December 30, 2007...11:34 pm
विस्थापन तथा सेज–विरोधी आंदोलन के सामने नई चुनौतियां
नवम्बर 5 से एक सप्ताह तक नंदीग्राम में पश्चिम बंगाल की सी.पी.एम. सरकार द्वारा विस्थापन का विरोध कर रहे किसानों के खिलाफ हिंसा के ताण्डव ने सेज तथा विस्थापन के विरुद्ध संघर्षों के सामने नई चुनौती प्रस्तुत की है। कांग्रेस नेतृत्वाधीन केन्द्र सरकार द्वारा सी..पी .एम. की राज्य सरकार को दिये गये सहयोग ने शासक वर्गों की पार्टियों के जन– विरोधी चरित्र को संघर्षरत जनता के सामने स्पष्ट कर दिया है।
नंदीग्राम से सबक लेकर उड़ीसा की बीजद–भाजपा सरकार ने पोस्को–विरोधियों पर 29 नवम्बर से हिंसक हमला शुरू किया जिसका मकसद पोस्को के संयंत्रा की स्थापना के लिए किसानों को विस्थापित करना है। कलिंगनगर में 2 जनवरी, 2006 को 13 आदिवासियों की शहादत के बाद से टाटा प्लांट के लिए विस्थापन रुका हुआ है। संघर्षरत जनता की जुझारु, एकताबद्ध ताकत ने उड़ीसा की नवीन पटनायक सरकार तथा टाटा की तमाम साजिशों को अभी तक विफल किया है। अब टाटा ने सुकिण्डा माईन्स क्षेत्रा में क्षेत्रा से कुछ युवकों को ले जाकर प्रशिक्षण का काम शुरू किया है। `सुरक्षा प्रशिक्षण’ के नाम पर कुछ युवकों को अग्नेयास्त्रा समेत विभि हथियार चलाने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। टाटा का उद्देश्य इन `प्रशिक्षित’ युवाओं को विस्थापन के विरुद्ध संघर्षरत आदिवासी किसान जनता के खिलाफ इस्तेमाल करना है तथा शासक वर्गों की पसंदीदा `कानून व्यवस्था’ की समस्या बनाकर सरकारी सुरक्षा बलों के द्वारा जनता को विस्थापित करना है। इस `प्रशिक्षण’ की खबरें छपने के बावजूद नवीन पटनायक सरकार द्वारा इसके खिलाफ कोई कार्रवाई न करना साबित करता है कि राज्य सरकार इस साजिश में शामिल है।
देश भर में सेज व विस्थापन के विरुद्ध संघर्षों पर दमन का नया दौर शासक वर्गों की पार्टियों के चरित्रा को बेनकाब कर रहा है। जहां ये पार्टियां विपक्ष में हैं वहां वे संघर्षरत जनता से हमदर्दी का दिखावा करती हैं परन्तु जहां वे सरकार में हैं वहां वे दमन कर रही हैं। नंदीग्राम की किसान जनता के दर्द पर घडि़याली आंसू बहाने वाली भाजपा व अडवाणी पोस्को– विरोधी आन्दोलन के दमन में भागीदार हैं। कांग्रेस व सी.पी.एम. में नंदीग्राम पर इसीलिए समझौता हो सका क्योंकि दोनों ही पार्टियां सेज तथा किसानों के विस्थापन की समर्थक हैं। कांग्रेस केवल स्थानीय चुनावी फायदे के लिए विरोधी स्वर यदा–कदा अपनाती रहती है परन्तु उसकी केन्द्रीय सरकार तथा जिन राज्यों में वह सत्ता में है वहां उसकी राज्य सरकारें सेज के लिए किसानों को जबरन विस्थापित कर रही हैं। सी.पी.एम. का भी अमेरिका–भारत आणविक समझौते से कोई मूल विरोध नहीं है। चूंकि कांग्रेस व सी.पी.एम. शासक वर्गों के हितों का प्रतिनिधित्व करती हैं तथा मुख्य सवालों पर उनमें कोई मूल मतभेद नहीं है, इसलिए यह समझौता संभव हुआ।
