January 1, 2008...11:28 pm

बेनजीर भुट्टो की हत्या - पाकिस्तान में अमेरिका तथा मुशर्रफ का विरोध और गहरा हुआ

Jump to Comments

27 दिसम्बर, 2007 को रावलपिंडी में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पी.पी.पी.) की अयक्ष श्रीमती बेनजीर भुट्टो की हत्या कर दी गई। लियाकत बाग में जनसभा को संबोधित करने के बाद जब वह अपनी गाड़ी से जनता का अभिवादन कर रही थीं, उन्हें गोलियों का निशाना बनाया गया। गोलियां चलने के बाद एक बम विस्फोट भी हुआ।

श्रीमती बेनजीर भुट्टो की हत्या के बाद पूरे पाकिस्तान में, विशेषकर गृह प्रांत सिंध में, व्यापक विरोधप्रदर्शन हुए। इन विरोधप्रदर्शनों में सरकारी संस्थानों बैंकों, रेलवे स्टेशनों, चुनाव कार्यालयों में व्यापक तोड़फोड़ हुई। सिंध प्रांत में गैरसिंधियों, विशेषकर मुहाजिरों (1947 में भारतपाकिस्तान विभाजन के समय भारत से गये मुस्लिम), और उनके व्यवस्थाओं को निशाना बनाया गया। सैकड़ों करोड़ रुपये की सम्पत्ति नष्ट हुई तथा जनता का सरकारविरोधी गुस्सा सामने आया।

अमेरिकी शासकों द्वारा धिकाधिक अलगथलग पड़ रहे फौजी तानाशाह परवेज मुशर्रफ की स्थिति को मजबूत करने के लिए मुशर्रफबेनजीर समझौते के तहत श्रीमती बेनजीर भुट्टो अक्तूबर 2007 में पाकिस्तान लौटी थीं। बेनजीर तथा उनकी पार्टी जनवरी 8, 2008 के प्रस्तावित चुनावों में भाग लेने वाली थी तथा उसी के लिए प्रचार के क्रम में उन्होंने लियाकत बाग में जनसभा को सम्बोधित किया था। इसके बावजूद जनता के मूड का अच्छा अंदाजा श्रीमती भुट्टो के शव के मार्ग पर बड़ी तादाद में लोगों द्वारा लगाये गये नारों से लगता है। ये लोग तथा पूरे पाकिस्तान में विरोधप्रदर्शनों में निकली जनता अमेरिका मुशर्रफ के खिलाफ नारे लगा रही थी। पाकिस्तान के धिकांश लोग बेनजीर भुट्टो की हत्या के लिए अमेरिकामुशर्रफ को जिम्मेदार मानते हैं।

अपनी संभावित हत्या के बारे में श्रीमती बेनजीर भुट्टो का मानना था कि उसका खतरा मुशर्रफ के करीबी लोगों से है। अक्तूबर 2007 में पाकिस्तान लौटने के समय कराची में हुए भीषण विस्फोट के लिए उन्होंने मुशर्रफ के करीबी पाकिस्तानी सेना के तीन अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया था। 26 अक्तूबर, 2007 को अपने एक मित्र मार्क सीगल को भेजे गये ईमेल संदेश में भी उन्होंने स्पष्ट कहा था कि यदि उनकी हत्या होती है तो उसके लिए मुशर्रफ जिम्मेदार होंगे। वाशिंगटन पोस्ट के अनुसार अपनी हत्या से पहले श्रीमती बेनजीर भुट्टो ने अमेरिकी विदेश विभाग को लिखा था कि उनका दल अमेरिकी प्रशासन द्वारा चली जा रही चालों को `लोकतंत्रकी स्थापना के लिए सद्भावना के साथ प्रयास नहीं मानता बल्कि अमेरिकी प्रयासों को राजनीतिक खतरों से घिरे मुशर्रफ को इस्लामाबाद में बुश के एजेन्ट के रूप बनाये रखने की कोशिशें समझता है। दूसरी ओर, श्रीमती भुट्टो पाकिस्तान सरकार द्वारा उनको दी गई सुरक्षा को नाकाफी जानबूझकर की जा रही साजिश समझती थीं। स्पष्ट है कि बेनजीर भुट्टो अपनी हत्या का खतरा इस्लामाबाद में अमेरिका के आदमी, मुशर्रफ उसके सहयोगियों से समझती थीं।

