December 1, 2007...3:24 am

पाकिस्तान : अमेरिका समर्थित फौजी तानाशाही द्वारा `इमर्जेंसी’ की घोषणा

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3 नवम्बर, 2007 को अमेरिकासमर्थित पाकिस्तानी फौजी तानाशाह परवेज मुशर्रफ ने पाकिस्तान में खुली फौजी तानाशाही लागू कर दीसंविधान को निलंबित कर अस्थाई संवैधानिक आदेश जारी कर दिया, पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश इफ्तिखार चौधरी को पद से हटाकर गिरफ्तार कर लिया, सर्वोच्च न्यायालय के धिकांश न्यायाधीशों को पदमुक्त कर नजरबंद कर दियामीडिया पर प्रतिबंध लगा दिये तथा निजी चैनलों को बंद कर दियाराजनीतिक दलों के हजारोंहजार कार्यकर्ताओं नेताओं को गिरफ्तार किया गयासभाओं, प्रदर्शनों हर किस्म के विरोध पर प्रतिबंध लगा दिया गया

यद्यपि परवेज मुशर्रफ ने इसे आपातकाल घोषित किया परन्तु यह मार्शल लॉ हैखुद मुशर्रफ ने यह घोषणा राष्ट्रपति के रूप में नहीं बल्कि सेनायक्ष के रूप में की केवल संविधान को निलंबित किया बल्कि न्यायाधीशों को अस्थाई संवैधानिक आदेश के तहत दुबारा शपथ दिलाई तथा ऐसी शपथ लेने वाले न्यायाधीशों को हटा दिया गिरफ्तार कियासर्वोच्च न्यायालय के 17 में से 10 न्यायाधीशों उच्च न्यायालयों के 97 में से 60 न्यायाधीशों ने शपथ लेने से इंकार कर दियाएक अन्य आदेश के द्वारा इस तथाकथित आपातकाल को न्यायालयों में चुनौती देने को वर्जित कर दिया। `आपातकालका विरोध करने वालों पर आतंकवाद राजद्रोह के मुकदमे बनाये जा रहे हैं तथा एक अधिघोषणा के द्वारा इन मुकदमों को सैन्य अदालतों में चलाने का प्राविधान किया गया हैपूरा घटनाक्रम स्पष्ट करता है कि `आपातकालके नाम पर मार्शल लॉ लागू किया गया है

व्यापक विरोध : क्रूर दमन

मार्शल लॉ घोषित किये जाने का पूरे पाकिस्तान में व्यापक विरोध हो रहा है जिसको फौज पुलिस द्वारा बर्बरता से कुचला जा रहा हैपाकिस्तान के सभी प्रान्तों पंजाब, सिंध, बलोचिस्तान तथा उत्तरपश्चिम सीमा प्रान्त में वकीलों ने बड़े विरोध प्रदर्शन किये जिन्हें बर्बरता से कुचला जा रहा है एवं वकीलों को गिरफ्तार किया जा रहा हैवकीलों द्वारा अस्थाई संवैधानिक आदेश के तहत शपथ लेने वाले न्यायाधीशों का बहिष्कार किया गया

मार्शल लॉ के खिलाफ मीडियाकर्मियों के भी व्यापक विरोध प्रदर्शन हो रहे हैंइन प्रदर्शनों को पुलिस ने क्रूरता से कुचला हैपुलिस कार्रवाई में अनेक पत्राकारों को गंभीर चोटें आई हैं तथा कई पत्राकारों को आतंकवादविरोधी कानून के तहत गिरफ्तार किया गया है

मार्शल लॉ के खिलाफ विभि शहरों में छात्रो अयापकों के प्रदर्शन जारी हैंलाहौर, रावलपिंडी, पेशावर, कराची, क्वेटा अन्य शहरों में छात्रा अयापकों के प्रदर्शनों के नेताओं को गिरफ्तार किया गया हैरावलपिंडी में 14 विश्वविद्यालय शिक्षकों पर मार्शल लॉ के विरुद्ध प्रदर्शन करने के जुर्म में राजद्रोह का मुकदमा बनाया गया हैमार्शल लॉ के विरुद्ध प्रदर्शन करने पर कराची प्रैस क्लब के सामने से बलोच नेशनल पार्टी नेशनल वर्कर्स पार्टी के नेताओं को राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया गया हैवामपंथी पार्टियों के मोर्चे अवामी जम्हूरी तहरीक के 200 से धिक नेता कार्यकर्ता मार्शल लॉ का विरोध करने के लिए गिरफ्तार हैं

