हमने उन्हीं के सिक्कों में हिसाब चुका दिया है बुद्धदेव भट्टाचार्य नंदीग्राम में सी.पी.एम. काडरों, गुण्डों व प. बंगाल पुलिस की हाल की उपलबियों पर फूले नहीं समा रहे हैं। दूसरी ओर, सी.पी.एम. महासचिव जानना चाहते हैं कि जब वहां रासायनिक कम्पनियों का अड्डा बनना ही नहीं है तो भूमि उच्छेद प्रतिरोध कमेटी लड़ क्यों रही है? साथ ही वे कहते हैं कि सी.पी.एम. काडर व पुलिस ने जो किया वह अनिवार्य था क्योंकि इलाके में माओवादी घुसे हुए हैं तथा मनमोहन सिंह कहते हैं कि माओवादी देश के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं। सी.पी.एम. के पोलित ब्यूरो सदस्य सीताराम येचुरी बताते हैं कि यह इलाका बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को तो जाना ही नहीं था, यह तो रासायनिक अड्डे के लिए जाना था।
किसी भी सी.पी.एम. नेता का यह मानना नहीं है कि मार्च 2007 की हिंसा या मौजूदा दौर की हिंसा जिसमें पुलिस व सशस्त्रा गुण्डे एकजुट होकर भूमि उच्छेद प्रतिरोध कमेटी के सदस्य व आम किसानों पर हमले करते रहे, महिलाओं से बलात्कार करते फिरे, मार–मार कर गांव से लोगों को भगा दिया गलत था।
दूसरा, जैसा प्रकाश करात ने मार्च 2007 में ही स्पष्ट किया, सी.पी.एम. का कहना है कि किसानों की उपजाऊ जमीनों का जबरन अधिग्रहण करना सही है तथा जो लोग इसका विरोध कर रहे हैं वे `नरोदनिक‘ हैं। करात व भट्टाचार्य के उस समय के बयानों का तात्पर्य यह है कि सी.पी.एम. बंगाल का `औद्योगिकरण‘ करने में लगी है तथा इसके दौरान किसानों को कुछ कुर्बानी तो करनी ही होगी क्योंकि बंगाल की लगभग सारी जमीन ही उपजाऊ है।
इस बार का हिंसक दौर
हालांकि बुद्धदेव भट्टाचार्य ने मार्च 2007 की हिंसा के बाद नंदीग्राम के भूमि अधिग्रहण नोटिसों को रद्द करने की बात की, पर सच्चाई यही है कि हकीकत में यह अभी भी रद्द नहीं हुआ है। तब से लेकर नवम्बर तक, विशेषकर पिछले एक महीने से, लगातार छिटपुट हिंसा नंदीग्राम में चल रही थी। साथ ही सी.पी.एम. नेताओं, विशेषकर सी.पी.एम. पोलित ब्यूरो सदस्य वृंदा करात, की शिकायत थी कि भूमि उच्छेद प्रतिरोध कमेटी ने सी.पी.एम. समर्थक व कार्यकत्र्ताओं को गांव से खदेड़ दिया है और वे बेघर हो गये हैं।