श्रीमती भुट्टो की हत्या पर अमेरिका भी संदेह के घेरे में है। यह संदेह कितना व्यापक है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अमेरिकी विदेश विभाग को इसका खण्डन करना पड़ा। पाकिस्तान के कुछ पूर्व शीर्ष सेना अधिकारियों ने दावा किया है कि बेनजीर की हत्या अमेरिका द्वारा कराये जाने के प्रमाण उसके पास मौजूद हैं। वैसे अमेरिका के लिए तीसरी दुनिया के देशों के नेताओं की हत्या कराना कोई अपवाद नहीं, बल्कि उसकी सरकारी नीति का हिस्सा रहा है तथा आज भी है।

दूसरी ओर, मुशर्रफ तथा पाकिस्तान सरकार ने हत्या के फौरन बाद इसकी जिम्मेदारी इस्लामिक आतंकवादियों के मत्थे मढ़ दी तथा इसके लिए वजीरिस्तान में आधारित बेतुल्ला मेहसूद को जिम्मेदार ठहराया। आननफानन में उन्होंने एक टेप भी जारी कर दिया जिसे मेहसूद उसके सहयोगी के बीच बातचीत का टेप प्रचारित किया गया। रोचक बात है कि उक्त टेप में केवल हत्या की जिम्मेदारी ली गई बल्कि इसे अंजाम देने वाले लोगों के नाम और शहरों का भी हवाला है। पाकिस्तानी जनता, विपक्षी राजनीतिक पार्टियों तथा पी.पी.पी. ने मेहसूद द्वारा हत्या कराये जाने के सरकारी प्रचार को गलत बताते हुए इसे वास्तविक हत्यारों को बचाने की साजिश बताया। खुद बैतुल्ला मेहसूद ने बेनजीर भुट्टो की हत्या में भूमिका से स्पष्ट इंकार किया।

केवल मुशर्रफ सरकार ही नहीं, अमेरिकी प्रशासन भी बेनजीर की हत्या के लिए वजीरिस्तान के तालिबानसमर्थक आतंकवादियों को जिम्मेदार बता रहा है। अमेरिका की सी.आई.. के सरगना ने दावा किया है कि सबूतों के आधार पर वे संतुष्ट हैं कि बेनजीर की हत्या के लिए अलकायदा समर्थक तालिबान जिम्मेदार हैं जिनका वजीरिस्तान में आधार है। इंग्लैण्ड की सरकार, जिसकी स्काटलैण्ड यार्ड हत्या की जांच में सहयोग कर रही है, के प्रवक्ता ने भी इस्लामिक आतंकवादियों के शामिल होने की संभावना व्यक्त की है। अमेरिका के नये करीबी, फ़्रांस के राष्ट्रपति सरकोजी, भी यही राग अलाप रहे हैं। इस पूरे घटनाक्रम से स्पष्ट है कि अमेरिकी प्रशासन तथा उसके सहयोगी बेनजीर भुट्टो की आड़ में वजीरिस्तान में पाकिस्तानी सेना की कार्रवाई तेज कराना चाहते हैं। इसका सीधा संबंध अफगानिस्तान में तेज होते राष्ट्रीय युद्ध से है जिसने अतिमहाशक्ति अमेरिका उसके सहयोगियों की सेनाओं के छक्के छुड़ा रखे हैं। खुद अपने देशवासियों के खिलाफ सेना का इस्तेमाल कराने के लिए अमेरिकी साम्राज्यवाद को मुशर्रफ जैसा दलाल शासन में चाहिए। इसीलिए अमेरिका मुशर्रफ को बचाने के लिए एड़ीचोटी का जोर लगा रहा है।

