December 30, 2007...1:06 am

सी पी एम सरकार द्वारा भूमि अधिग्रहण-विरोधी किसानों पर फासीवादी हमला

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हमने उन्हीं के सिक्कों में हिसाब चुका दिया है बुद्धदेव भट्टाचार्य नंदीग्राम में सी.पी.एम. काडरों, गुण्डों . बंगाल पुलिस की हाल की उपलबियों पर फूले नहीं समा रहे हैंदूसरी ओर, सी.पी.एम. महासचिव जानना चाहते हैं कि जब वहां रासायनिक कम्पनियों का अड्डा बनना ही नहीं है तो भूमि उच्छेद प्रतिरोध कमेटी लड़ क्यों रही है? साथ ही वे कहते हैं कि सी.पी.एम. काडर पुलिस ने जो किया वह अनिवार्य था क्योंकि इलाके में माओवादी घुसे हुए हैं तथा मनमोहन सिंह कहते हैं कि माओवादी देश के लिए सबसे बड़ा खतरा हैंसी.पी.एम. के पोलित ब्यूरो सदस्य सीताराम येचुरी बताते हैं कि यह इलाका बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को तो जाना ही नहीं था, यह तो रासायनिक अड्डे के लिए जाना था

किसी भी सी.पी.एम. नेता का यह मानना नहीं है कि मार्च 2007 की हिंसा या मौजूदा दौर की हिंसा जिसमें पुलिस सशस्त्रा गुण्डे एकजुट होकर भूमि उच्छेद प्रतिरोध कमेटी के सदस्य आम किसानों पर हमले करते रहे, महिलाओं से बलात्कार करते फिरे, मारमार कर गांव से लोगों को भगा दिया गलत था

दूसरा, जैसा प्रकाश करात ने मार्च 2007 में ही स्पष्ट किया, सी.पी.एम. का कहना है कि किसानों की उपजाऊ जमीनों का जबरन धिग्रहण करना सही है तथा जो लोग इसका विरोध कर रहे हैं वे `नरोदनिकहैंकरात भट्टाचार्य के उस समय के बयानों का तात्पर्य यह है कि सी.पी.एम. बंगाल का `औद्योगिकरणकरने में लगी है तथा इसके दौरान किसानों को कुछ कुर्बानी तो करनी ही होगी क्योंकि बंगाल की लगभग सारी जमीन ही उपजाऊ है

इस बार का हिंसक दौर

हालांकि बुद्धदेव भट्टाचार्य ने मार्च 2007 की हिंसा के बाद नंदीग्राम के भूमि धिग्रहण नोटिसों को रद्द करने की बात की, पर सच्चाई यही है कि हकीकत में यह अभी भी रद्द नहीं हुआ हैतब से लेकर नवम्बर तक, विशेषकर पिछले एक महीने से, लगातार छिटपुट हिंसा नंदीग्राम में चल रही थीसाथ ही सी.पी.एम. नेताओं, विशेषकर सी.पी.एम. पोलित ब्यूरो सदस्य वृंदा करात, की शिकायत थी कि भूमि उच्छेद प्रतिरोध कमेटी ने सी.पी.एम. समर्थक कार्यकत्र्ताओं को गांव से खदेड़ दिया है और वे बेघर हो गये हैं

मनमोहन सरकार पर अपने दबाव का पूरा फायदा उठाते हुए सी.पी.एम. ने पूरी तैयारी कर बंगाल के अन्य इलाकों से काडर एकत्रा कर उन्हें हथियारों से लैस कर . बंगाल सरकार के संरक्षण में नंदीग्राम पर पुन: कब्जा जमाने के लिए घुसायाइसी तरह उसने मार्च में भी इर्दगिर्द से काडर बुलाये थे, उन्हें हथियार दिये थे, पुलिस साथ दी थी इलाका सील किया था और हिंसा की थीपरन्तु उस समय मौतों के बावजूद किसानों का प्रतिरोध जारी रहा थापर, इस बार सी.पी.एम. ने नये तरीके अपनायेभूमि उच्छेद प्रतिरोध कमेटी के कार्यकर्ताओं का अपहरण कर उन्होंने कई सौ ऐसे लोगो को बांध कर आगे चलाया और पीछे से फायरिंग की ताकि किसान प्रतिरोध करने से रूकें क्योंकि उनके अपने लोगों को चोटें सकती थींइस बार घर जलाने सामान लूटने की कार्रवाई का व्यापक इस्तेमाल हुआतीसरा, महिलाओं पर लैंगिक हिंसा का दौर इस बार तीव्र रहासिंगुर में पूरी हिंसा के दौरान एक बलात्कार और हत्या तापसी मलिक की; जबकि मार्च 2007 के दौर में नंदीग्राम में 33 महिलाओं ने सी.पी.एम. काडर पर बलात्कार के आरोप लगाये और अस्पताल में दाखिल हुईंपरन्तु इस बार ऐसी कई घटनायें हुईं, और वह भी सामूहिक बलात्कारों की! और भी हैरतनाक बात यह है कि नंदीग्राम हिंसा के दौरान ही सी.पी.एम. की महिला संगठन `एडवाकी अखिल भारतीय कानंफ़्रेंस चल रही थी और उसमें `महिलाओं पर हिंसाके खिलाफ विशेष कदमों की मांग की गई!

