3 नवम्बर, 2007 को अमेरिका–समर्थित पाकिस्तानी फौजी तानाशाह परवेज मुशर्रफ ने पाकिस्तान में खुली फौजी तानाशाही लागू कर दी। संविधान को निलंबित कर अस्थाई संवैधानिक आदेश जारी कर दिया, पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश इफ्तिखार चौधरी को पद से हटाकर गिरफ्तार कर लिया, सर्वोच्च न्यायालय के अधिकांश न्यायाधीशों को पदमुक्त कर नजरबंद कर दिया। मीडिया पर प्रतिबंध लगा दिये तथा निजी चैनलों को बंद कर दिया। राजनीतिक दलों के हजारों–हजार कार्यकर्ताओं व नेताओं को गिरफ्तार किया गया। सभाओं, प्रदर्शनों व हर किस्म के विरोध पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
यद्यपि परवेज मुशर्रफ ने इसे आपातकाल घोषित किया परन्तु यह मार्शल लॉ है। खुद मुशर्रफ ने यह घोषणा राष्ट्रपति के रूप में नहीं बल्कि सेनायक्ष के रूप में की। न केवल संविधान को निलंबित किया बल्कि न्यायाधीशों को अस्थाई संवैधानिक आदेश के तहत दुबारा शपथ दिलाई तथा ऐसी शपथ न लेने वाले न्यायाधीशों को हटा दिया व गिरफ्तार किया। सर्वोच्च न्यायालय के 17 में से 10 न्यायाधीशों व उच्च न्यायालयों के 97 में से 60 न्यायाधीशों ने शपथ लेने से इंकार कर दिया। एक अन्य आदेश के द्वारा इस तथाकथित आपातकाल को न्यायालयों में चुनौती देने को वर्जित कर दिया। `आपातकाल‘ का विरोध करने वालों पर आतंकवाद व राजद्रोह के मुकदमे बनाये जा रहे हैं तथा एक अधिघोषणा के द्वारा इन मुकदमों को सैन्य अदालतों में चलाने का प्राविधान किया गया है। पूरा घटनाक्रम स्पष्ट करता है कि `आपातकाल‘ के नाम पर मार्शल लॉ लागू किया गया है।
व्यापक विरोध : क्रूर दमन
मार्शल लॉ घोषित किये जाने का पूरे पाकिस्तान में व्यापक विरोध हो रहा है जिसको फौज व पुलिस द्वारा बर्बरता से कुचला जा रहा है। पाकिस्तान के सभी प्रान्तों पंजाब, सिंध, बलोचिस्तान तथा उत्तर–पश्चिम सीमा प्रान्त में वकीलों ने बड़े विरोध प्रदर्शन किये जिन्हें बर्बरता से कुचला जा रहा है एवं वकीलों को गिरफ्तार किया जा रहा है। वकीलों द्वारा अस्थाई संवैधानिक आदेश के तहत शपथ लेने वाले न्यायाधीशों का बहिष्कार किया गया।
मार्शल लॉ के खिलाफ मीडियाकर्मियों के भी व्यापक विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। इन प्रदर्शनों को पुलिस ने क्रूरता से कुचला है। पुलिस कार्रवाई में अनेक पत्राकारों को गंभीर चोटें आई हैं तथा कई पत्राकारों को आतंकवाद– विरोधी कानून के तहत गिरफ्तार किया गया है।
मार्शल लॉ के खिलाफ विभि शहरों में छात्रो व अयापकों के प्रदर्शन जारी हैं। लाहौर, रावलपिंडी, पेशावर, कराची, क्वेटा व अन्य शहरों में छात्रा व अयापकों के प्रदर्शनों के नेताओं को गिरफ्तार किया गया है। रावलपिंडी में 14 विश्वविद्यालय शिक्षकों पर मार्शल लॉ के विरुद्ध प्रदर्शन करने के जुर्म में राजद्रोह का मुकदमा बनाया गया है। मार्शल लॉ के विरुद्ध प्रदर्शन करने पर कराची प्रैस क्लब के सामने से बलोच नेशनल पार्टी व नेशनल वर्कर्स पार्टी के नेताओं को राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। वामपंथी पार्टियों के मोर्चे अवामी जम्हूरी तहरीक के 200 से अधिक नेता व कार्यकर्ता मार्शल लॉ का विरोध करने के लिए गिरफ्तार हैं।