दरअसल कांग्रेस व सी.पी.एम. नेताओं के बीच आणविक समझौते पर संसद में चर्चा पर सहमति इस प्रक्रिया में अहम मोड़ थी। निश्चय ही मनमोहन सिंह सरकार सी.पी.एम. से कुछ सहमति के बिना इस चर्चा के लिए तैयार नहीं होती। इसके फौरन बाद पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य केन्द्र सरकार को लिखते हैं कि नंदीग्राम में केन्द्रीय सुरक्षा बलों को भेजा जाये तथा केन्द्र सरकार गुजरात में चुनावों का बहाना बनाकर सुरक्षा बलों को भेजने से इंकार कर देती है। सी.पी.एम. सरकार द्वारा सुरक्षा बल भेजने का अनुरोध तथा केन्द्र सरकार द्वारा इससे इंकार उक्त समझौते के अंग थे। केन्द्रीय सुरक्षा बलों को क्षेत्रा में न घुसने देना सी.पी.एम. के अनुरोध की कलई खोल देता है तथा गुजरात में चुनावों से पहले नंदीग्राम में सुरक्षा बलों का भेजा जाना केन्द्र सरकार के इंकार का खुलासा करता है। बाद में यू.पी.ए.–`वाम’ मोर्चे की समन्वय समिति में आणविक समझौते पर संसद में चर्चा की तिथि तय की जाती है। सी.पी.एम. इससे पहले ही `आपरेशन नंदीग्राम’ पूरा करने को दृढ़ थी क्योंकि इसकी तैयारी तो उसने काफी समय से कर रखी थी।
समझौते के अनुपालन में कांग्रेस तथा उसकी सरकार नंदीग्राम के किसानों के पाशविक दमन का मूकदर्शक बनी रही। आणविक समझौते पर बहस में जहां सी.पी.एम. की तर्ज काफी नर्म रही वहीं उसके `तीसरे मोर्चे’ के अन्यतम सहयोगी समाजवादी पार्टी तथा तेलुगु देसम सरकार के पक्ष में जा खड़े हुए। इस तरह संसद में आणविक समझौते के स्वपोषित विरोधियों के बहुमत के बावजूद सरकार यह दावा कर सकी कि संसद आणविक समझौते के विरुद्ध नहीं है।
शासक वर्गों की पार्टियां सेज की स्थापना की मुहिम को तेज कर रही हैं। आंध्र प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने काकीनाडा (पूर्व गोदावरी) तथा प्रकासम–चित्तूर में नये सेज की घोषणा की है। इतना ही नहीं, सिंचाई व पीने का पानी मुहैया कराने के लिए बनाये गये बांधो से भी उद्योगों को पानी देने के लिए नीति बनाई गई है। उड़ीसा में हिराकुड बांध से उद्योगों को पानी दिये जाने के खिलाफ पश्चिम उड़ीसा में एक बड़ा जनान्दोलन खड़ा हुआ है। 30,000 से अधिक किसानों ने एक विशाल रैली कर सरकार को इसके खिलाफ चेतावनी दी है। उन्होंने एक `लक्ष्मण रेखा’ खींच दी है जिसके आगे उद्योगों की पाईपलाईनों को वे नहीं जाने देंगे।
केन्द्र सरकार की योजना पूर्वी तटीय क्षेत्रो पर विशाल विशेष आर्थिक क्षेत्रो के निर्माण की है। इससे किसानों की जमीनें व मछुआरों की आजीविका तो जाएगी ही, क्षेत्रा की नदियों के पानी को भी इन विशेष आर्थिक क्षेत्रो में स्थापित किये जाने वाले उद्योगों को दिया जाएगा। खेती के लिए सिंचाई के नये अवसर पैदा करना तो दूर, मौजूदा सिंचाई के अवसरों पर भी चोट की जा रही है। `विकास’ के नाम पर बड़े–बड़े बंदरगाह बनाये जा रहे हैं जो देश की जरूरतों से कहीं अधिक हैं।
इस पृष्ठभूमि में पार्टी ने आंध्र प्रदेश में गोदावरी नदी पर बनायी जानी वाली पोलावरम परियोजना का विरोध करने का निर्णय लिया है। इस परियोजना से न केवल एक लाख से अधिक आदिवासी बेजमीन व बेघर होंगे, इसका असली मकसद पूर्वीय तट पर विशेष आर्थिक क्षेत्रो को पानी उपलब कराना है। राज्य सरकार पहले से ही सिंचित कृष्णा–गुंटुर में सिंचाई को स्थायित्व देने की बात कर रही है जबकि तेलंगाना का विशाल भूभाग पानी के लिए तरस रहा है। इसके विकल्पों की पूरी तरह जांच–पड़ताल किये बगैर तथा विभि संस्थाओं से आवश्यक स्वीकृति हासिल किये बिना ही राजशेखर रेड्डी सरकार परियोजना पर अमल के लिए लालायित है क्योंकि इसके ठेकों में बड़ी राशि सन्निहित है। पोलावरम परियोजना जनता के हित में नहीं है तथा यह आदिवासियों को बड़े पैमाने पर विस्थापित करेगी। कांग्रेस की केन्द्र व राज्य सरकारों द्वारा लागू की जा रही नीतियों के परिप्रेक्ष्य में इस परियोजना के असली मकसद को आसानी से समझा जा सकता है।