मनमोहन सरकार पर अपने दबाव का पूरा फायदा उठाते हुए सी.पी.एम. ने पूरी तैयारी कर बंगाल के अन्य इलाकों से काडर एकत्रा कर व उन्हें हथियारों से लैस कर प. बंगाल सरकार के संरक्षण में नंदीग्राम पर पुन: कब्जा जमाने के लिए घुसाया। इसी तरह उसने मार्च में भी इर्दगिर्द से काडर बुलाये थे, उन्हें हथियार दिये थे, पुलिस साथ दी थी व इलाका सील किया था और हिंसा की थी। परन्तु उस समय मौतों के बावजूद किसानों का प्रतिरोध जारी रहा था। पर, इस बार सी.पी.एम. ने नये तरीके अपनाये। भूमि उच्छेद प्रतिरोध कमेटी के कार्यकर्ताओं का अपहरण कर उन्होंने कई सौ ऐसे लोगो को बांध कर आगे चलाया और पीछे से फायरिंग की ताकि किसान प्रतिरोध करने से रूकें क्योंकि उनके अपने लोगों को चोटें आ सकती थीं। इस बार घर जलाने व सामान लूटने की कार्रवाई का व्यापक इस्तेमाल हुआ। तीसरा, महिलाओं पर लैंगिक हिंसा का दौर इस बार तीव्र रहा। सिंगुर में पूरी हिंसा के दौरान एक बलात्कार और हत्या तापसी मलिक की; जबकि मार्च 2007 के दौर में नंदीग्राम में 33 महिलाओं ने सी.पी.एम. काडर पर बलात्कार के आरोप लगाये और अस्पताल में दाखिल हुईं। परन्तु इस बार ऐसी कई घटनायें हुईं, और वह भी सामूहिक बलात्कारों की! और भी हैरतनाक बात यह है कि नंदीग्राम हिंसा के दौरान ही सी.पी.एम. की महिला संगठन `एडवा‘ की अखिल भारतीय कानंफ़्रेंस चल रही थी और उसमें `महिलाओं पर हिंसा‘ के खिलाफ विशेष कदमों की मांग की गई!
पुलिस–गुण्डे गांव के गांव खाली कराते गये तथा प्रैस व अन्य ताकतों के लिए इलाके को सील कर दिया गया। करात साहब को माओवादियों और लैंडमाइनों की खबरें मिलने लगीं व मनमोहन सिंह के बयान याद आने लगे, जबकि बंगाल के गृह सचिव ने बाद में बयान दिया कि इलाके में कोई माओवादी नहीं हैं। गांवों से लोगों के भागने व नंदीग्राम के स्कूल पर 20 हजार शरणार्थियों के पहुंचने की खबरें 9 नवम्बर से लगातार फायरिंग की आवाजों के साथ आने लगीं और 10 नवम्बर को आमगाचिया पर बड़े गोलीकाण्ड में पुलिस व सी.पी.एम. फायरिंग में 5 लोग मारे गये व कई लोग गंभीर रूप से जख्मी हुए। 10 नवम्बर को ही परेशान राज्यपाल ने बयान दिया कि गृह सचिव के अनुसार इलाके `युद्ध क्षेत्रा‘ बन गये हैं व उन्होंने किसानों पर हमलों की निंदा की।
12 नवम्बर को सी.आर.पी.एफ. पहुंची, परन्तु 1000 सी.आर.पी.एफ. को सी.पी.एम. काडरों ने इलाके में घुसने नहीं दिया। जन अधिकार कार्यकर्ताओं, राहत–सामग्री व विपक्षी दलों के नेताओं के लिए भी इलाका बंद कर दिया गया। गांवों से किसानों को भगाकर पूर्व अधिग्रहण होने वाले इलाकों में साटा व्याप्त होने के बाद ही सोमवार 12 नवम्बर को इलाका खोला गया व प्रैस को जाने दिया गया, जिसने खबर दी कि गांव वीरान हैं, लोग नंदीग्राम स्कूल में एकत्रा हैं व खेतों में छुपे हैं, अस्पताल घायलों से भरे हैं, औरतें बलात्कार की शिकायत कर रही हैं, शरणार्थियों के लिए कोई राहत नहीं, खाना नहीं है, दवाई नहीं है। तब से इलाके में मोटरसाईकिलों पर सी.