी सामाजिक मूल्य

रेनुका चौधरी के सुझावों का कुंठित नजरिया आंकने के लिए, ये हत्यायें क्यों और कैसे हो रही हैं इस पर नजर डालना ठीक रहेगा।

मादा भ्रूणों की पहचान गैरवैज्ञानिक तरीके से अप्रशिक्षित दाईयों, गांवों की बुढ़ी औरतें आदि ठीक से करने का दावा करती रही हैं। परन्तु विज्ञान के विकास ने इसे संभव व आसान बना दिया है और भारत के डाक्टरों ने ऐसी कला, जो मानव स्वास्थ्य के लिए इस्तेमाल होने को विकसित हुई थी, का दुरूपयोग कर इसे पिछड़े सामाजिक मूल्यों की सेवा में सौंप दिया है। अल्ट्रासाउंडमशीनों के इस्तेमाल व गर्भ के पानी की जांच करके भ्रूण का लिंग भेद लेना आसान है। यह अलग बात है कि एक और दुरूपयोग इससे संभव हो जाता है कि लालची डाक्टर या ऐसे डाक्टर जिन्हें इन कलाओं का ज्ञान न हो, मशीनों का इस्तेमाल कर झूठी रिपोर्ट दे देते हैं व गर्भपात करने वाले डाक्टरों से कमीशन खाते हैं। लड़की पैदा होने पर शोक, बच्चियों के पैदा होने पर चुपचाप उनकी हत्यायें, बच्चियों के प्रति परवरिश में भेदभाव यह सब अद्र्धसामंती भारत की सामंती संस्कृति का भाग रहा है। इसका असर महिलापुरुष अनुपात पर जरूर पड़ता था, परन्तु मात्रा इतनी भयानक नहीं थी जितनी अब हो गई है वैज्ञानिक तकनीकों के दुरूपयोग के साथ। अब यह व्यापक पैमाने पर इस्तेमाल किया जा सकता है, और विशेषकर मध्यम वर्ग जो कि जिंदा बच्चे को मारने से हिचकेगा, इस रास्ते का इस्तेमाल कर सकता है।

सामंती संस्कृति का सवाल इस पूरी बात में बहुत मूल है और इसी के साथ जुड़ा है महिला का समाज में दोयम दर्जे का सवाल। भ्रूण हत्याओं को इसके साथ जोड़े बिना देखने से इस समस्या की जड़ों को समझना असंभव है। इससे सिफ‍र् डाक्टरों की लालच व लोगों की गलतसमझ तक ही विचार सीमित रह जायेंगे और सवाल जड़ तक नहीं पहुंचेगा। जिस समाज में महिला अस्तित्वहीन हो, बेटी आर्थिक व सामाजिक बोझ हो; उसमें बच्चियों व औरतों को जिंदा रखने के कौनकौन से तरीके ढूंढ़े जायेंगे? और अगर देश की नीतियां ऐसी हों जो कि व्यवहार में बच्चे के पालनपोषण का आर्थिक बोझ और भयंकर कर दें, आवश्यक सेवाएं व स्वास्थ्य सेवाएं और महंगी हो जायें, लड़कियों को पढ़ाना दूसरा दहेज देने से भी महंगा हो तथा अनपढ़ लड़की की शादी असंभव तब क्या बच्चियों की जान बचाने में सरकारें कामयाब हो सकती हैं। यह और भी ज्यादा असंभव इस बात से हो रहा है कि वैश्वीकरण की नीतियों के साथ एक गंदी साम्राज्यवादी संस्कृति, जो औरत को उपभोग की ही वस्तु समझती है व मानती है कि व्यक्तिगत फायदा ही सब कुछ है, भी फैल रही है। दूसरी तरफ, सामंती मूल्यों को भारतीय संस्कृति बचाने के नाम पर और ज्यादा कट्टर बनाया जा रहा है। पिछड़े रेडियो कार्यक्रम, दूरदर्शन कार्यक्रम, टीवी धारावाहिक, फिल्में आदि समाज में मशहूर लोगों के जीवन (जिसमें मीडिया केवल पैसों की गिनती करती है) यह सब घिनौने सामंती मूल्यों का मदद करते हैं। तब कहां से समाज में बच्चियों का अस्तित्व बढ़ेगा, कहां से भ्रूण हत्यायें बंद होंगी? जब सारी नीतियां उल्टी गंगा बहाने में लगी हैं? समाज में महिला का अस्तित्व समाज के स्वास्थ्य की बहुत संवेदनशील मापक है और महिला मुक्ति का सवाल घनिष्ठ रूप से न केवल शोषण मुक्त समाज बल्कि निजी सम्पत्ति के खात्मे से जुड़ा हुआ है।