पुलिसगुण्डे गांव के गांव खाली कराते गये तथा प्रैस अन्य ताकतों के लिए इलाके को सील कर दिया गयाकरात साहब को माओवादियों और लैंडमाइनों की खबरें मिलने लगीं मनमोहन सिंह के बयान याद आने लगे, जबकि बंगाल के गृह सचिव ने बाद में बयान दिया कि इलाके में कोई माओवादी नहीं हैंगांवों से लोगों के भागने नंदीग्राम के स्कूल पर 20 हजार शरणार्थियों के पहुंचने की खबरें 9 नवम्बर से लगातार फायरिंग की आवाजों के साथ आने लगीं और 10 नवम्बर को आमगाचिया पर बड़े गोलीकाण्ड में पुलिस सी.पी.एम. फायरिंग में 5 लोग मारे गये कई लोग गंभीर रूप से जख्मी हुए। 10 नवम्बर को ही परेशान राज्यपाल ने बयान दिया कि गृह सचिव के अनुसार इलाके `युद्ध क्षेत्राबन गये हैं उन्होंने किसानों पर हमलों की निंदा की

12 नवम्बर को सी.आर.पी.एफ. पहुंची, परन्तु 1000 सी.आर.पी.एफ. को सी.पी.एम. काडरों ने इलाके में घुसने नहीं दियाजन धिकार कार्यकर्ताओं, राहतसामग्री विपक्षी दलों के नेताओं के लिए भी इलाका बंद कर दिया गयागांवों से किसानों को भगाकर पूर्व धिग्रहण होने वाले इलाकों में साटा व्याप्त होने के बाद ही सोमवार 12 नवम्बर को इलाका खोला गया प्रैस को जाने दिया गया, जिसने खबर दी कि गांव वीरान हैं, लोग नंदीग्राम स्कूल में एकत्रा हैं खेतों में छुपे हैं, अस्पताल घायलों से भरे हैं, औरतें बलात्कार की शिकायत कर रही हैं, शरणार्थियों के लिए कोई राहत नहीं, खाना नहीं है, दवाई नहीं हैतब से इलाके में मोटरसाईकिलों पर सी.पी.एम. काडर पहरा दे रहे हैं, सी.आर.पी.एफ. को घूमने दे रहे हैं, घरों के दरवाजे बंद करने पर प्रतिबंध हैं, फसल काटने पर प्रतिबंध है, गांव में रहने के लिए हजारों रुपये के जुर्माने लिये जा रहे हैं। 13 नवम्बर को विपक्षी दलों के द्वारा अस्पतालों का दौरा करने के पहले धिकतर घायलों को सी.पी.एम. ने वहां से भगा दिया

बंगालविरोध
12 नवम्बर को लगभग सभी विपक्षी पार्टियों ने बंगाल बंद का एलान किया बंगाल बंद रहा। 14 नवम्बर को बंगाल के कलाकारों के नेतृत्व में जो उससे पहले तीन दिन से हिंसा का प्रतिरोध जता रहे थे एक विशाल जुलूस कोलकाता में निकाला गया जिसमें हजारोंहजार लोगों ने स्वत:स्फूर्त रूप से भाग लियाकलाकारों ने प्रतिरोध जताने के लिए अपनी फिल्में कोलकाता में चल रहे अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह से वापस ले समारोहस्थल के बाहर प्रदर्शन किया, जहां प्रसिद्ध कलाकारों पर बंगाल पुलिस ने लाठीचार्ज कर, केस बनाकर उन्हें लाल बाजार थाने में डाल दिया