पी.एम. काडर पहरा दे रहे हैं, सी.आर.पी.एफ. को घूमने दे रहे हैं, घरों के दरवाजे बंद करने पर प्रतिबंध हैं, फसल काटने पर प्रतिबंध है, गांव में रहने के लिए हजारों रुपये के जुर्माने लिये जा रहे हैं। 13 नवम्बर को विपक्षी दलों के द्वारा अस्पतालों का दौरा करने के पहले अधिकतर घायलों को सी.पी.एम. ने वहां से भगा दिया।
बंगाल – विरोध
12 नवम्बर को लगभग सभी विपक्षी पार्टियों ने बंगाल बंद का एलान किया व बंगाल बंद रहा। 14 नवम्बर को बंगाल के कलाकारों के नेतृत्व में जो उससे पहले तीन दिन से हिंसा का प्रतिरोध जता रहे थे एक विशाल जुलूस कोलकाता में निकाला गया जिसमें हजारों–हजार लोगों ने स्वत:स्फूर्त रूप से भाग लिया। कलाकारों ने प्रतिरोध जताने के लिए अपनी फिल्में कोलकाता में चल रहे अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह से वापस ले ल व समारोह–स्थल के बाहर प्रदर्शन किया, जहां प्रसिद्ध कलाकारों पर बंगाल पुलिस ने लाठीचार्ज कर, केस बनाकर उन्हें लाल बाजार थाने में डाल दिया।
सी.पी.एम. प्रतिक्रिया
सी.पी.एम. की ओर से बुद्धदेव भट्टाचार्य के अलावा प्रकाश करात व सीताराम येचुरी मुख्य प्रवक्ता रहे और अपनी पार्टी के द्वारा आयोजित, लागू की गई व नेतृत्व दी गई हिंसा के नंगे नाच को उचित बताते रहे। उनके बयानों में कुछ मुद्दे तय थे उन्होंने सी.पी.एम. काडरों की हिंसक भूमिका से इंकार नहीं किया बल्कि उसको ठीक बताया और यह कहा कि वहां `अकेले‘ सी.पी.एम. ने हिंसा नहीं की। प्रकाश करात तो माओवादियों का भूत खड़ा करते रहे। भट्टाचार्य ने भी कहा कि वे हैं परन्तु उनका मुख्य निशाना तृणमूल व भूमि उच्छेद प्रतिरोध कमेटी थी तथा वे स्पष्टत: बदले की भावना से प्रेरित थे। प्रकाश करात की बातों पर टिप्पणी करते हुए एक प्रसिद्ध बंगाली लेखक ने कहा कि उनकी बात बुश जैसी है जिन्हें इराक में जनसंहारक हथियार दिखते थे।
सी.पी.एम. से जुड़े कई बुद्धिजीवियों जैसे प्रभात पटनायक, जयती घोष, उत्सा पटनायक आदि, जो केन्द्र सरकार में सी.पी.एम. की भूमिका का लाभ उठा रहे हैं व सरकारी कमेटियों की सीटें गर्म कर रहे हैं, ने संयुक्त बयान में पूछा कि जब रासायनिक अड्डा नंदीग्राम से हटा दिया गया तो हिंसा की जरूरत क्यों रही ? यह बात तो उन्हें बुद्धदेव से पूछनी चाहिए व उनके बयानों से समझना भी चाहिए कि क्यों नंदीग्राम के किसानों को डर था कि मौका मिलते ही सी.पी.एम. उनके प्रतिरोध को कुचलेगी व जबरन अधिग्रहण करेगी।
नंदीग्राम क्यों जला? उसका समर्थन क्यों?
