January 1, 2008...7:18 pm

देश–विरोधी व जन–विरोधी शासक वर्गों की पार्टियां तथा नक्सलवाद

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दिसम्बर माह में एन.डी.सी. की बैठक में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एक बार फिर कहा कि नक्सलवादी आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं। इस आशय के बयान वे अपने शासनकाल में पहले भी देते आये हैं। भाजपा को अपना राजनीतिक शत्रु नहीं, महज राजनीतिकविरोधी समझने वाले कांग्रेसी नेता नक्सलवादियों को देश का शत्रु प्रचारित कर रहे हैं। मनमोहन सिंह से पहले तत्कालीन उपप्राधनमंत्री भाजपा नेता श्री लाल कृष्ण अडवाणी ने हैदराबाद में बयान दिया था कि नक्सलवादी उनके सपनों के भारत के सबसे बड़े दुश्मन हैं। सी.पी.एम. नेता प्रकाश करात ने भी नंदीग्राम में किसानों पर अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं के सशस्त्र हमले को वहां माओवादियों की उपस्थिति का जिक्र करते हुए जायज ठहराया था। यद्यपि . बंगाल के पुलिस महानिदेशक ने श्री करात के दावे का खंडन किया पर नंदीग्राम पर लोकसभा में चर्चा के दौरान केन्द्रीय गृहमंत्री शिवराज पाटिल ने उनके दावे की पुष्टि की। सी.पी.एम. नेता जहां साम्प्रदायिक भाजपा के खिलाफ राजनीतिक संघर्ष की बात करते हैं, वहीं नक्सलवादियों तथा संघर्षरत जनता के खिलाफ हत्याओं की राजनीति कर रहे हैं।

उपरोक्त बयानों से स्पष्ट है कि शासक वर्गों की पार्टियां चाहे कांग्रेस हो या दक्षिणपंथी भाजपा या `वामपंथीसी.पी.एम., सभी नक्सलवादियों को शत्रु घोषित कर उनके दमन तथा खात्मे की पक्षार हैं। इन सभी पार्टियों को नक्सलवादी अपने रास्ते अपने सपनों के भारत के निर्माण में सबसे बड़ी बाधा नजर आते हैं। यहां यह जानना प्रासंगिक होगा कि भारत के शासक वर्गों और उनकी ये राजनीतिक पार्टियां देश को किस रास्ते पर ले जा रही हैं। देश और जनता के लिए उनके क्या सपने हैं?

देश की आबादी का लगभग तीन चौथाई गांवों में रहता है तथा हाल के आंकड़ों के अनुसार आबादी का लगभग 61 प्रतिशत सीधेसीधे खेती पर निर्भर है। स्पष्ट है कि देश की प्रगति तथा जनता के विकास का रास्ता गांवों तथा खेतखलिहानों से होकर गुजरता है। गांवों की आबादी का बड़ा हिस्सा भूमिहीन गरीब किसानों तथा खेत मजदूरों का है जिनके पास धिकांशत: जमीन नहीं है, कुछ हिस्से के पास है भी तो नाममात्र की। इनकी सबसे बड़ी जरूरत जमीन की है जिस पर ये काम करते हैं। गांवों में व्याप्त अद्र्धसामंती भूमि संबंध इनको दासता के बंधनों में बांधे हुए हैं तथा देश में खेती के विकास के रास्ते में बड़ी रुकावट हैं। भूमि पर धिकार से ग्रामीण आबादी के बड़े हिस्से का वंचित होना शोषण का आधार है तथा जाति व्यवस्था के भयावह उत्पीड़न का भी आधार है। भूमि के सवाल पर इन तबकों के संघर्ष लगातार चलते रहे हैं तथा किसान विद्रोहों का रूप लेते रहे हैं। इन संघर्षों के चलते तथा इन्हें दबाने तथा दिग्भ्रमित करने के लिए शासक वर्गों ने भूमि सुधार कानून बनाये। इन कानूनों के दौर तेलंगानातेभागा तथा नक्सलबाड़ीश्रीकाकुलममुसहरी के बाद आये। परन्तु धिकांशत: ये कानून कागजों पर रहे और और जहां कहीं भी भूमिहीन गरीब किसानों को थोड़ीबहुत जमीन मिली, वह उनके अपने संघर्षों के बल पर ही मिली। नई आर्थिक नीतियों के दौर में भूमि सुधार कानूनों को ही खत्म करने की मुहिम शुरू की गई तथा कई प्रांतीय सरकारें इस आशय के संशोधन भी कर चुकी हैं। जहां ऐसे संशोधन नहीं भी किये गये उन प्रान्तों में भी भूमि सुधार कानूनों पर अमल पर कोई ध्यान नहीं है। जमीन से वंचित विशाल तबके के रोजगार की स्थिति काफी खराब हुई है। साल में एकतिहाई से कम दिनों के लिए ही रोजगार मिलता है और उसके लिए भी सरकारों द्वारा घोषित न्यूनतम वेतन मिलना तो आम तौर पर बहुत दूर की बात है। शासक वर्गों की पार्टियों के `सपनोंमें, उनके `विकासके रास्ते में इस तबके के लिए कोई जगह नहीं है जबकि देश की आबादी के इस बड़े हिस्से की प्रगति विकास के बिना देश की प्रगति विकास की बात करना बेमानी है।