मार्शल लॉ के खिलाफ पाकिस्तान की जनता के सभी तबके संघर्षरत हैं तथा देश के फौजी शासक दमन के द्वारा इस विरोध को कुचलने का प्रयास कर रहे हैं। पुलिस प्रदर्शनकारियों पर बर्बरता से दमन करे, इसे सुनिश्चित करने के लिए पुलिस के साथ सेना के खुफिया विभाग के अफसर रहते हैं।
अमेरिकी समर्थन
मार्शल लॉ की घोषणा की पृष्ठभूमि का विश्लेषण करने से पहले अमेरिकी प्रशासन के रवैये को समझना प्रासंगिक है। अमेरिकी प्रशासन के प्रवक्ता ने स्वयं स्वीकार किया कि मुशर्रफ द्वारा मार्शल लॉ की घोषणा की अमेरिकी राष्ट्रपति व प्रशासन को कम से कम एक सप्ताह पूर्व से जानकारी थी। मार्शल लॉ की घोषणा के दिन कथित रूप से अमेरिकी विदेश सचिव कोंडालीजा राइस ने मुर्शरफ से मार्शल लॉ घोषित न करने के लिए कहा। तीसरी दुनिया के देशों में `जनवाद‘ के लिए आतुर दिखने वाले बुश ने मार्शल लॉ की घोषणा के सात दिन बाद तक भी कोई प्रतिक्रिया देना जरूरी नहीं समझा। सात दिन बाद बुश ने मुशर्रफ से बातचीत की तथा कथित रूप से दो बातों पर जोर दिया चुनाव कराये जायें तथा मुशर्रफ फौजी वर्दी छोड़ दें। न मार्शल लॉ की घोषणा का जिक्र, न संविधान निरस्त करने का, न न्यायाधीशों को गिरफ्तार करने का, न राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी का और न ही विरोध के फौजी दमन का। मुशर्रफ किसी तरह चुनावों का ढकोसला कर दे तो अमेरिकी प्रशासन खुश। जाहिर है कि इसमें मुशर्रफ को क्या एतराज हो सकता है ? साथ ही अमेरिकी राष्ट्रपति बुश ने आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध अर्थात अफगानिस्तान पर अमेरिकी सैनिक कब्जे में सहयोग के लिए मुशर्रफ की भूरि–भूरि प्रशंसा की।
हाल में अमेरिका के विदेश उपसचिव नागरपोंते पाकिस्तान आये तथा उन्होंने मुशर्रफ व सेना के नवनियुक्त उपायक्ष कयानी से बातचीत की। `जनवाद‘ की स्थापना की खोखली बयानबाजी के साथ नागरपोंते ने मुशर्रफ की अमेरिका के आतंकवाद– विरोधी युद्ध में सहयोग के लिए प्रशंसा की तथा `आतंकवाद‘ के बढ़ते प्रभाव को पाकिस्तान के सामने सबसे बड़ी चुनौती बताया। नागरपोंते के अनुसार अमेरिकी प्रशासन पाकिस्तान को मुशर्रफ के नेतृत्व में एक उदार, समृद्ध व लोकतांत्रिाक देश देखना चाहता है। उनके बयान से स्पष्ट है कि अमेरिकी प्रशासन पाकिस्तान को फौजी तानाशाही में रखना चाहता है। अमेरिकी साम्राज्यवादी शासकों के लिए लोकतंत्रा उन्हीं देशों के लिए उपयुक्त है जो पूरी तरह अमेरिकी प्रभाव में नहीं हैं, पाकिस्तान के लिए उनकी नजर में फौजी तानाशाही ही उपयुक्त है।
मार्शल लॉ की घोषणा पर अमेरिकी प्रशासन की प्रतिक्रिया से स्पष्ट है कि न केवल मार्शल लॉ को अमेरिकी प्रशासन का समर्थन प्राप्त है बल्कि असल में उनकी सहमति व शह पर ही मुशर्रफ ने मार्शल लॉ घोषित किया है। अमेरिका द्वारा मुशर्रफ शासक गुट को मार्शल लॉ थोपने के लिए प्रेरित करने के पीछे असली कारण अफगानिस्तान में तेज होता राष्ट्रीय युद्ध तथा अमेरिकी सेना की बढ़ती मुश्किलें हैं जिसके लिए अमेरिका पाकिस्तान सेना का और खुला इस्तेमाल करना चाहता है। पाकिस्तान में मार्शल लॉ की घोषणा के बाद अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना के कमाण्डर ने कहा कि उन्हें सही मायनों में अब पाकिस्तानी सेना का सहयोग मिलना शुरू हुआ है।