नंदीग्राम आन्दोलन सी.पी.एम. नेतृत्व की `वाम‘ मोर्चा सरकार द्वारा इलाके में भूमि अधिग्रहण करने की योजना व उनके द्वारा भूमि अधिग्रहण नोटिस देने के बाद उभरा। बंगाल के किसानों ने सिंगुर में विरोध करते किसानों को हाल में देखा था और इसलिए नंदीग्राम ने शुरू से पूरी तैयारी के साथ प्रतिरोध किया। भूमि उच्छेद प्रतिरोध कमेटी बनायी गयी जिसमें तृणमूल व जमात–ए–उलेमा हिन्द के नेता भी शामिल थे व बहुत से ऐसे लोग भी शामिल थे जो सी.पी.एम. समर्थक थे पर जमीन नहीं देना चाहते थे। सी.पी.एम. नेताओं के तरीके जानते हुए उन्होंने शुरू से ही इलाके में आने वाले रास्ते सील कर दिये व पुलिस के आगमन पर प्रतिबंध लगाया। फिर भी, रास्ते के दूसरी तरफ से फायरिंग करते सी.पी.एम. के लोगों ने लोगों को घायल कर, पुराने समर्थकों को पकड़ कर उन्हें ब्राण्ड किया व मार्च की फायरिंग में 14 व्यक्ति मारे जिनमें 13 पुराने सी.पी.एम. समर्थक थे। सी.पी.एम. के राज में रहने वाले सभी गांववासी जानते हैं कि सी.पी.एम. पूरे के पूरे ग्रामवासियों पर किस तरह धाक जमाती है। इसलिए बुद्धदेव ने जब कहा कि सी.पी.एम. पंचायत नेताओं व अन्य सी.पी.एम. नेताओं को बी.यू.पी.सी. ने इलाके से बाहर निकाला है, तो यह तो स्पष्ट तथ्य है जिससे नंदीग्राम आन्दोलन इंकार नहीं कर रहा है। इलाका सी.पी.एम. के हुक्म को इंकार कैसे करेगा अगर वह सी.पी.एम. काडर, गुण्डे व पुलिस से लड़ेगा नहीं ?
नंदीग्राम की जमीन इंडोनेशिया के कम्युनिस्ट – विरोधी सलीम ग्रुप को देने के लिए हथियाई जा रही थी। बुद्धदेव साहब ने सलीम के आला अफसरों के साथ संयुक्त प्रैस कानंफ़्रेंस में भाग भी लिया, समझौते पर हस्ताक्षर भी किये। उन्होंने यह भी ऐलान किया कि वे `कट्टरपंथी माक्र्सवाद‘ से मुक्त हैं। चाहे सलीम इलाके को रासायनिक अड्डा बनाता या कुछ और, वह दिया जा रहा था एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी को। सी।पी.एम. का सारा गुस्सा नंदीग्राम के किसानों के प्रति इस बात पर केन्द्रित है कि सलीम ग्रुप की सेवा में उन्होंने अड़चन खड़ा किया, और यह कोई अजीब बात नहीं होगी अगर किसानों को जबरन उखाड़ने में सी.पी.एम. सफल हो जाये तो पुन: शिक्षा के नाम पर यह कह कर कि लोग `समझ‘ गये हैं, वह अब भी जमीन सलीम ग्रुप को ही देगी।
संसदवादी रास्ते का यही हश्र है
असल में नंदीग्राम ने `संसद के जरिये बदलाव‘ के भ्रम को बेनकाब कर दिया है और उसके असली चेहरे को बेनकाब कर दिया है। यही उसकी सबसे बड़ी देन है। सी.पी.एम. शासक वर्गीय पार्टी है व फासीवादी दमन करने में माहिर है। जिस तरह काडर, पुलिस व सत्ता की ताकत को लड़ती जनता के खिलाफ इस्तेमाल किया गया है, उसी तरह तो गुजरात में मोदी व भाजपा ने इस्तेमाल किया, मुम्बई में मुस्लिम– विरोधी हिंसा में पवार/ठाकरे ने किया या 1984 में कांग्रेस ने दिल्ली में किया। दिलचस्प बात है कि नंदीग्राम में हिंसा का मुख्य निशाना मुसलमान हैं (कारण है कि अधिकतर किसान इस इलाके में वे ही हैं), जिस सवाल पर भाजपा खुश है व संसद में वह इसका पूरा इस्तेमाल भी कर रही है।
सी.पी.एम. क्या औद्योगिकरण कर रही है?