मार्शल लॉ के खिलाफ पाकिस्तान की जनता के सभी तबके संघर्षरत हैं तथा देश के फौजी शासक दमन के द्वारा इस विरोध को कुचलने का प्रयास कर रहे हैंपुलिस प्रदर्शनकारियों पर बर्बरता से दमन करे, इसे सुनिश्चित करने के लिए पुलिस के साथ सेना के खुफिया विभाग के अफसर रहते हैं

अमेरिकी समर्थन

मार्शल लॉ की घोषणा की पृष्ठभूमि का विश्लेषण करने से पहले अमेरिकी प्रशासन के रवैये को समझना प्रासंगिक हैअमेरिकी प्रशासन के प्रवक्ता ने स्वयं स्वीकार किया कि मुशर्रफ द्वारा मार्शल लॉ की घोषणा की अमेरिकी राष्ट्रपति प्रशासन को कम से कम एक सप्ताह पूर्व से जानकारी थीमार्शल लॉ की घोषणा के दिन कथित रूप से अमेरिकी विदेश सचिव कोंडालीजा राइस ने मुर्शरफ से मार्शल लॉ घोषित करने के लिए कहातीसरी दुनिया के देशों में `जनवादके लिए आतुर दिखने वाले बुश ने मार्शल लॉ की घोषणा के सात दिन बाद तक भी कोई प्रतिक्रिया देना जरूरी नहीं समझासात दिन बाद बुश ने मुशर्रफ से बातचीत की तथा कथित रूप से दो बातों पर जोर दिया चुनाव कराये जायें तथा मुशर्रफ फौजी वर्दी छोड़ दें मार्शल लॉ की घोषणा का जिक्र, संविधान निरस्त करने का, न्यायाधीशों को गिरफ्तार करने का, राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी का और ही विरोध के फौजी दमन कामुशर्रफ किसी तरह चुनावों का ढकोसला कर दे तो अमेरिकी प्रशासन खुशजाहिर है कि इसमें मुशर्रफ को क्या एतराज हो सकता है ? साथ ही अमेरिकी राष्ट्रपति बुश ने आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध अर्थात अफगानिस्तान पर अमेरिकी सैनिक कब्जे में सहयोग के लिए मुशर्रफ की भूरिभूरि प्रशंसा की

हाल में अमेरिका के विदेश उपसचिव नागरपोंते पाकिस्तान आये तथा उन्होंने मुशर्रफ सेना के नवनियुक्त उपायक्ष कयानी से बातचीत की। `जनवादकी स्थापना की खोखली बयानबाजी के साथ नागरपोंते ने मुशर्रफ की अमेरिका के आतंकवादविरोधी युद्ध में सहयोग के लिए प्रशंसा की तथा `आतंकवादके बढ़ते प्रभाव को पाकिस्तान के सामने सबसे बड़ी चुनौती बतायानागरपोंते के अनुसार अमेरिकी प्रशासन पाकिस्तान को मुशर्रफ के नेतृत्व में एक उदार, समृद्ध लोकतांत्रिाक देश देखना चाहता हैउनके बयान से स्पष्ट है कि अमेरिकी प्रशासन पाकिस्तान को फौजी तानाशाही में रखना चाहता हैअमेरिकी साम्राज्यवादी शासकों के लिए लोकतंत्रा उन्हीं देशों के लिए उपयुक्त है जो पूरी तरह अमेरिकी प्रभाव में नहीं हैं, पाकिस्तान के लिए उनकी नजर में फौजी तानाशाही ही उपयुक्त है

मार्शल लॉ की घोषणा पर अमेरिकी प्रशासन की प्रतिक्रिया से स्पष्ट है कि केवल मार्शल लॉ को अमेरिकी प्रशासन का समर्थन प्राप्त है बल्कि असल में उनकी सहमति शह पर ही मुशर्रफ ने मार्शल लॉ घोषित किया हैअमेरिका द्वारा मुशर्रफ शासक गुट को मार्शल लॉ थोपने के लिए प्रेरित करने के पीछे असली कारण अफगानिस्तान में तेज होता राष्ट्रीय युद्ध तथा अमेरिकी सेना की बढ़ती मुश्किलें हैं जिसके लिए अमेरिका पाकिस्तान सेना का और खुला इस्तेमाल करना चाहता हैपाकिस्तान में मार्शल लॉ की घोषणा के बाद अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना के कमाण्डर ने कहा कि उन्हें सही मायनों में अब पाकिस्तानी सेना का सहयोग मिलना शुरू हुआ है

