October 8, 2007...2:03 pm

बाढ़ में क्षति के लिए सरकारी नीतियां जिम्मेदार

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पटना में सम्मेलन

सी0पी0आई0 (एम0एल)न्यू डेमोक्रेसी की बिहार राज्य कमेटी ने बाढ़ एवं सूखा विषय पर 4 अक्तूबर, 2007 को पटना के आई0एम00 हाल में एक सम्मेलन आयोजित किया जिसमें बिहार के विभिन्न जिलों से 500 से अधिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

सम्मेलन को संबोधित करते हुए सी0पी0आई0 (एम0एल)न्यू डेमोक्रेसी के पूर्व विधायक का0 उमाार प्रसाद सिंह ने बिहार में बाढ़ के मूल कारणों और उसके निदान के प्रति सरकारों की निरंतर विफलता का विस्तृत ब्योरा दिया। उन्होंने कहा कि उस पुरानी लोकोक्ति कि “पानी का कहना है कि मांगने से पहले रास्ता दे दो, अगर वह रास्ता पूछेगा तो विनाश सुनिश्चित है” में निहित भावना को नीतिनिर्माता समझने में विफल रहे ह। भारी वर्षा अथवा नेपाल से उत्तर बिहार की नदियों में भारी मात्रा में पानी आना सदियों से होता रहा है। सवाल पानी की निकासी के लिए रास्ता मिलने का है। दरभंगा का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि तथाकथित विकास के क्रम में जल निकासी के अन्य प्राकृतिक रास्ते बन्द किये जाने के बाद बागमती नदी सहित आवाड़ा समूह की आठ छोटीबड़ी नदियों से लाखों घनफुट पानी की निकासी होती है। इस अवरोध के कारण दरभंगा, मुजफरपुर, समस्तीपुर, पूर्वी चम्पारण, सीतामढ़ी व मधुबनी में जलजमाव होना कोई आश्चर्य नहीं है। इस पुल की लंबाई व चौड़ाई बढ़ाने की योजना 32 वर्षों से लंबित है। स्थिति को स्पष्ट रूप से दर्शाते हुए क्षेत्रा का एक नक्शा भी सम्मेलन में प्रदर्शित किया गया था।

सरकारों की उदासीनता पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि बाढ़ बारबार आ रही है व आँसू बहाये जा रहे ह, परन्तु नीतियों को परखने के बजाय दिग्भ्रमित करने का प्रयास अर्से से जारी है। 1955 में बाढ़ नियंत्राण बोर्ड गठित हुआ व पिछले दशकों में दर्जनों विशेषज्ञ समितियां बनाई जा चुकी हैं। पर इनकी रिपोर्ट ठंडे बस्ते में दफन हो गईं। इस बार की बाढ़ के बाद भी नितीश सरकार ने श्री एन0 सन्याल की अयक्षता में एक विशेषज्ञ समिति गठित की है। उल्लेखनीय है कि उत्तर बिहार की बागमती बेसिन की बाढ़ समस्या व जल निकासी पर इन श्रीमान की अयक्षता में ही बनी एक कमेटी ने 1988 में रिपोर्ट दी थी जिसको आज ढूँढना भी मुश्किल होगा।

इस वर्ष की बाढ़ से हुई भयानक आर्थिक क्षति का आंकलन करते हुए उन्होंने बताया कि बिहार के 20 प्रभावित जिलों में केवल फसलों की क्षति 30 अरब रुपये से अधिक होगी। इसके अलावा जनता की चलअचल संपत्ति, बुनियादी ढांचे व पूंजीगत परिसंपत्तियों की क्षति इससे कई गुना अधिक होगी। बाढ़ के नियंत्राण के लिए अथवा राहत व पुनर्वास के लिए सरकार के पास न तो कोई दूरगामी योजना है और न ही कोई उचित वित्तीय प्रबन। किसी भी सरकार की दिलचस्पी बाढ़ की समस्या के समाधान में नहीं है एवं सरकार की नीतियां राजनीतिज्ञों, अभियंताओं, नौकरशाहों एवं उनके संरक्षित ठेकेदारों की चारागाह मात्रा हैं।

