December 23, 2007...12:05 am

धान के कम न्यूनतम समर्थन मूल्य पर किसानों में रोष

Jump to Comments

हाल ही में धान के न्यूनतम समर्थन मूल्य में उचित वृद्धि न करने के सवाल पर दक्षिण भारत में किसानों के कई प्रदर्शन व रास्ता रोको कार्यक्रम हुए और विशेषकर आंध प्रदेश की सरकार पर काफी दबाव बना। आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु व अन्य प्रान्तों के विपक्षी दलों ने भी यू0पी0ए0 सरकार के धान के किसानों के प्रति इस सौतेले व्यवहार पर कई सवाल किये। किसानों की मांग थी कि जब गेहूँ के किसानों को 1000 रुपये कुन्तल का रेट दिया जा सकता है तो धान के किसानों को क्यों नहीं दिया जाना चाहिये ?

इस वर्ष गेहूँ के किसानों को पिछले वर्ष की तुलना में 750 रुपये के स्थान पर 850 रुपये का रेट दिया गया। पर खेती से संबंधित कई समस्याओं के कारण, जैसे पानी के स्तर का नीचे गिरना, लगातार रासायनिक खादों के प्रयोग के कारण जमीन की उत्पादकता घट जाना; माईक्रोन्यूट्रियेन्ट्स, खाद, कीटनाशक दवाओं, डीजल आदि के दाम के बढ़ने के कारण लागत का बढ़ना आदि, गेहूँ की पैदावार पिछले कई सालों से स्थिर रही है और सरकारी भण्डार में भी गेहूँ की मात्रा खाद्य सुरक्षा से काफी कम हो गई है। इसके साथ इस वर्ष किसानों से गेहूँ की खरीद में विदेशी व निजी खरीददारों को पहले से ज्यादा छूट दी गई और उन्होंने कमोवेश सरकारी रेट से ज्यादा रेट पर, 900 से 1000 रुपये पर, गेहूँ खरीदा। इसके फलस्वरूप सरकारी खरीद इस वर्ष भी काफी कम रही और भण्डारों में कमी हो गई।

न्यूनतम सरकारी भण्डारण न केवल सरकारी राशन व्यवस्था को चलाने के लिए जरूरी है; यह जवाहर तथा रोजगार गारंटी योजनाओं, काम के बदले अनाज योजना तथा प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए भी जरूरी है। यह केवल न्यूनतम भण्डारण है, सरकार की कुल आवश्यकता इससे कहीं ज्यादा है। यह आवश्यकता लगातार बढ़नी भी चाहिये पर सरकार ने न तो अनाज की कुल खरीद बढ़ाई है और न ही अनाज की भण्डारण सीमा, जो  काफी समय से 200 लाख टन है और सरकारी खरीद लगातार घट रही है। खाद्य सुरक्षा के आते संकट और बाजार में गेहूँ के मंदे उत्पादन के नाम पर सरकार ने तुरन्त विदेश से गेहूँ का आयात किया। पहले जून में 1200 रुपये कुन्तल के रेट को महंगा बता कर बाद मे  सरकार ने लगभग 8.5 लाख टन गेहूँ 1600 रुपये कुन्तल पर आयात किया। इस वर्ष सरकार का कुल 23 लाख टन गेहूँ आयात करने का इरादा है। इस सवाल पर विदेशी कम्पनियों की तुलना में अपने किसानों के साथ सौतेला व्यवहार करने का जब आरोप आया तो सरकार ने गेहूँ की अगले साल की खरीद का रेट, यानी 2008 में 1000 रुपये कुन्तल करने की घोषणा अक्टूबर 2007 में कर दी।

इसी बीच दक्षिण भारत में धान की फसल की सरकारी खरीद का समय प्रारम्भ हुआ और क्योंकि खेती की लागत के बढ़ते दाम तथा घटती उत्पादकता का असर उन पर भी रहा है, उन्होंने भी अपनी धान की फसल की खरीद का 1000 रुपये प्रति कुन्तल का रेट घोषित करने की मांग उठाई। जब किसानों के बड़े–बड़े प्रदर्शन होने लगे तो संसदीय विपक्षी दल भी मैदान में कूद पड़े और अपनी तरफ से उन्होंने किसानों के पक्ष में घोषणाएं करनी शुरू कर दीं। उदाहरण के लिए तेलुगु देसम ने घोषणा की कि अगर उनकी सरकार बनी तो वह सहकारी समितियों के किसानों के सभी कर्जे माफ कर देगी और राजशेखर रेड्डी द्वारा दी जा रही 7 घंटे मुफ्त बिजली आपूर्ति को बढ़ा कर 9 घंटा कर देगी।