मार्शल लॉ की पृष्ठभूमि

पाकिस्तान के लिए सेना का शासन कोई अप्रत्याशित या आकस्मिक बात नहीं है बल्कि 1947 में सत्ता के हस्तांतरण के बाद से धिकांश समय वहां सेना का ही शासन रहा हैइस्कदंर मिर्जा द्वारा अयूब खां से मिलकर सैन्य शासन लाने के बाद से ज्यादातर समय वहां सेना का ही शासन रहा है तथा जब सेना का प्रत्यक्ष शासन नहीं भी रहा तब भी सत्ता के शीर्ष स्थानों पर सेना का कब्जा रहा है पिछली शताब्दी के आठवें अन्तिम दशक में निर्वाचित सरकारों के शासनकाल में भी सत्ता में सेना का हस्तक्षेप काफी धिक थापाकिस्तान की दो बड़ी राजनीतिक पार्टियां पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज शरीफ) सैनिक तानाशाहों की छत्राछाया में ही बढ़ींयह अलग बात है कि बाद में सैन्य तख्तापलट में इनको निशाना बनाया गयाअपने शासन को जनता की नजर में वैध ठहराने के लिए जहां नागरिक शासन का लबादा ओढ़ना सेना के बड़े अफसरों की जरूरत है, वहीं `नागरिक शासनको सीमा में रखने अपने वर्चस्व की स्थापना के लिए इन्हें सत्ताच्युत करना इनकी मजबूरी

पाकिस्तान में शुरू से ही सामन्तीसैन्य तानाशाही रही है तथा वहां दलाल नौकरशाह पूंजी कमजोर रही हैपाकिस्तान के धिकांश क्षेत्रों में सामन्ती सामाजिक ढांचा है तथा लोकतांत्रिक ढांचे की बुनियाद कमजोर रही हैभारत की तरह पाकिस्तान में भी सत्ता का हस्तांतरण हुआ, साम्राज्यवादी दबदबा बना रहासाम्राज्यवाद का सामंतवाद से गठजोड़ मजबूत रहा तथा दलाल नौकरशाह पूंजीवाद अपेक्षाकृत कमजोरभारतीय शासकों के विस्तारवादी दबाव कश्मीर के सवाल पर दोनों देशों के बीच विवाद की पृष्ठभूमि में पाकिस्तानी सेना पर अमेरिकी साम्राज्यवाद का प्रभाव बढ़ता गयापाकिस्तानी सेना साम्राज्यवाद के हित साधन का उपकरण बन गई। 1977 में जियाउलहक 1999 में परवेज मुशर्रफ द्वारा तख्तापलट को अमेरिकी साम्राज्यवाद का समर्थन प्राप्त रहाअमेरिकी साम्राज्यवाद पाकिस्तान में लोकतंत्रा के लिए संघर्ष का बड़ा दुश्मन रहा है। 2000 में राष्ट्रपति के चुनाव में, तब उम्मीदवार, जार्ज बुश को पाकिस्तान के फौजी तानाशाह का नाम तो पता नहीं था परन्तु उनकी यह मान्यता जरूर थी कि फौजी तानाशाही पाकिस्तान में स्थायित्व ला रही थी

मुशर्रफ के मार्शल लॉ की पृष्ठभूमि

1999 में अमेरिका के समर्थन से तख्तापलट के जरिये मुशर्रफ सत्ता में आयाअमेरिका पाकिस्तानी सेना तथा अफगानिस्तान में उसके प्रभाव का इस्तेमाल मय एशिया के देशों में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए करना चाहता थाउल्लेखनीय है कि अफगानिस्तान की तालिबान सरकार को तीन अमेरिकापरस्त देशों सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात पाकिस्तान से ही मान्यता प्राप्त थीबाद में तालिबान सरकार से बढ़ते मतभेदों 11 सितम्बर के बाद आतंकवादविरोधी युद्ध के पहले कदम के रूप में अमेरिका ने रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण अफगानिस्तान पर फौजी कब्जा करने का निर्णय लियाइसके लिए पाकिस्तानी सेना के सहयोग की जरूरत थी जिसके तालिबान से गहरे संबंध थेपाकिस्तानी सैनिक शासकों ने पाकिस्तान की जनता की राय के विरुद्ध अमेरिकी हमले में सहयोग किया तथा इस हमले में पाकिस्तान के फौजी अड्डों, विमानपट्टियों, बंदरगाहों का इस्तेमाल किया