अखिल भारतीय किसान मजदूर सभा के राष्ट्रीय सचिव का0 आशीष मित्तल ने राष्ट्रीय परिपे्रक्ष्य का उल्लेख करते हुए कहा कि केन्द्र व राज्य सरकार की नीतियां ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की नीतियों का जारी रूप हैं। इनका केन्द्रबिन्दु आम किसानों के हित साधन व कृषि को विकसित करना नहीं है। केवल बड़ीबड़ी परियोजनाओं नर्मदा, टिहरी, केनबेतवा इत्यादि पर जोर है; जबकि यह साबित हो चुका है कि किसानों व कृषि को जितना तथाकथित लाभ होता है उससे अधिक विस्थापन का नुकसान होता है। वास्तविकता यह है कि बिहार व पूरे देश की ठोस परिस्थिति में छोटे स्तर की स्थानीय नियंत्राणाधीन योजनाओं द्वारा ही जल नियंत्राण सफल हो सकता है एवं बाढ़ व सूखा से निजात पायी जा सकती है। आज के दौर में जो बड़ी योजनाएं लागू हो रही ह उनका मूल उद्देश्य कृषि का विकास नहीं बल्कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियों व सहयोगी बड़ी देशी कम्पनियों के लिए पानी उपलब कराना है तथा विश्व बैंक की नीतियों के अनुसार पानी का निजीकरण करना है। उड़ीसा, छत्तीसगढ़, केरल इत्यादि में इसके उदाहरण सामने ह। बाढ़ को प्रकृति का प्रकोप कहकर जिम्मेदारी से बचने वाले शासकों पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि जिस उत्तर बिहार की उपजाऊ भूमि पर प्राचीन काल से सम्प सभ्यताओं का लंबा इतिहास रहा है, वहाँ यह कैसे माना जा सकता है कि बाढ़ नियंत्राण नहीं किया जा सकता है। जाहिर है बाढ़ एवं सूखा के लिए मूलत: शासकों द्वारा जल का कुप्रबन ही जिम्मेदार है।

का0 राजकुमार यादव, का0 रूदल कुमार, प्रो00पी0 सिंह, का0 शिवनाथ, डा0 कमरूजमा, का0 बलदेव झा आदि ने भी सम्मेलन में अपने विचार रखे। दरभंगा, मुजफरपुर, समस्तीपुर, चम्पारण इत्यादि जिलों में वास्तविक परिस्थिति के जो विवरण प्रस्तुत किये गये उससे स्पष्ट हुआ कि प्रशासन पूर्णत: विफल रहा है। बाढ़ राहत सामग्री समय पर समुचित मात्रा में उपलब नहीं थी तथा उसके विवरण में प्रशासनिक कोताही एवं भ्रष्टाचार व्याप्त था। कई जिलों में पार्टी कार्यकर्ताओं को प्रशासन के विरुद्ध बारबार जनान्दोलन करना पड़ा था। जिन क्षेत्रो में बाढ़ हर वर्ष आती है वहाँ भी सरकारी तंत्रा द्वारा राहत की पूर्व तैयारी (नाव, प्लास्टिक, चूड़ा, दवाईयाँ) में भारी लापरवाही की गई।

वक्ताओं की रिपोर्टों में ये तथ्य भी सामने आये कि भभुआ, रोहतास एवं मय बिहार के कुछ अन्य जिलों में पिछले कई वर्षों से बारबार सूखा का प्रकोप रहा है जिसका मूल कारण है जल संचारण के पारम्परिक साधनों तालाब, बांन्ध इत्यादि की मरम्मत नहीं होना एवं नयी जलाशय परियोजनाओं का कई दशकों बाद भी पूरा नहीं होना।

सम्मेलन का समापन करते हुए सभायक्ष का0 वी0के0 पटोले ने बाढ़ एवं सूखा के लिए मूलत: सरकारों की गलत जल प्रबन नीतियों को दोषी ठहराते हुए उनके विरुद्ध व्यापक जनान्दोलन विकसित करने का आवाह्न किया।

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