सी.पी.एम. ने बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की अपनी सेवा को औद्योगिकरण का नाम दिया है यह अलग सवाल है कि कोलकाता व आस–पास के क्षेत्रो में बंद पड़े औद्योगिक इकाईयों को खोलने की सोच कहीं नहीं है, सार्वजनिक क्षेत्रो की इकाईयां बंद पड़ी हैं आदि। सवाल यह है कि यह युग लेनिन का युग है और पूंजीवाद साम्राज्यवाद के चरण में है यानि कि पूंजीवाद पतनशील है। आज के युग में बुद्धदेव भट्टाचार्य भारत जैसे देश में पूंजीवाद के प्रगतिशील प्रभावों की बात करें जो कि एक बीते युग की बात है, तो जाहिर है कि उनकी हालत अफीमचियों जैसी ही बताई जा सकती है और यह कहा जा सकता है कि वह वास्तविक दुनिया से अलग अतीत में निवास करते हैं।
और भी आश्चर्य की बात है कि चंद निम्न पूंजीपति कार्यकर्ता व संगठन इस समझदारी को हवा दे रहे हैं। इनमें से कई तो अद्र्धसामंती भारत को पूंजीवादी मानते हैं। कुछ और बुद्धदेव के साथ–साथ यही कह रहे हैं कि साम्राज्यवादी कम्पनियां भारत में आने से देश का पूंजीवादी विकास होगा। अंत में, उनका कहना यहीं उतर कर आता है कि नंदीग्राम में सी.पी.एम. ने तरीका गलत अपनाया परन्तु ऐतिहासिक रूप से प्रगतिशील कदम उठाया।
भारत के किसान जवाब दे रहे हैं
अद्र्धसामंती भारत के किसान जगह–जगह जबरन भूमि अधिग्रहण की कोशिशों का जवाब दे रहे हैं। न सिफर् तृणमूल के नेतृत्व में संघर्ष हैं, और न केवल सी पी एम। सरकार के खिलाफ। सी पी एम सरकार ने तय कर लिया है कि भारत के शासक वर्गों तथा साम्राज्यवाद को वह दिखायेगी कि जन – विरोध को कुचल कर, उससे गद्दारी कर, चाहे जैसे भी हो, साम्राज्यवाद–परस्त नीतियां लागू करवाने की सबसे अच्छी काबिलियत उसी में है।
अन्य `वाम‘ पार्टियां
हालांकि हिंसा की शुरुआत में बंगाल सरकार में शामिल अन्य पार्टियों ने मिलकर सी पी एम काडरों द्वारा हिंसक घटनाओं को सी.पी.एम. के जिम्मे मढ़ दिया, पर धीरे धीरे वापस अपनी लाइन पर आते लगते हैं जब सी.पी.एम. का फौरी तौर पर दमन सफल दिख रहा है, जब सी.पी.आई. ने अपने–आपको सी.पी.एम. की ओर कर लिया। आर.एस.पी. तथा फारवर्ड ब्लाक कुछ विरोध जता रहे है पर शायद केवल `बड़े भाई‘ को गुस्सा दिखाने तथा आबामी पंचायत चुनावों में बंहतर सौदेबाजी के लिए। उनके विरोध की गहराई जल्द ही सामने आ जायेगी।
कांग्रेस नेतृत्व में केन्द्र सरकार गद्दारों ने गठजोड़ बनाया