खुद मुशर्रफ के हाल के दो बयानों से स्पष्ट हो जाना चाहिए कि मुशर्रफ तथा उसके आका अमेरिकी शासक पाकिस्तान में लोकतंत्रा की स्थापना नहीं चाहते। मुशर्रफ के अनुसार पाकिस्तानी सेना बेनजीर भुट्टो से नफरत करती थी। दूसरा, उन्होंने यूरोप में कहा कि पाकिस्तान में लोकतंत्र की स्थापना सरल नहीं है। उसकी बात का समर्थन करते हुए अमेरिकी विदेश सचिव कोंडालीजा राईस ने भी कहा कि पाकिस्तान में लोकतंत्र की स्थापना बेहद पेचीदा सवाल है। दरअसल, अमेरिका अन्य साम्राज्यवादी देश तीसरी दुनिया के देशों में लोकतंत्र के खिलाफ हैं। और हों भी क्यों नहीं, जबकि उनकी पूरी कोशिश इन देशों की लूट और दोहन को तेज करना है। पाकिस्तान में लोकतंत्र की स्थापना के सबसे बड़े दुश्मन अमेरिकी साम्राज्यवादी शासक हैं।

बेनजीर भुट्टो की हत्या से पाकिस्तान में राजनीतिक संकट और गहरा हुआ है। इस संकट की जड़ में पाकिस्तान में अमेरिकी साम्राज्यवाद तथा उसके दलालों आम जनता के बीच लगातार तेज होता अंतर्विरोध है। बेनजीर की हत्या तथा उसकी आड़ में अफगानिस्तान के सीमावत्र्ती क्षेत्रो में पाकिस्तानी सेना की कार्रवाई इस अंतर्विरोध को और तेज करेगी। पाकिस्तानी शासकों ने बेनजीर की हत्या के बाद व्यापक रोष प्रदर्शनों के नाम पर चुनावों को लगभग 6 सप्ताह टाल दिया है जबकि पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी, पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज) तथा अन्य विपक्षी राजनीतिक पार्टियां चुनावों को टालने के विरुद्ध थीं। मुशर्रफ समर्थक पार्टी, पाकिस्तान मुस्लिम लीग (क्यू), जनता में भारी अलगाव में है। पाकिस्तान में सेना के 100 से धिक सेवानिवृत शीर्ष अधिकारियों ने मुशर्रफ के इस्तीफे की मांग की है। इस मुशर्रफ तथा अमेरिकाविरोधी माहौल में स्वतंत्रा निष्पक्ष चुनाव की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए। चुनावों में धांधलियों के प्रति पश्चिमी देशों में जनमत को तैयार करने के लिए मुशर्रफ तथा राईस लोकतंत्रा की स्थापना के रास्ते में मुश्किलों की बात कर रहे हैं। मुशर्रफ जानते हैं कि सत्ता में रहने के लिए अमेरिका तथा पश्चिम साम्राज्यवादी देशों का समर्थन लाजिमी है, इसलिए वह यूरोप की यात्रा पर गये हैं; अमेरिकी शासक तो उनके साथ हैं ही।