मार्शल लॉ की पृष्ठभूमि
पाकिस्तान के लिए सेना का शासन कोई अप्रत्याशित या आकस्मिक बात नहीं है बल्कि 1947 में सत्ता के हस्तांतरण के बाद से अधिकांश समय वहां सेना का ही शासन रहा है। इस्कदंर मिर्जा द्वारा अयूब खां से मिलकर सैन्य शासन लाने के बाद से ज्यादातर समय वहां सेना का ही शासन रहा है तथा जब सेना का प्रत्यक्ष शासन नहीं भी रहा तब भी सत्ता के शीर्ष स्थानों पर सेना का कब्जा रहा है। पिछली शताब्दी के आठवें व अन्तिम दशक में निर्वाचित सरकारों के शासनकाल में भी सत्ता में सेना का हस्तक्षेप काफी अधिक था। पाकिस्तान की दो बड़ी राजनीतिक पार्टियां पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी व पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज शरीफ) सैनिक तानाशाहों की छत्राछाया में ही बढ़ीं। यह अलग बात है कि बाद में सैन्य तख्तापलट में इनको निशाना बनाया गया। अपने शासन को जनता की नजर में वैध ठहराने के लिए जहां नागरिक शासन का लबादा ओढ़ना सेना के बड़े अफसरों की जरूरत है, वहीं `नागरिक शासन‘ को सीमा में रखने व अपने वर्चस्व की स्थापना के लिए इन्हें सत्ताच्युत करना इनकी मजबूरी।
पाकिस्तान में शुरू से ही सामन्ती–सैन्य तानाशाही रही है तथा वहां दलाल नौकरशाह पूंजी कमजोर रही है। पाकिस्तान के अधिकांश क्षेत्रों में सामन्ती सामाजिक ढांचा है तथा लोकतांत्रिक ढांचे की बुनियाद कमजोर रही है। भारत की तरह पाकिस्तान में भी सत्ता का हस्तांतरण हुआ, साम्राज्यवादी दबदबा बना रहा। साम्राज्यवाद का सामंतवाद से गठजोड़ मजबूत रहा तथा दलाल नौकरशाह पूंजीवाद अपेक्षाकृत कमजोर। भारतीय शासकों के विस्तारवादी दबाव व कश्मीर के सवाल पर दोनों देशों के बीच विवाद की पृष्ठभूमि में पाकिस्तानी सेना पर अमेरिकी साम्राज्यवाद का प्रभाव बढ़ता गया। पाकिस्तानी सेना साम्राज्यवाद के हित साधन का उपकरण बन गई। 1977 में जियाउलहक व 1999 में परवेज मुशर्रफ द्वारा तख्तापलट को अमेरिकी साम्राज्यवाद का समर्थन प्राप्त रहा। अमेरिकी साम्राज्यवाद पाकिस्तान में लोकतंत्रा के लिए संघर्ष का बड़ा दुश्मन रहा है। 2000 में राष्ट्रपति के चुनाव में, तब उम्मीदवार, जार्ज बुश को पाकिस्तान के फौजी तानाशाह का नाम तो पता नहीं था परन्तु उनकी यह मान्यता जरूर थी कि फौजी तानाशाही पाकिस्तान में स्थायित्व ला रही थी।
मुशर्रफ के मार्शल लॉ की पृष्ठभूमि
1999 में अमेरिका के समर्थन से तख्तापलट के जरिये मुशर्रफ सत्ता में आया। अमेरिका पाकिस्तानी सेना तथा अफगानिस्तान में उसके प्रभाव का इस्तेमाल मय एशिया के देशों में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए करना चाहता था। उल्लेखनीय है कि अफगानिस्तान की तालिबान सरकार को तीन अमेरिका–परस्त देशों सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात व पाकिस्तान से ही मान्यता प्राप्त थी। बाद