12 नवम्बर से सी.पी.आई. के बद्र्धन और फिर सी.पी.एम. नेता कहने लगे कि परमाणु समझौते पर केन्द्र सरकार के साथ समझौता संभव है। इस `समझौते पर समझौता‘ में नंदीग्राम के किसानों के संवैधानिक अधिकारों की बलि चढ़ाई गई है। सी.पी.एम. के बुद्धदेव भट्टाचार्य दोहरा रहे हैं कि वे `27 अक्तूबर‘ से केन्द्रीय फौज मांग रहे हैं परन्तु केन्द्र उन्हें भेज नहीं रहा। भला जब 8 नवम्बर तक इलाके में शांति थी तो वे केन्द्रीय फौज क्यों मांग रहे थे? सी.आर.पी.एफ. भेजी गई 13 नवम्बर को, और तब भी पहले दिन उनका कहना था कि सी.पी.एम. काडरों ने उन्हें घुसने नहीं दिया। सी.आर.पी.एफ. की यह नम्र छवि क्या पहले कहीं देखी गई है? कश्मीर की जनता उन्हें बिल्कुल नहीं चाहती व वे आये दिन भीड़ पर गोली चलाते हैं। सी.आर.पी.एफ. ने मोटरसाईकिल पर चढ़े इलाके में दादागिरी जमाते सी.पी.एम. काडर को रोकने के लिए एक को गिरफ्तार किया तो अगले दिन सुनने में आया कि सी.आर.पी.एफ. के पांचों कैम्पों को नंदीग्राम से बाहर जाने को कहा गया है। प्रचार होते ही यह आदेश वापस हो गया। संसदीय बहस में गृहमंत्री शिवराज पाटिल ने सी.पी.एम. को बचाने के लिए सी.पी.एम. का `माओवादी तर्क‘ सरकार की तरफ से दोहराया।
कांग्रेस द्वारा यह तरफदारी क्यों? क्योंकि `समझौते पर समझौता‘ के जरिये परमाणु समझौते पर संसदीय बहस से भी पहले सी.पी.एम. ने सरकारी दूत को आई.ए.ई.ए. भेजने की इजाजत दे दी। यह बिल्कुल उसी शर्त पर है जिसे पहले दिन से सरकार कह रही है एक वाक्य भी नहीं बदला। इससे गंभीर सवाल उठ रहे हैं। अगर समझौता देश– विरोधी है तो उस पर कार्यवाही शुरू करने की इजाजत क्यों दी गई है ? उसे रद्द ही करना चाहिए। अगर संसद में बहस को कार्यवाही से पहले नजरंदाज किया जा सकता है तो सी पी एम. ने पहले इस बहस की जरूरत का सवाल क्यों उठाया था ?
आणविक समझौते पर सी.पी.एम. व कांग्रेस की सांठगांठ और भी पुरानी है, जब लोकसभा अयक्ष सोमनाथ चटर्जी ने आणविक समझौते पर संसदीय बहस पर यह कहकर रोक लगाई कि अंतर्राष्ट्रीय समझौतों पर निर्णय लेने का सरकार को एकाधिकार है। आणविक ऊर्जा केन्द्रीय सूचि का भाग है तथा भारत की संसद को इससे जुड़े सभी सवालों पर दखल करने की इजाजत है। यहां पर सी.पी.एम. ने अल्पमत कांग्रेस सरकार को पहली राहत दिलवाई।
अब स्पष्ट है कि मनमोहन सिंह व उनके मंत्रिायों ने नंदीग्राम के किसानों के अधिकारों की बलि चढ़ाकर अपने देश– विरोधी समझौते व अपनी सरकार को बचाया है। दो गद्दारों का यह समझौता पूरे देश में इनकी असलियत को नंगा करने के लिए इस्तेमाल होना चाहिए।
कोलकाता में पुलिस– सी पी एम – विरोधी दंगे