पाकिस्तान में आगामी चुनाव, यदि वे आयोजित किये जाते हैं, पाकिस्तान में गहराते संकट को हल नहीं कर सकेंगे। यदि चुनाव निष्पक्ष स्वतंत्रा होते हैं तो मुशर्रफ समर्थकों की व्यापक हार निश्चित है और सत्ता का जो भी समीकरण बने, अमेरिका के लिए पाकिस्तान में मुश्किलें बढ़ेंगी। मुशर्रफ की तानाशाही के खिलाफ संघर्षरत न्यायपालिका की बहाली का सवाल उठना निश्चित है। मीडिया पर लगे प्रतिबंधों को हटाने की मांग तेज होगी। यह सब अमेरिका समर्थित सैनिक तानाशाही के लिए संकट को और तेज करेगा। यदि चुनावों में मुशर्रफ समर्थकों को जिताने या कम से कम बड़ी ताकत के रूप में उभारने की कोशिश की जाती है तो जनता की नजर में चुनावों की विश्वसनीयता नहीं रहेगी तथा जनता के संघर्ष और तेज होंगे। अमेरिका का विरोध और व्यापक मुखर होगा। दोनों ही स्थितियों में पाकिस्तान में अमेरिका की मुश्किलों का बढ़ना लाजिमी है। दूसरी ओर, अफगानिस्तान में अमेरिकी हमलावर फौजों की खस्ता होती हालत के चलते पाकिस्तान के सीमावर्ती क्षेत्राओं में सैन्य कार्रवाई की अमेरिकी जरूरत लगातार बढ़ रही है। यदि ये हमले अमेरिका उसके सहयोगियों की सेनाएं स्वयं करती हैं तो उसके लिए सैनिक और धिक बढ़ाने होंगे एवं सैन्य दिक्कतें और हताहत काफी बढ़ेंगे तथा पाकिस्तान की व्यापक जनता शासक वर्गों के हिस्से भी इसके विरुद्ध होंगे। इसलिए अमेरिका यह काम पाकिस्तानी सेना से कराना चाहता है परन्तु अमेरिकाविरोधी वातावरण के तेज होने के कारण जनमत धिकाधिक इसके खिलाफ होता जा रहा है। इसीलिए अमेरिका उसके सहयोगी बेनजीर भुट्टो की हत्या की जिम्मेदारी सीमावर्ती क्षेत्रो में सक्रिय अमेरिकाविरोधी संगठनों पर डालकर पाकिस्तान सेना द्वारा कार्रवाई के पक्ष में पाकिस्तानी जनता को तैयार करने की कोशिश कर रहे है।

बेनजीर भुट्टो की हत्या की जांच इसके लिए असल में जिम्मेदार लोगों तक पहुंचेगी, यह संदेहास्पद है। खासकर, जब स्वयं जांच कराने वाले लोग पहले से तय कर चुके हैं कि इसके लिए किसको जिम्मेदार ठहराया जाना है। स्वाभाविक है कि पाकिस्तान की जनता को इस जांच में जरा भी विश्वास नहीं है।

अमेरिका का आतंकवादविरोधी युद्ध, तीसरी दुनिया के देशों पर सैन्य कब्जा जिसका अभिन्न अंग है, का अभियान इराक अफगानिस्तान की जनता के राष्ट्रीय युद्धों के चलते काफी क्षतिग्रस्त हुआ है। दुनिया भर में तीसरी दुनिया के देशों में अमेरिकी हस्तक्षेप साजिशें इन देशों की जनता को अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ आन्दोलित कर रही है। पाकिस्तान में अमेरिका उसके दलालों के खिलाफ बढ़ता जनविक्षोभ इसका अंग है।

जैसे हमारे देश में जहां व्यापक जनता साम्राज्यवादपरस्त आर्थिक नीतियों के खिलाफ है, इनके प्रभावों के बोझ तले कराह रही है, वहीं शासक वर्ग तथा उनका प्रतिनिधित्व करने वाली सभी पार्टियां इन नीतियों के पक्ष में एकमत हैं। इसी तरह पाकिस्तान में जहां व्यापक जनता अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ है, शासक वर्गों की मुख्य पार्टियां अमेरिका के प्रभाव में हैं तथा जनता के विरोध को कुंद करने के लिए प्रयासरत हैं। इस क्षेत्र में अमेरिका अपने नियंत्राण को बनाये रखने तथा बढ़ाने के लिए प्रयासरत है और जनता इस नियंत्राण के खिलाफ संघर्षरत है। यह संघर्ष निर्णायक मोड़ की ओर बढ़ रहा है।

Leave a Reply

You must be logged in to post a comment.

You must be logged in to post a comment.