में तालिबान सरकार से बढ़ते मतभेदों व 11 सितम्बर के बाद आतंकवाद– विरोधी युद्ध के पहले कदम के रूप में अमेरिका ने रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण अफगानिस्तान पर फौजी कब्जा करने का निर्णय लिया। इसके लिए पाकिस्तानी सेना के सहयोग की जरूरत थी जिसके तालिबान से गहरे संबंध थे। पाकिस्तानी सैनिक शासकों ने पाकिस्तान की जनता की राय के विरुद्ध अमेरिकी हमले में सहयोग किया तथा इस हमले में पाकिस्तान के फौजी अड्डों, विमानपट्टियों, बंदरगाहों का इस्तेमाल किया।
परन्तु अफगानिस्तान पर कब्जे के विरुद्ध अफगान जनता के राष्ट्रीय युद्ध के तेज होने से अमेरिकी हमलावरों की मुश्किलें बढ़ने लगीं। अपनी ताकत के दंभ में अमेरिकी शासकों ने इतिहास के सबकों को दरकिनार किया तो इतिहास उन्हें सबक सिखाने के लिए आगे बढ़ा। अफगानिस्तान में राष्ट्रीय युद्ध तेज होने लगा तो अमेरिका व ब्रिटेन के शासकों की नींद उड़ गई। बुश–ब्लेयर के अनुसार 21वीं शताब्दी के लोकतंत्रा की लड़ाई, पश्चिमी सभ्यता के अस्तित्व की लड़ाई अफगानिस्तान में लड़ी जा रही है। अफगान जनता के राष्ट्रीय संघर्ष ने जहां और फौजें भेजना जरूरी बना दिया, वहीं अन्य सहयोगी देश की काटने लगे। आज दक्षिण अफगानिस्तान में 50 हजार से अधिक अमेरिकी–ब्रिटिश तैनात ह और युद्ध की हालत यह है कि एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार आधे से अधिक अफगानिस्तान अमेरिकी–ब्रिटिश हमलावरों के खिलाफ लड़ने वाली ताकतों के हाथ में है। युद्ध काबुल के अधिकाधिक करीब आता जा रहा है। अफगानिस्तान की भौगोलिक परिस्थिति व जनता में विदेशी कब्जे के खिलाफ गुस्सा आतंकवाद– विरोधी अमेरिकी युद्ध के पहले मोर्चे पर उनकी हालत खस्ता किये हुए है।
अफगानिस्तान पर अमेरिकी सैन्य कब्जे में पाकिस्तानी सेना के सहयोग ने मुशर्रफ शासक गुट की मुश्किलों को काफी बढ़ा दिया। अमेरिका–ब्रिटेन के फौजी कब्जे के विरुद्ध संघर्ष में दक्षिण व दक्षिण–पूर्व अफगानिस्तान के अफगान (पख्तून या पठान) बहुल क्षेत्रा संघर्ष का केन्द्र बने हुए हैं। अफगानिस्तान की लगभग आधी आबादी पख्तूनों की है जो इन क्षेत्रों में केन्द्रित हैं। अफगानिस्तान में लगभग डेढ़ करोड़ पख्तून हैं। परन्तु इसके दोगुने से अधिक पख्तून पाकिस्तान में रहते हैं (लगभग 3.5 करोड़)। पाकिस्तान का उत्तर–पश्चिम सीमा प्रान्त तथा सीमावर्ती कबीलाई क्षेत्रा (फाटा) पख्तून बहुल हैं। बलोचिस्तान में भी पख्तून आबादी का बड़ा हिस्सा है (लगभग ३८ प्रतिशत) तथा प्रान्त की राजधानी क्वेटा में पख्तून आबादी का बहुमत है। भारत पर शासन के समय ब्रिटिश उपनिवेशवादियों ने अफगान क्षेत्रों पर कब्जा कर एक हिस्से को अपने शासन में ले लिया। डुरण्ड रेखा के दोनों ओर, अफगानिस्तान व पाकिस्तान में, रहने वाले पख्तून एक ही लोग हैं। पाकिस्तान की सेना में भी पख्तूनों (पठानों) की अच्छी संख्या है। पंजाबियों के बाद उनकी संख्या सबसे ज्यादा है।