नंदीग्राम में किसानों पर क्रूर दमन तथा इसकी तर्ज पर पोस्को– विरोधी किसानों पर हमले ने जहां शासक वर्गों की पार्टियों के विस्थापन तथा सेज–समर्थक चरित्रा को बेनकाब किया है, वहीं सेज तथा विस्थापन के विरुद्ध संघर्ष कर रही जनता, विशेषकर किसानों, के सामने नई चुनौती पेश की है। जमीन व जीविका बचाने के लिए संघर्ष शासक वर्गों की पार्टियों के भरोसे विकसित नहीं किया जा सकता क्योंकि ये सभी पार्टियां विदेशी पूंजी के हित में किसानों के विस्थापन की समर्थक हैं। साथ ही, जमीन व जीविका बचाने के लिए संघर्ष शासक वर्गों की पार्टियों की गुण्डा–वाहिनियों तथा पुलिस के हमलों का प्रतिरोध करने की तैयारी व क्षमता का विकास किये बिना आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। उच्च न्यायपालिका का रवैया विदेशी कम्पनियों तथा नई आर्थिक नीतियों का पक्षार व आम जनता के अधिकारों के विरुद्ध है, इसलिए जमीन व जीविका बचाने के लिए संघर्ष इनके भरोसे रहकर विकसित नहीं किया जा सकता। इस संघर्ष को विकसित करने के लिए किसानों की अपनी लड़ाकू क्षमता पर भरोसा करना होगा तथा इसे मजबूत करना होगा।
इसके साथ ही संघर्ष के समर्थन में व्यापक जनवादी तबकों व संगठनों की गोलबंदी जरूरी है। इसके लिए प्रगतिशील, जनवादी ताकतों को अपने प्रयास तेज करने होंगे ताकि शासक वर्गों की जन– विरोधी व राष्ट्र– विरोधी साजिशों को विफल किया जा सके।
किसानों के विस्थापन– विरोधी संघर्ष शासक वर्गों द्वारा लागू की जा रही नई आर्थिक नीतियों, देश की सम्पदा व श्रमशक्ति के शोषण व दोहन को तेज करने की साजिशों को एक ठोस चुनौती है। शासक वर्ग इस आन्दोलन को कुचलना चाहते हैं। साम्राज्यवादियों के साथ मिलकर देश का शोषण–दोहन तेज करना उनकी नीतियों के मूल में है तथा इस रास्ते में वे कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी ताकतों नक्सलवादियों को सबसे बड़ा खतरा तथा अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानते हैं। दूसरी ओर, देश की शोषित–उत्पीडि़त जनता का हित साम्राज्यवादियों तथा उनके दलालों के शोषण–उत्पीड़न को खत्म करने में है तथा साम्राज्यवाद के दलाल प्रतिक्रियावादियों की सत्ता को उखाड़कर नवजनवादी क्रान्ति के जरिये नये भारत का निर्माण करने में है। निश्चय ही शासक वर्ग उसके दुश्मन हैं। जमीन व आजीविका बचाने के लिए किसानों का संघर्ष जनता के जनवादी संघर्षों का हिस्सा हैं। कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी संगठनों को इस संघर्ष के महत्व को पहचानते हुए इनमें अपनी भूमिका बढ़ाने, संघर्षों में किसानों के साथ कंधें से कंधा मिलाकर लड़ने तथा क्रान्तिकारी आन्दोलन की दिशा में इन संघर्षों का नेतृत्व करने के अपने प्रयास तेज करने होंगे।
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