नई आर्थिक नीतियों के दौर में मध्यम किसानों की हालत भी खस्ता हुई है। कृषि में लागत के सामानों की कीमतों में तेज वृद्धि हुई है तथा कृषि उत्पाद की बिक्री के लिए किसान कम्पनियों, व्यापारियों तथा कमीशन एजेन्टों की मुनाफाखोरी का धिकाधिक शिकार हो रहे हैं। खेती में विदेशी तथा दलाल बड़े पूंजीपतियों की पूंजी की गिरफ्त मजबूत हो रही है। शासक वर्गों के राजनीतिज्ञ खेती तथा गांवों के विकास की बात ही छोड़कर खेती से धिकाधिक लोगों को हटाने की बात कर रहे हैं। गृह बाजार विकसित किये बिना वे विदेशी बाजारों के लिए, विदेशी पूंजी पर आधारित `विकासके मॉडल को अपनाते रहे हैं। जनता की खाद्य सुरखा आदि की बातें इनके लिए अर्थहीन हैं।

विदेशी कम्पनियों तथा दलाल बड़े पूंजीपति घरानों के आधार पर `विकासकी परिकल्पना से शासक वर्गों की पार्टियां इतनी `उत्साहितहैं कि वे खनिज दोहन तथा सस्ते श्रम के शोषण पर आधारित उद्योगों की स्थापना के लिए किसानों, जिसमें बड़ी संख्या आदिवासियों की है, को औपनिवेशिक भूमि धिग्रहण कानून, 1894 के तहत विस्थापित करने पर आमादा हैं तथा किसानों के प्रतिरोध को पुलिस, सुरक्षा बलों तथा सशस्त्रा गुण्डों के हमलों से कुचलना चाहती हैं। पूंजी को हर किस्म की रियायतें देने वाले सेज कानून, 2005 को पारित करने वाली ये पार्टियां किसानों को अपनी जमीन पर धिकार से वंचित करना चाहती हैं।

शासक वर्गों की पार्टियों के `औद्योगिकरणतथा उसके लिए भूमि की जरूरत के नारे की असलियत इसी बात से खुल जाती है कि देश में बड़ी संख्या में उद्योग बंद हैं तथा काफी जमीन बेकार पड़ी है। उद्योग लगे या लगे, या बंद हो जाए, एक बार धिग्रहित जमीन किसानों को वापस नहीं की जाती। औद्योगिक मजदूरों का बहुत बड़ा हिस्सा न्यूनतम वेतन, .एस.आई., प्रोविडेंट फण्ड, काम के घंटे जैसे बुनियादी कानूनी धिकारों से भी वंचित है, नौकरी की सुरक्षा तो दूर की बात है। इनके संघर्षों को पुलिस दमन से कुचला जाता है तथा इन संघर्षों के पीछे उद्योगविरोधी साजिशें ढूंढ़ी जाती हैं। इस पर भी `औद्योगिक विकासके लिए श्रम कानूनों को `लचीलाबनाना जरूरी बताया जा रहा है तथा श्रम कानूनों को लागू करने की मशीनरी को ही खत्म किया जा रहा है।

1947 के सत्ता हस्तांतरण के बाद से शासक वर्गों ने अद्र्धसामंती शोषण उत्पीड़न तथा देश के साम्राज्यवादी शोषण को बरकरार रखते हुए साम्राज्यवादी पूंजी पर आधारित निर्यातोन्मुख `विकासका मार्ग चुना जिससे मुट्ठीभर दलाल पूंजीपति तथा बड़े सामंत लाभान्वित हुए तथा देश की धिसंख्य जनता की हालत उत्तरोत्तर खराब होती गई। नई आर्थिक नीतियों के दौर में शासक वर्गों का जनता के धिकार पर हमला तेज हुआ है तथा जनता के संघर्षों को कुचलने के लिए पुलिस तथा सुरक्षा बलों का खुला इस्तेमाल किया जा रहा है। शासक वर्ग तथा उनके राजनीतिक प्रतिनिधि अपनी लूटखसोट, शोषणदोहन में किसी खलल को बर्दाश्त करने को तैयार नहीं हैं।

नक्सलवादी संगठन निश्चय ही देश के साम्राज्यवादी शोषण तथा सामंती उत्पीड़न के खिलाफ हैं। शासक वर्गों की देशविरोाी जनविरोधी नीतियों के खिलाफ हैं तथा इनके शोषण शासन के विरुद्ध जनता के संघर्षों को विकसित कर रहे हैं। वे नवजनवादी क्रांति को सफलकर साम्राज्यवादी शोषण तथा सामंती उत्पीड़न को खत्म करने के लिए प्रयासरत है निश्चय ही नक्सलवादी शासक वर्गों के `सपनोंतथा `विकासके रास्ते के दुश्मन हैं।

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