सी.पी.एम. प्रतिक्रिया

सी.पी.एम. की ओर से बुद्धदेव भट्टाचार्य के अलावा प्रकाश करात सीताराम येचुरी मुख्य प्रवक्ता रहे और अपनी पार्टी के द्वारा आयोजित, लागू की गई नेतृत्व दी गई हिंसा के नंगे नाच को उचित बताते रहेउनके बयानों में कुछ मुद्दे तय थे उन्होंने सी.पी.एम. काडरों की हिंसक भूमिका से इंकार नहीं किया बल्कि उसको ठीक बताया और यह कहा कि वहां `अकेलेसी.पी.एम. ने हिंसा नहीं कीप्रकाश करात तो माओवादियों का भूत खड़ा करते रहेभट्टाचार्य ने भी कहा कि वे हैं परन्तु उनका मुख्य निशाना तृणमूल भूमि उच्छेद प्रतिरोध कमेटी थी तथा वे स्पष्टत: बदले की भावना से प्रेरित थेप्रकाश करात की बातों पर टिप्पणी करते हुए एक प्रसिद्ध बंगाली लेखक ने कहा कि उनकी बात बुश जैसी है जिन्हें इराक में जनसंहारक हथियार दिखते थे

सी.पी.एम. से जुड़े कई बुद्धिजीवियों जैसे प्रभात पटनायक, जयती घोष, उत्सा पटनायक आदि, जो केन्द्र सरकार में सी.पी.एम. की भूमिका का लाभ उठा रहे हैं सरकारी कमेटियों की सीटें गर्म कर रहे हैं, ने संयुक्त बयान में पूछा कि जब रासायनिक अड्डा नंदीग्राम से हटा दिया गया तो हिंसा की जरूरत क्यों रही ? यह बात तो उन्हें बुद्धदेव से पूछनी चाहिए उनके बयानों से समझना भी चाहिए कि क्यों नंदीग्राम के किसानों को डर था कि मौका मिलते ही सी.पी.एम. उनके प्रतिरोध को कुचलेगी जबरन धिग्रहण करेगी

नंदीग्राम क्यों जला? उसका समर्थन क्यों?

नंदीग्राम आन्दोलन सी.पी.एम. नेतृत्व की `वाममोर्चा सरकार द्वारा इलाके में भूमि धिग्रहण करने की योजना उनके द्वारा भूमि धिग्रहण नोटिस देने के बाद उभराबंगाल के किसानों ने सिंगुर में विरोध करते किसानों को हाल में देखा था और इसलिए नंदीग्राम ने शुरू से पूरी तैयारी के साथ प्रतिरोध कियाभूमि उच्छेद प्रतिरोध कमेटी बनायी गयी जिसमें तृणमूल जमातउलेमा हिन्द के नेता भी शामिल थे बहुत से ऐसे लोग भी शामिल थे जो सी.पी.एम. समर्थक थे पर जमीन नहीं देना चाहते थेसी.पी.एम. नेताओं के तरीके जानते हुए उन्होंने शुरू से ही इलाके में आने वाले रास्ते सील कर दिये पुलिस के आगमन पर प्रतिबंध लगायाफिर भी, रास्ते के दूसरी तरफ से फायरिंग करते सी.पी.एम. के लोगों ने लोगों को घायल कर, पुराने समर्थकों को पकड़ कर उन्हें ब्राण्ड किया मार्च की फायरिंग में 14 व्यक्ति मारे जिनमें 13 पुराने सी.पी.एम. समर्थक थेसी.पी.एम. के राज में रहने वाले सभी गांववासी जानते हैं कि सी.पी.एम. पूरे के पूरे ग्रामवासियों पर किस तरह धाक जमाती हैइसलिए बुद्धदेव ने जब कहा कि सी.पी.एम. पंचायत नेताओं अन्य सी.पी.एम. नेताओं को बी.यू.पी.सी. ने इलाके से बाहर निकाला है, तो यह तो स्पष्ट तथ्य है जिससे नंदीग्राम आन्दोलन इंकार नहीं कर रहा हैइलाका सी.पी.एम. के हुक्म को इंकार कैसे करेगा अगर वह सी.पी.एम. काडर, गुण्डे पुलिस से लड़ेगा नहीं ?