परन्तु अफगानिस्तान पर कब्जे के विरुद्ध अफगान जनता के राष्ट्रीय युद्ध के तेज होने से अमेरिकी हमलावरों की मुश्किलें बढ़ने लगींअपनी ताकत के दंभ में अमेरिकी शासकों ने इतिहास के सबकों को दरकिनार किया तो इतिहास उन्हें सबक सिखाने के लिए आगे बढ़ाअफगानिस्तान में राष्ट्रीय युद्ध तेज होने लगा तो अमेरिका ब्रिटेन के शासकों की नींद उड़ गईबुशब्लेयर के अनुसार 21वीं शताब्दी के लोकतंत्रा की लड़ाई, पश्चिमी सभ्यता के अस्तित्व की लड़ाई अफगानिस्तान में लड़ी जा रही हैअफगान जनता के राष्ट्रीय संघर्ष ने जहां और फौजें भेजना जरूरी बना दिया, वहीं अन्य सहयोगी देश की काटने लगेआज दक्षिण अफगानिस्तान में 50 हजार से धिक अमेरिकीब्रिटिश तैनात और युद्ध की हालत यह है कि एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार आधे से धिक अफगानिस्तान अमेरिकीब्रिटिश हमलावरों के खिलाफ लड़ने वाली ताकतों के हाथ में हैयुद्ध काबुल के धिकाधिक करीब आता जा रहा हैअफगानिस्तान की भौगोलिक परिस्थिति जनता में विदेशी कब्जे के खिलाफ गुस्सा आतंकवादविरोधी अमेरिकी युद्ध के पहले मोर्चे पर उनकी हालत खस्ता किये हुए है

अफगानिस्तान पर अमेरिकी सैन्य कब्जे में पाकिस्तानी सेना के सहयोग ने मुशर्रफ शासक गुट की मुश्किलों को काफी बढ़ा दियाअमेरिकाब्रिटेन के फौजी कब्जे के विरुद्ध संघर्ष में दक्षिण दक्षिणपूर्व अफगानिस्तान के अफगान (पख्तून या पठान) बहुल क्षेत्रा संघर्ष का केन्द्र बने हुए हैंअफगानिस्तान की लगभग आधी आबादी पख्तूनों की है जो इन क्षेत्रों में केन्द्रित हैंअफगानिस्तान में लगभग डेढ़ करोड़ पख्तून हैंपरन्तु इसके दोगुने से धिक पख्तून पाकिस्तान में रहते हैं (लगभग 3.5 करोड़)। पाकिस्तान का उत्तरपश्चिम सीमा प्रान्त तथा सीमावर्ती कबीलाई क्षेत्रा (फाटा) पख्तून बहुल हैंबलोचिस्तान में भी पख्तून आबादी का बड़ा हिस्सा है (लगभग ३८ प्रतिशत) तथा प्रान्त की राजधानी क्वेटा में पख्तून आबादी का बहुमत हैभारत पर शासन के समय ब्रिटिश उपनिवेशवादियों ने अफगान क्षेत्रों पर कब्जा कर एक हिस्से को अपने शासन में ले लियाडुरण्ड रेखा के दोनों ओर, अफगानिस्तान पाकिस्तान में, रहने वाले पख्तून एक ही लोग हैंपाकिस्तान की सेना में भी पख्तूनों (पठानों) की अच्छी संख्या हैपंजाबियों के बाद उनकी संख्या सबसे ज्यादा है