डाक्टरों के लालच इत्यादि के सवालों को भी इसी संदर्भ में देखना चाहिए। डाक्टरी पेशे में वे आते हैं जो पैसे लगा सकते हैं और जिनको इतनी योग्य शिक्षा मिली है कि वे प्रवेशपरीक्षा पास कर सके हों। सारा जोर पैसे पर ही रहता है व निजीकरण की पिछले 17 वर्षों की नीतियों ने इसे भयंकर रूप से एक ही तरफ धकेला है। न डाक्टरी पढ़ाई, न स्कूली पढ़ाई सामाजिक मूल्यों के सवालों पर ध्यान आकर्षित करती हैं। महिला डाक्टरों का अपना जीवन भी अधिकतर पिछड़े सामाजिक मूल्यों का गुलाम होता है। इसलिए भ्रूण जांच की लालच के मारे गैरकानूनी उपयोग करने के साथसाथ उनके पास तर्क भी होता है अगर किसी को बेटी नहीं चाहिए तो बेटे का अधिकार क्यों नहीं है जब विज्ञान ने ऐसा संभव किया है ! वे यह नहीं देख पाते कि इसी वाक्य में बेटाबेटी का फर्क छुपा है क्योंकि लिंग तो प्राकृतिक सवाल है, “डिजाईनर कपड़े” आर्डरकरने का सवाल नहीं।

रेनुका चौधरी के सुझाव

इसी संदर्भ में रेनुका चौधरी के सुझावों को देखना चाहिए। जिस देश में ढंग से शादियों का पंजीकरण नहीं हो पाता, वहां वह गर्भ का पंजीकरण करने चली हैं। पर यह भी छोटी बात है। ज्यादा बड़ी बात यह है कि भारत के कानून डाक्टरों को मां की मानसिक स्थिति के हित में गर्भ के पहले तीन माह में गर्भपात करने देता है। इसका इस्तेमाल ऐसे हजारोंहजार मामलों की मदद करता है जहां पारिवारिक, सामाजिक व पुलिस हिंसा से पीडि़त महिलाओं; अशिक्षा, गरीबी व झूठे वायदों में फंसी लड़कियों को वैज्ञानिक तरीके से मदद हो सकती है और न उन्हें जान लेने का रास्ता अपनाना पड़ता है और न ही अकुशल लोगों के हाथ मरने जाना पड़ता है। फिर भी ज्यादा केस ऐसे ही भटकते हैं क्योंकि स्वास्थ्य सेवाओं का घोर अभाव है। यह इस देश की सच्चाई है।

जब आधा भारत नारी है…

जरूरत है कि अल्ट्रासाउंड क्लीनिकों पर सख्त नजर रखने के साथसाथ, डाक्टरों में चेतनाअभियान लेने के साथसाथ, भ्रूणों के लिंग परीक्षण के काम को कुछ सरकारी केन्द्रों पर सीमित करने के साथसाथ समाज में महिलाओं के अस्तित्व के सवाल पर ध्यान दिया जाये। आवश्यक सेवाओं व शिक्षा के निजीकरण पर रोक लगाई जाये तथा शिक्षा को वैज्ञानिक व जनवादी बनाया जाये। बच्चियों के लिए नि:शुल्क व आवश्यक शिक्षा उपलब करायी जाये, उनकी पढ़ाई के सारे खर्चे सरकारें उठाये और सरकारी खर्चे पर उन्हें उच्च शिक्षा उपलब करायी जाये अगर उनकी काबलियत हो। 50 प्रतिशत नौकरियां तुरंत महिलाओं के लिए आरक्षित हों व समयबद्ध सीमा के अंदर सबको प्रशिक्षण के अनुसार नौकरियां उपलब्ध हों। न्यूनतम वेतन लागू करवाने की मशीनरी ठीक की जाये व ठेकेदारी/कैजुअल में लगी महिलाओं की नौकरियों को पक्का करवाया जाये। सम्पत्ति का अधिकार बेटा -बेटी के लिए एक समान बनाया जाये। दूसरा बड़ा सवाल है दहेज कानूनों को लागू करवाने का। सामाजिक, पंचायती व सरकारी दबाव बनना चाहिए कि शादियां बिना तामझाम के आसान तरीके से करवाई जायें।

साथ ही महिला आन्दोलन को नये समाज की रचना के लिए संघर्षों को विकसित करना होगा और महिलाओं में इसकी जरूरत की चेतना फैलानी पड़ेगी। केवल ऐसा समाज जो सब इंसानों की बराबरी को लागू करता है, उसी समाज में महिलाओं के दोयम दर्जे की स्थिति के विरुद्ध कामयाब लड़ाई लड़ी जा सकती है।

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