नंदीग्राम की जमीन इंडोनेशिया के कम्युनिस्टविरोधी सलीम ग्रुप को देने के लिए हथियाई जा रही थीबुद्धदेव साहब ने सलीम के आला अफसरों के साथ संयुक्त प्रैस कानंफ़्रेंस में भाग भी लिया, समझौते पर हस्ताक्षर भी कियेउन्होंने यह भी ऐलान किया कि वे `कट्टरपंथी माक्र्सवादसे मुक्त हैंचाहे सलीम इलाके को रासायनिक अड्डा बनाता या कुछ और, वह दिया जा रहा था एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी कोसीपी.एम. का सारा गुस्सा नंदीग्राम के किसानों के प्रति इस बात पर केन्द्रित है कि सलीम ग्रुप की सेवा में उन्होंने अड़चन खड़ा किया, और यह कोई अजीब बात नहीं होगी अगर किसानों को जबरन उखाड़ने में सी.पी.एम. सफल हो जाये तो पुन: शिक्षा के नाम पर यह कह कर कि लोग `समझगये हैं, वह अब भी जमीन सलीम ग्रुप को ही देगी

संसदवादी रास्ते का यही हश्र है

असल में नंदीग्राम ने `संसद के जरिये बदलावके भ्रम को बेनकाब कर दिया है और उसके असली चेहरे को बेनकाब कर दिया हैयही उसकी सबसे बड़ी देन हैसी.पी.एम. शासक वर्गीय पार्टी है फासीवादी दमन करने में माहिर हैजिस तरह काडर, पुलिस सत्ता की ताकत को लड़ती जनता के खिलाफ इस्तेमाल किया गया है, उसी तरह तो गुजरात में मोदी भाजपा ने इस्तेमाल किया, मुम्बई में मुस्लिमविरोधी हिंसा में पवार/ठाकरे ने किया या 1984 में कांग्रेस ने दिल्ली में कियादिलचस्प बात है कि नंदीग्राम में हिंसा का मुख्य निशाना मुसलमान हैं (कारण है कि धिकतर किसान इस इलाके में वे ही हैं), जिस सवाल पर भाजपा खुश है संसद में वह इसका पूरा इस्तेमाल भी कर रही है

सी.पी.एम. क्या औद्योगिकरण कर रही है?

सी.पी.एम. ने बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की अपनी सेवा को औद्योगिकरण का नाम दिया है यह अलग सवाल है कि कोलकाता आसपास के क्षेत्रो में बंद पड़े औद्योगिक इकाईयों को खोलने की सोच कहीं नहीं है, सार्वजनिक क्षेत्रो की इकाईयां बंद पड़ी हैं आदिसवाल यह है कि यह युग लेनिन का युग है और पूंजीवाद साम्राज्यवाद के चरण में है यानि कि पूंजीवाद पतनशील हैआज के युग में बुद्धदेव भट्टाचार्य भारत जैसे देश में पूंजीवाद के प्रगतिशील प्रभावों की बात करें जो कि एक बीते युग की बात है, तो जाहिर है कि उनकी हालत अफीमचियों जैसी ही बताई जा सकती है और यह कहा जा सकता है कि वह वास्तविक दुनिया से अलग अतीत में निवास करते हैं

और भी आश्चर्य की बात है कि चंद निम्न पूंजीपति कार्यकर्ता संगठन इस समझदारी को हवा दे रहे हैंइनमें से कई तो अद्र्धसामंती भारत को पूंजीवादी मानते हैंकुछ और बुद्धदेव के साथसाथ यही कह रहे हैं कि साम्राज्यवादी कम्पनियां भारत में आने से देश का पूंजीवादी विकास होगाअंत में, उनका कहना यहीं उतर कर आता है कि नंदीग्राम में सी.पी.एम. ने तरीका गलत अपनाया परन्तु ऐतिहासिक रूप से प्रगतिशील कदम उठाया

भारत के किसान जवाब दे रहे हैं

अद्र्धसामंती भारत के किसान जगहजगह जबरन भूमि धिग्रहण की कोशिशों का जवाब दे रहे हैं सिफर् तृणमूल के नेतृत्व में संघर्ष हैं, और केवल सी पी एमसरकार के खिलाफसी पी एम सरकार ने तय कर लिया है कि भारत के शासक वर्गों तथा साम्राज्यवाद को वह दिखायेगी कि जनविरोध को कुचल कर, उससे गद्दारी कर, चाहे जैसे भी हो, साम्राज्यवादपरस्त नीतियां लागू करवाने की सबसे अच्छी काबिलियत उसी में है