21 नवम्बर को कांग्रेस व सी.पी.एम. की एक–दूसरे को मदद की नीति सी.पी.एम. को भारी पड़ी है, बंगाल की आबादी के लगभग एक चौथाई मुसलमानों को फिर एक बार साम्प्रदायिक साजिशों का निशाना बनाने की कोशिश की गई है तथा इसने नंदीग्राम पर मुसलमानों की पीड़ा व गुस्से को सामने लाया है। कांग्रेस से संबंधित अखिल भारतीय अल्पसंख्यक मोर्चा ने आवाह्न किया कि नंदीग्राम के साथ तसलीमा नसरीन की वीजा को रद्द करने का सवाल जोड़ते हुए तीन घंटे का बंगाल बंद किया जाये। जाहिर है चेष्टा थी कि मुसलमानों का ध्यान नंदीग्राम में हुई हिंसा से हटाया जाये। मामला सी.पी.एम. पर उल्टा पड़ा है। आवाह्नकर्ता मोर्चा की तो जनता में कोई पैठ नहीं है, परन्तु विशेषकर केन्द्रीय कोलकाता शहर में हजारों मुस्लिम नौजवान निकल कर आये और पुलिस के साथ इस तरह भिड़े कि बंगाल सरकार को फौरन सेना बुलानी पड़ी।
जाहिर है सेना इस आरोप से बचने के लिए बुलाई गई कि पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर बर्बरता की। सेना आने से पहले पुलिस ने कई जगह लाठीचार्ज व आंसूगैस का इस्तेमाल कर लिया था। सी।पी।एम। के केन्द्रीय कार्यालय से थोड़ी दूर स्थित स्थानीय सी।पी.एम. कार्यालय को जला दिया गया। यह माना जा रहा है कि यह गुस्सा नंदीग्राम–विरोधी है; हालांकि सी.पी.एम. चेष्टा कर रही है कि गुस्से को केवल लेखिका के सवाल तक ही सीमित रखा जाये। अल्पसंख्यक मोर्चा का कहना है कि उन्हें बदनाम करने के लिए सी.पी.एम. ने दंगा किया है। सभी स्रोत भीड़ में प्रमुख सी.पी.एम. कार्यकर्ताओं की उपस्थिति को मान रहे हैं, पर अधिकतर समझ यही है कि ये सी.पी.एम. से गुस्से के कारण उसके विरुद्ध सड़क पर आये हैं। मुख्य तौर पर सी.पी.एम. के गढ़ समझे जाने वाले क्षेत्रो से आई भीड़ ने अपना गुस्सा प्रकट किया। कोलकाता में सेना बुलाने की यह तीसरी घटना है 1984 के सिख– विरोधी दंगों में तथा बाबरी मस्जिद तोड़ने के बाद 1992 में भी कोलकाता में सेना बुलाई गई थी। बिना किसी संशय के कहा जा सकता है कि कुछ ही दिन में सी पी एम सिद्ध कर देगी कि सारी हिंसा के जिम्मेदार `बाहरी तत्व‘ हैं और सी.पी.एम. की अपनी कोई भूमिका इसमें नहीं है। यह भी तय है कि बंगाल के अल्पसंख्यकों, विशेषकर नंदीग्राम के संघर्षरत किसानों, को `फिरकापरस्ती‘ का लेबल और ढोना पड़ेगा। शासक वर्गों की पार्टियों के राज करने के तरीके भी येन–केन–प्रकारेण समान ही हैं!
नंदीग्राम और भविष्य
जबरन भूमि अधिग्रहण के विरुद्ध देशव्यापी आन्दोलनों के उभार में प्रमुख सवाल किसानों का आक्रोश है। इसलिए वे जरूर लड़ेंगे तथा अपनी समस्याओं के हल के लिए संघर्ष करेंगे। बंगाल की जनता को अनुभव है ही कि हथियारबंद सी.पी.एम. के मुकाबले के लिए किस तरह की तैयारी जरूरी है। बंगाल की जनता पुलिस को पहचानती है। परन्तु, अगर आन्दोलन का नेतृत्व इनकी अपनी ताकत पर नहीं, बल्कि अन्य शासकीय पार्टियों, विशेषकर भाजपा व कांग्रेस, पर निर्भर रहे और चुनावों पर निगाह रख कर चले तो तय है कि किसानों की ऊर्जा कुंद हो जायेगी व संघर्ष दिशाभ्रष्ट हो जायेगा।