अफगानिस्तान के पख्तून क्षेत्रों में राष्ट्रीय युद्ध तेज होने के साथ अमेरिकाब्रिटेन उनकी कठपुतली कर्जई सरकार ने राष्ट्रीय युद्ध को पाकिस्तान के सीमावत्र्ती पख्तून क्षेत्रों से मिलने वाले समर्थन का हल्ला मचाना शुरू कर दियाअमेरिकापरस्त पाकिस्तान के फौजी शासकों ने अमेरिकी साम्राज्यवादी शासकों के इशारे पर अपनी जनता के खिलाफ युद्ध घोषित कर दियानिश्चय ही इसकी प्रतिक्रिया पाकिस्तानी सेना में भी होनी थीसेना की टुकडि़यां जनता के साथ जा मिलीं जिसे `आत्मसमर्पणका नाम दिया गया। 200 र्सैनिक बलों ने स्वात घाटी में तथा उसके पहले दक्षिण वजीरस्तान में 280 सैनिकों ने `आत्मसमर्पणकियाये आत्मसर्मपण पाकिस्तानी जनता के अमेरिका से युद्ध में सहयोग के विरुद्ध थेसाथ ही बलोचिस्तान में जनता द्वारा शोषण दमन के खिलाफ संघर्ष तेज होने पर पाकिस्तानी सेना ने क्रूर दमन तेज कर दियानवाब बुगती बाद में मारी सेना के खिलाफ लड़ते हुए शहीद हुएदूसरी ओर, फौजी तानाशाही द्वारा अमेरिका के सहयोग से जनता के जनवादी धिकारों के हनन के खिलाफ आवाज उठनी शुरू हो गईसेना द्वारा `आतंकवादविरोधके नाम पर नागरिकों के अपहरणों हत्याओं के खिलाफ संघर्ष में न्यायपालिका भी भूमिका अदा करने लगीजनहत्याओं की जांच से बौखलाये फौजी शासक मुशर्रफ ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश इफ्तिखार चौधरी को बर्खास्त कर दियावकीलों के देशव्यापी संघर्ष तथा इसे मिले व्यापक जन समर्थन ने इफ्तिखार चौधरी को बहाल करा दियाइस जीत के बाद न्यायपालिका की भूमिका और बढ़ गयी तथा सैन्य सत्ता को चुनौती मिलने लगी

फौजी तानाशाही को नागरिक लबादा ओढ़ाने की कोशिश

पाकिस्तान में फौजी शासन के खिलाफ बढ़ते जनाक्रोश के चलते अमेरिकी शासकों ने सैन्य शासन को `नागरिक लबादाओढ़ाने के प्रयास शुरू कर दिये तथा फौजी शासकों अमेरिकापरस्त राजनीतिक नेताओं को साथ लाने के प्रयास तेज हुएबेनजीर भुट्टो, जो भ्रष्टाचार के मुकदमों के कारण विदेश में रह रही थी, को मुशर्रफ के साथ सत्ता में भागीदारी के लिए तैयार किया गयामुशर्रफबेनजीर समझौते के तहत बेनजीर भुट्टो के खिलाफ मुकदमे वापस ले लिये गये तथा वे पाकिस्तान लौटींइमर्जेन्सी के बावजूद बेनजीर को राजनीतिक छूट दी गयीइमर्जेन्सी का मौखिक विरोध करने के साथ ही बेनजीर भुट्टो ने मुशर्रफ द्वारा चुनावों की घोषणा का स्वागत किया तथा मुशर्रफ के `राष्ट्रपतिके रूप में चुनाव में सहयोग कियाबेनजीर भुट्टो बारबार घोषित कर रही हैं कि पाकिस्तान के सामने मुख्य चुनौती अमेरिकापरस्त फौजी तानाशाही नहीं, बल्कि आतंकवाद हैनिश्चय ही यह अमेरिका की छत्राछाया में मुशर्रफबेनजीर समझौते की प्रतिवनि है