अन्य `वामपार्टियां

हालांकि हिंसा की शुरुआत में बंगाल सरकार में शामिल अन्य पार्टियों ने मिलकर सी पी एम काडरों द्वारा हिंसक घटनाओं को सी.पी.एम. के जिम्मे मढ़ दिया, पर धीरे धीरे वापस अपनी लाइन पर आते लगते हैं जब सी.पी.एम. का फौरी तौर पर दमन सफल दिख रहा है, जब सी.पी.आई. ने अपनेआपको सी.पी.एम. की ओर कर लियाआर.एस.पी. तथा फारवर्ड ब्लाक कुछ विरोध जता रहे है पर शायद केवल `बड़े भाईको गुस्सा दिखाने तथा आबामी पंचायत चुनावों में बंहतर सौदेबाजी के लिएउनके विरोध की गहराई जल्द ही सामने जायेगी

कांग्रेस नेतृत्व में केन्द्र सरकार गद्दारों ने गठजोड़ बनाया

12 नवम्बर से सी.पी.आई. के बद्र्धन और फिर सी.पी.एम. नेता कहने लगे कि परमाणु समझौते पर केन्द्र सरकार के साथ समझौता संभव हैइस `समझौते पर समझौतामें नंदीग्राम के किसानों के संवैधानिक अधिकारों की बलि चढ़ाई गई हैसी.पी.एम. के बुद्धदेव भट्टाचार्य दोहरा रहे हैं कि वे `27 अक्तूबरसे केन्द्रीय फौज मांग रहे हैं परन्तु केन्द्र उन्हें भेज नहीं रहाभला जब 8 नवम्बर तक इलाके में शांति थी तो वे केन्द्रीय फौज क्यों मांग रहे थे? सी.आर.पी.एफ. भेजी गई 13 नवम्बर को, और तब भी पहले दिन उनका कहना था कि सी.पी.एम. काडरों ने उन्हें घुसने नहीं दियासी.आर.पी.एफ. की यह नम्र छवि क्या पहले कहीं देखी गई है? कश्मीर की जनता उन्हें बिल्कुल नहीं चाहती वे आये दिन भीड़ पर गोली चलाते हैंसी.आर.पी.एफ. ने मोटरसाईकिल पर चढ़े इलाके में दादागिरी जमाते सी.पी.एम. काडर को रोकने के लिए एक को गिरफ्तार किया तो अगले दिन सुनने में आया कि सी.आर.पी.एफ. के पांचों कैम्पों को नंदीग्राम से बाहर जाने को कहा गया हैप्रचार होते ही यह आदेश वापस हो गयासंसदीय बहस में गृहमंत्री शिवराज पाटिल ने सी.पी.एम. को बचाने के लिए सी.पी.एम. का `माओवादी तर्कसरकार की तरफ से दोहराया

कांग्रेस द्वारा यह तरफदारी क्यों? क्योंकि `समझौते पर समझौताके जरिये परमाणु समझौते पर संसदीय बहस से भी पहले सी.पी.एम. ने सरकारी दूत को आई.... भेजने की इजाजत दे दीयह बिल्कुल उसी शर्त पर है जिसे पहले दिन से सरकार कह रही है एक वाक्य भी नहीं बदलाइससे गंभीर सवाल उठ रहे हैंअगर समझौता देशविरोधी है तो उस पर कार्यवाही शुरू करने की इजाजत क्यों दी गई है ? उसे रद्द ही करना चाहिएअगर संसद में बहस को कार्यवाही से पहले नजरंदाज किया जा सकता है तो सी पी एम. ने पहले इस बहस की जरूरत का सवाल क्यों उठाया था ?

आणविक समझौते पर सी.पी.एम. कांग्रेस की सांठगांठ और भी पुरानी है, जब लोकसभा अयक्ष सोमनाथ चटर्जी ने आणविक समझौते पर संसदीय बहस पर यह कहकर रोक लगाई कि अंतर्राष्ट्रीय समझौतों पर निर्णय लेने का सरकार को एकाधिकार हैआणविक ऊर्जा केन्द्रीय सूचि का भाग है तथा भारत की संसद को इससे जुड़े सभी सवालों पर दखल करने की इजाजत हैयहां पर सी.पी.एम. ने अल्पमत कांग्रेस सरकार को पहली राहत दिलवाई

अब स्पष्ट है कि मनमोहन सिंह उनके मंत्रिायों ने नंदीग्राम के किसानों के अधिकारों की बलि चढ़ाकर अपने देशविरोधी समझौते अपनी सरकार को बचाया हैदो गद्दारों का यह समझौता पूरे देश में इनकी असलियत को नंगा करने के लिए इस्तेमाल होना चाहिए