अफगानिस्तान के पख्तून क्षेत्रों में राष्ट्रीय युद्ध तेज होने के साथ अमेरिका–ब्रिटेन व उनकी कठपुतली कर्जई सरकार ने राष्ट्रीय युद्ध को पाकिस्तान के सीमावत्र्ती पख्तून क्षेत्रों से मिलने वाले समर्थन का हल्ला मचाना शुरू कर दिया। अमेरिका–परस्त पाकिस्तान के फौजी शासकों ने अमेरिकी साम्राज्यवादी शासकों के इशारे पर अपनी जनता के खिलाफ युद्ध घोषित कर दिया। निश्चय ही इसकी प्रतिक्रिया पाकिस्तानी सेना में भी होनी थी। सेना की टुकडि़यां जनता के साथ जा मिलीं जिसे `आत्मसमर्पण‘ का नाम दिया गया। 200 आर्सैनिक बलों ने स्वात घाटी में तथा उसके पहले दक्षिण वजीरस्तान में 280 सैनिकों ने `आत्मसमर्पण‘ किया। ये आत्मसर्मपण पाकिस्तानी जनता के अमेरिका से युद्ध में सहयोग के विरुद्ध थे। साथ ही बलोचिस्तान में जनता द्वारा शोषण व दमन के खिलाफ संघर्ष तेज होने पर पाकिस्तानी सेना ने क्रूर दमन तेज कर दिया। नवाब बुगती व बाद में मारी सेना के खिलाफ लड़ते हुए शहीद हुए। दूसरी ओर, फौजी तानाशाही द्वारा अमेरिका के सहयोग से जनता के जनवादी अधिकारों के हनन के खिलाफ आवाज उठनी शुरू हो गई। सेना द्वारा `आतंकवाद– विरोध ‘ के नाम पर नागरिकों के अपहरणों व हत्याओं के खिलाफ संघर्ष में न्यायपालिका भी भूमिका अदा करने लगी। जन–हत्याओं की जांच से बौखलाये फौजी शासक मुशर्रफ ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश इफ्तिखार चौधरी को बर्खास्त कर दिया। वकीलों के देशव्यापी संघर्ष तथा इसे मिले व्यापक जन समर्थन ने इफ्तिखार चौधरी को बहाल करा दिया। इस जीत के बाद न्यायपालिका की भूमिका और बढ़ गयी तथा सैन्य सत्ता को चुनौती मिलने लगी।
फौजी तानाशाही को नागरिक लबादा ओढ़ाने की कोशिश
पाकिस्तान में फौजी शासन के खिलाफ बढ़ते जनाक्रोश के चलते अमेरिकी शासकों ने सैन्य शासन को `नागरिक लबादा‘ ओढ़ाने के प्रयास शुरू कर दिये तथा फौजी शासकों व अमेरिका–परस्त राजनीतिक नेताओं को साथ लाने के प्रयास तेज हुए। बेनजीर भुट्टो, जो भ्रष्टाचार के मुकदमों के कारण विदेश में रह रही थी, को मुशर्रफ के साथ सत्ता में भागीदारी के लिए तैयार किया गया। मुशर्रफ–बेनजीर समझौते के तहत बेनजीर भुट्टो के खिलाफ मुकदमे वापस ले लिये गये तथा वे पाकिस्तान लौटीं। इमर्जेन्सी के बावजूद बेनजीर को राजनीतिक छूट दी गयी। इमर्जेन्सी का मौखिक विरोध करने के साथ ही बेनजीर भुट्टो ने मुशर्रफ द्वारा चुनावों की घोषणा का स्वागत किया तथा मुशर्रफ के `राष्ट्रपति‘ के रूप में चुनाव में सहयोग किया। बेनजीर भुट्टो बार–बार घोषित कर रही हैं कि पाकिस्तान के सामने मुख्य चुनौती अमेरिका–परस्त फौजी तानाशाही नहीं, बल्कि आतंकवाद है। निश्चय ही यह अमेरिका की छत्राछाया में मुशर्रफ–बेनजीर समझौते की प्रतिवनि है।
मुशर्रफ द्वारा अपदस्थ किये गये फौजी तानाशाह जिया–उल–हक के चहेते नवाज शरीफ ने सितम्बर 2007 में पाकिस्तान लौटने की कोशिश की परन्तु सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद फौजी शासकों ने उन्हें वापस सऊदी अरब भेज दिया। अमेरिका–परस्त सऊदी शासकों ने जेलर का काम किया। मुशर्रफ–बेनजीर समझौते के जनता में बेनकाब होने पर नवाज शरीफ को भी शामिल करने के प्रयास शुरू हुए जिसमें सऊदी शासकों ने अहम भूमिका निबाही। मुशर्रफ सऊदी अरब गये तथा वरिष्ठ सैन्य अधिकारी ने नवाज