मुशर्रफ द्वारा अपदस्थ किये गये फौजी तानाशाह जियाउलहक के चहेते नवाज शरीफ ने सितम्बर 2007 में पाकिस्तान लौटने की कोशिश की परन्तु सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद फौजी शासकों ने उन्हें वापस सऊदी अरब भेज दियाअमेरिकापरस्त सऊदी शासकों ने जेलर का काम कियामुशर्रफबेनजीर समझौते के जनता में बेनकाब होने पर नवाज शरीफ को भी शामिल करने के प्रयास शुरू हुए जिसमें सऊदी शासकों ने अहम भूमिका निबाहीमुशर्रफ सऊदी अरब गये तथा वरिष्ठ सैन्य धिकारी ने नवाज शरीफ से मुलाकात कीइस `समझौतेके बाद नवाज शरीफ पाकिस्तान लौटेअमेरिका तथा सऊदी शासकों ने नवाज शरीफ से चुनावों में भाग लेने का आश्वासन लियापाकिस्तान लौटने के बाद नवाज शरीफ ने चुनाव बहिष्कार की बात की अगर बेनजीर भुट्टो भी ऐसा करें जबकि उन्हें अच्छी तरह मालूम है कि बेनजीर भुट्टो चुनावों के बाद मुशर्रफ के साथ सत्ता में भागीदारी के लिए ही पाकिस्तान लौटी हैंनवाज शरीफ बातें चुनाव बहिष्कार की कर रहे हैं, परन्तु उनके द्वारा बेनजीर भुट्टो द्वारा बहिष्कार की शर्त रखना उनकी और उनकी पार्टी की अन्तद्र्वन्द की स्थिति को दर्शाता हैनवाज शरीफ की यह शर्त वास्तव में चुनावों में भागीदारी करने की उनकी प्रतिबद्धता का नतीजा है

इस तरह अमेरिकी प्रशासन ने पाकिस्तान के फौजी शासकों तथा अमेरिकापरस्त राजनीतिज्ञों को एक मंच पर लाने की कोशिश की है जिसका मकसद अमेरिका के हितों की सेवा हैदूसरी ओर, पाकिस्तान की जनता अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ गुस्से से भरी हैआल पार्टी डेमोक्रेटिक मूवमेन्ट (एपीडीएम) ने चुनावों के बहिष्कार की घोषणा की हैयद्यपि पाकिस्तान की दो बड़ी पार्टियां बेनजीर भुट्टो की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी नवाज शरीफ की पाकिस्तान मुस्लिम लीग चुनावों में भाग ले रही हैं तथापि चुनाव बहिष्कार की सभाओं में जनता की व्यापक हिस्सेदारी हो रही है जबकि चुनावों में भाग लेने वाली पार्टियों की सभाएं काफी हल्की हैंपाकिस्तान में जनवाद के लिए संघर्ष करने वाले वकील, जज, मीडियाकर्मी तथा जनता के अन्य तबके इन चुनावों के प्रति उत्साहित नहीं

अमेरिकी प्रशासन, पाकिस्तान के फौजी शासकों तथा अमेरिकापरस्त राजनीतिज्ञों द्वारा व्यापक जनता के संघर्ष की भावना को दरकिनार कर चुनाव आयोजित किये जा रहे हैंपरन्तु अमेरिकापरस्त फौजी शासन के खिलाफ जनता के विरोध की छाया चुनावों पर पड़ना लाजिमी हैमुशर्रफ द्वारा बर्खास्त किये गये सुप्रीम कोर्ट तथा हाई कोर्टों के जज अभी भी गिरफ्तार हैं तथा उनकी बहाली व्यापक जनता की मांग हैपाकिस्तान आज एक नाजुक मोड़ पर हैआगामी चुनाव जनता के संघर्ष के मौजूदा दौर का पटाक्षेप होकर इसमें एक पड़ाव भर साबित होंगे

पाकिस्तान के इस घटनाक्रम में भारतीय शासकों की प्रतिक्रिया भी गौरतलब हैपाकिस्तान की हर मुश्किल का भरपूर फायदा उठाने को लालायित भारतीय शासकों ने परवेज मुशर्रफ की इमर्जेन्सी तथा अन्य सभी कदमों के प्रति `बेहद संवेदनशीलरवैया अपनायासरकार के मुख्य सुरक्षा सलाहकार ने मुशर्रफ का खुलेआम समर्थन कियायहां तक कि मुशर्रफ पर लगातार हमला करने वाली भाजपा भी चुप्पी साधे हुए हैभारतीय शासकों द्वारा पाकिस्तानी शासकों के प्रति `उदाररवैये के मूल में उनकी अमेरिकी शासकों से मजबूत होते रिश्ते काम कर रहे हैंसीपीएम।, सीपीआईके `अमेरिकाविरोध के बावजूद ये पार्टियां भी चुप रहींदेश के शासक वर्गों की अमेरिकापरस्ती का यह एक अच्छा उदाहरण हैपाकिस्तान में इमर्जेन्सी के विरोध का स्वर भारत में केवल क्रान्तिकारी ताकतों तक सीमित रहा

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