भाजपा ने भी इस सवाल पर मांग प्रस्तुत करते हुए प्रधानमंत्री को पत्र  लिखकर कई बातें लिखीं जो दिखाती है  कि शासक दल जानबूझकर किसानों के संकट को बढ़ा रहे ह। इनमें 1000 रुपये कुन्तल धान की खरीद की मांग के साथ–साथ उन्होंने लिखा कि भारतीय खेती के संकट से आप औरों से ज्यादा परिचित है  … दसियों लाख घरों के विनाश से एक विस्फोटक व तनावपूर्ण स्थिति पनप रही है। उत्तरोत्तर सरकारों ने अपने गैरगम्भीर तथा अंशकालिक नजरिये के कारण इस सवाल पर गहराई से चिन्तन नहीं किया है और एक दूरगामी नीति नहीं बनाई है। जब डब्ल्यू0टी0ओ0 10 फीसदी सब्सिडी की अनुमति देती है तब सरकार ने न केवल खेती को प्रत्यक्ष सहयोग नहीं दिया है बल्कि खेती दबाने और बाजारों को भ्रष्ट करने के लिए सब कदम उठाए है । जाहिर है कि इस आलोचना में वे खुद भी शामिल है

केन्द्र सरकार ने इस सवाल पर पहले तो चुप्पी साधी पर बाद में खाद्य मंत्री शरद पवार ने यह तर्क दिया कि धान की साधारण किस्मों की खरीद में की गई 25 रुपये की बढ़ोत्तरी और 50 रुपये का अतिरिक्त बोनस, जो संघर्ष प्रारम्भ होने के बाद किया गया था, पर्याप्त है और ये पिछले सालों की तुलना में सबसे बड़ी वृद्धि है। उन्होंने इसको पर्याप्त बताते हुए तर्क दिया कि जहाँ खरीदे गए गेहूँ का कुल हिस्सा आटे में परिवर्तित हो जाता है वहीं 100 किलो धान में मात्रा 65 किलो चावल निकलता है तो इस हिसाब से देखा जाए तो 695रुपये कुन्तल पर खरीदे गए 100 किलो धान में से निकले हुए 65 किलो चावल का दाम 1050 रुपये कुन्तल बैठता है। वे भूल गये कि अगर 1000 रुपये कुन्तल के गेहूँ की कीमत कुल वसूल हो जाती है तो खरीदे गए धान की भी लगभग कुल कीमत वसूल हो जाती है क्योंकि उसकी भूसी भी बिकती है और तेल भी।

इस सवाल से जुड़े तथ्यों को देखा जाए तो स्पष्ट है कि 1994–95 में गेहूँ की सरकारी खरीद 360 रुपये कुन्तल थी जबकि धान की खरीद 340 रुपये कुन्तल थी। यानी दोनों में 5–6 फीसदी का फर्क था। आज यह फर्क 30 फीसदी कर दिया गया है। जाहिर है नीतियों से उत्प संकट धान और गेहूँ दोनों के किसानों को प्रभावित करता है। पर शायद सरकारी भंडारों में धान का संकट कम है इसलिए यह दोयम व्यवहार किया जा रहा है। यह भी सच है कि पिछले 2 वर्षों में, गेहूँ की खरीद का रेट अप्रैल 2006 में 750 रुपये कुन्तल था जबकि 2008 के लिए 1000 किया गया है जबकि धान की खरीद का रेट अक्टूबर 2005 में 570 था जिसे 695 किया गया है। अगर इन्हीं 2 वर्षों को भी देखा जाए तो गेहूँ की खरीद में 33 फीसदी वृद्धि की गई है जबकि धान में इन 2 वर्षों में भी 22 फीसदी वृद्धि की गई है। इसलिए किसानों द्वारा धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य 1000 रुपये कुन्तल करने की मांग पूरी तरह न्यायोचित है।

Leave a Reply

You must be logged in to post a comment.

You must be logged in to post a comment.