शरीफ से मुलाकात की। इस `समझौते‘ के बाद नवाज शरीफ पाकिस्तान लौटे। अमेरिका तथा सऊदी शासकों ने नवाज शरीफ से चुनावों में भाग लेने का आश्वासन लिया। पाकिस्तान लौटने के बाद नवाज शरीफ ने चुनाव बहिष्कार की बात की अगर बेनजीर भुट्टो भी ऐसा करें जबकि उन्हें अच्छी तरह मालूम है कि बेनजीर भुट्टो चुनावों के बाद मुशर्रफ के साथ सत्ता में भागीदारी के लिए ही पाकिस्तान लौटी हैं। नवाज शरीफ बातें चुनाव बहिष्कार की कर रहे हैं, परन्तु उनके द्वारा बेनजीर भुट्टो द्वारा बहिष्कार की शर्त रखना उनकी और उनकी पार्टी की अन्तद्र्वन्द की स्थिति को दर्शाता है। नवाज शरीफ की यह शर्त वास्तव में चुनावों में भागीदारी करने की उनकी प्रतिबद्धता का नतीजा है।
इस तरह अमेरिकी प्रशासन ने पाकिस्तान के फौजी शासकों तथा अमेरिका–परस्त राजनीतिज्ञों को एक मंच पर लाने की कोशिश की है जिसका मकसद अमेरिका के हितों की सेवा है। दूसरी ओर, पाकिस्तान की जनता अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ गुस्से से भरी है। आल पार्टी डेमोक्रेटिक मूवमेन्ट (एपीडीएम) ने चुनावों के बहिष्कार की घोषणा की है। यद्यपि पाकिस्तान की दो बड़ी पार्टियां बेनजीर भुट्टो की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी व नवाज शरीफ की पाकिस्तान मुस्लिम लीग चुनावों में भाग ले रही हैं तथापि चुनाव बहिष्कार की सभाओं में जनता की व्यापक हिस्सेदारी हो रही है जबकि चुनावों में भाग लेने वाली पार्टियों की सभाएं काफी हल्की हैं। पाकिस्तान में जनवाद के लिए संघर्ष करने वाले वकील, जज, मीडियाकर्मी तथा जनता के अन्य तबके इन चुनावों के प्रति उत्साहित नहीं ह।
अमेरिकी प्रशासन, पाकिस्तान के फौजी शासकों तथा अमेरिका–परस्त राजनीतिज्ञों द्वारा व्यापक जनता के संघर्ष की भावना को दरकिनार कर चुनाव आयोजित किये जा रहे हैं। परन्तु अमेरिका–परस्त फौजी शासन के खिलाफ जनता के विरोध की छाया चुनावों पर पड़ना लाजिमी है। मुशर्रफ द्वारा बर्खास्त किये गये सुप्रीम कोर्ट तथा हाई कोर्टों के जज अभी भी गिरफ्तार हैं तथा उनकी बहाली व्यापक जनता की मांग है। पाकिस्तान आज एक नाजुक मोड़ पर है। आगामी चुनाव जनता के संघर्ष के मौजूदा दौर का पटाक्षेप न होकर इसमें एक पड़ाव भर साबित होंगे।
पाकिस्तान के इस घटनाक्रम में भारतीय शासकों की प्रतिक्रिया भी गौरतलब है। पाकिस्तान की हर मुश्किल का भरपूर फायदा उठाने को लालायित भारतीय शासकों ने परवेज मुशर्रफ की इमर्जेन्सी तथा अन्य सभी कदमों के प्रति `बेहद संवेदनशील‘ रवैया अपनाया। सरकार के मुख्य सुरक्षा सलाहकार ने मुशर्रफ का खुलेआम समर्थन किया। यहां तक कि मुशर्रफ पर लगातार हमला करने वाली भाजपा भी चुप्पी साधे हुए है। भारतीय शासकों द्वारा पाकिस्तानी शासकों के प्रति `उदार‘ रवैये के मूल में उनकी अमेरिकी शासकों से मजबूत होते रिश्ते काम कर रहे हैं। सी।पी।एम।, सी।पी।आई। के `अमेरिका–विरोध‘ के बावजूद ये पार्टियां भी चुप रहीं। देश के शासक वर्गों की अमेरिका–परस्ती का यह एक अच्छा उदाहरण है। पाकिस्तान में इमर्जेन्सी के विरोध का स्वर भारत में केवल क्रान्तिकारी ताकतों तक सीमित रहा।