कोलकाता में पुलिससी पी एमविरोधी दंगे

21 नवम्बर को कांग्रेस सी.पी.एम. की एकदूसरे को मदद की नीति सी.पी.एम. को भारी पड़ी है, बंगाल की आबादी के लगभग एक चौथाई मुसलमानों को फिर एक बार साम्प्रदायिक साजिशों का निशाना बनाने की कोशिश की गई है तथा इसने नंदीग्राम पर मुसलमानों की पीड़ा गुस्से को सामने लाया हैकांग्रेस से संबंधित अखिल भारतीय अल्पसंख्यक मोर्चा ने आवाह्न किया कि नंदीग्राम के साथ तसलीमा नसरीन की वीजा को रद्द करने का सवाल जोड़ते हुए तीन घंटे का बंगाल बंद किया जायेजाहिर है चेष्टा थी कि मुसलमानों का ध्यान नंदीग्राम में हुई हिंसा से हटाया जायेमामला सी.पी.एम. पर उल्टा पड़ा हैआवाह्नकर्ता मोर्चा की तो जनता में कोई पैठ नहीं है, परन्तु विशेषकर केन्द्रीय कोलकाता शहर में हजारों मुस्लिम नौजवान निकल कर आये और पुलिस के साथ इस तरह भिड़े कि बंगाल सरकार को फौरन सेना बुलानी पड़ी

जाहिर है सेना इस आरोप से बचने के लिए बुलाई गई कि पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर बर्बरता कीसेना आने से पहले पुलिस ने कई जगह लाठीचार्ज आंसूगैस का इस्तेमाल कर लिया थासीपीएमके केन्द्रीय कार्यालय से थोड़ी दूर स्थित स्थानीय सीपी.एम. कार्यालय को जला दिया गयायह माना जा रहा है कि यह गुस्सा नंदीग्रामविरोधी है; हालांकि सी.पी.एम. चेष्टा कर रही है कि गुस्से को केवल लेखिका के सवाल तक ही सीमित रखा जायेअल्पसंख्यक मोर्चा का कहना है कि उन्हें बदनाम करने के लिए सी.पी.एम. ने दंगा किया हैसभी स्रोत भीड़ में प्रमुख सी.पी.एम. कार्यकर्ताओं की उपस्थिति को मान रहे हैं, पर अधिकतर समझ यही है कि ये सी.पी.एम. से गुस्से के कारण उसके विरुद्ध सड़क पर आये हैंमुख्य तौर पर सी.पी.एम. के गढ़ समझे जाने वाले क्षेत्रो से आई भीड़ ने अपना गुस्सा प्रकट कियाकोलकाता में सेना बुलाने की यह तीसरी घटना है 1984 के सिखविरोधी दंगों में तथा बाबरी मस्जिद तोड़ने के बाद 1992 में भी कोलकाता में सेना बुलाई गई थीबिना किसी संशय के कहा जा सकता है कि कुछ ही दिन में सी पी एम सिद्ध कर देगी कि सारी हिंसा के जिम्मेदार `बाहरी तत्वहैं और सी.पी.एम. की अपनी कोई भूमिका इसमें नहीं हैयह भी तय है कि बंगाल के अल्पसंख्यकों, विशेषकर नंदीग्राम के संघर्षरत किसानों, को `फिरकापरस्तीका लेबल और ढोना पड़ेगाशासक वर्गों की पार्टियों के राज करने के तरीके भी येनकेनप्रकारेण समान ही हैं!

नंदीग्राम और भविष्य

जबरन भूमि धिग्रहण के विरुद्ध देशव्यापी आन्दोलनों के उभार में प्रमुख सवाल किसानों का आक्रोश हैइसलिए वे जरूर लड़ेंगे तथा अपनी समस्याओं के हल के लिए संघर्ष करेंगेबंगाल की जनता को अनुभव है ही कि हथियारबंद सी.पी.एम. के मुकाबले के लिए किस तरह की तैयारी जरूरी हैबंगाल की जनता पुलिस को पहचानती हैपरन्तु, अगर आन्दोलन का नेतृत्व इनकी अपनी ताकत पर नहीं, बल्कि अन्य शासकीय पार्टियों, विशेषकर भाजपा कांग्रेस, पर निर्भर रहे और चुनावों पर निगाह रख कर चले तो तय है कि किसानों की ऊर्जा कुंद हो जायेगी संघर्ष दिशाभ्रष्ट हो जायेगा

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