February 28, 2008...10:13 pm

विदेशी व दलाल पूंजीपतियों को मायावती का तोहफा : गंगा एक्सप्रेस–वे योजना

Jump to Comments

उत्तर प्रदेश सरकार ने हाल में लगभग 40 हजार करोड़ रुपये की लागत वाली 1047 कि0मी0 लम्बी ग्रेटर नोयडा बलिया गंगा एक्सप्रेसवे की चार साल में निर्माण कराने की घोषणा की है। यह परियोजना प्रान्त के पूर्वी पश्चिमी छोर के बीच तीव्र गति के परिवहन मार्ग का निर्माण करके इस दूरी को मात्रा 10 घंटे में पूरा करने के घोषित उद्देश्य से लागू की जा रही है। मुख्यमंत्री मायावती के अनुसार यह देश की सबसे बड़ी अधिरचना योजना है और इससे बड़े पैमाने पर आर्थिक विकास तथा रोजगार विकसित होगा। सरकार के अनुसार गंगा नदी के उत्तरी छोर को, जहां पहले से ही समृद्ध खेती होती है, अब तक विकास योजनाओं ने अछूता छोड़ा हुआ था और इस विकास से इस क्षेत्रा के साथसाथ पूर्वांचल बुन्देलखण्ड का विशेष विकास होगा।

सरकार के अनुसार गंगा का उत्तरी क्षेत्रा हर साल बाढ़ग्रस्त हो जाता है और बांध के रूप में विकसित होने वाले इस एक्सप्रेसवे से यह बाढ़ रूक जायेगी। एक्सप्रेसवे परियोजना में लगभग पांच हजार एकड़ के दस विशेष विकास क्षेत्रा विकसित किये जायेंगे जिनमें बिजली, सड़क, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा, मकान आदि का निर्माण कराया जायेगा। इसके अतिरिक्त दस हजार एकड़ पर पांच से : हजार उद्योग लगाए जायेंगे। पूरी योजना में लगने वाले बड़े उद्योगों में लगभग : से सात हजार लोगों को नौकरी मिलने की बात है, और छोटे उद्योगों में लगभग तीन लाख लोगों को। यह सभी लाभ स्थानीय लोगों को होने की बात है। लगभग 1500 एकड़ में शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थाएं, पैंतीस आई0टी0आई, बीस पालीटेक्निक, दस इंजीनियरिंग कालेज, पांच मेडिकल कालेज संबंधित कालेज खोले जायेंगे। इस परियोजना के अंतर्गत सात से आठ लाख लोगों के आवास की व्यवस्था होगी और इन सभी कारणों से विकसित होने वाले अन्य विकास का लाभ लोगों को मिलेगा। इसके लिए सरकार ने 19 जिलों की 36 तहसीलों में 63,110 हे0, यानी लगभग डेढ़ लाख एकड़, जमीन अधिग्रहीत करने की योजना बनायी है। योजना में चार बड़े सम्पर्क हाईवे भी बनाये जायेंगे।

इस पूरी योजना का ठेका 00पा0 के सहयोगी पूंजीपति जे0पी0 ग्रुप को दिया गया है। इसके अन्तर्गत राज्य सरकार बिना किसी वित्तीय भागीदारी के केवल सहयोगी भूमिका में रहेगी और निवेशकर्ता इस बात के लिए मुक्त होगा कि वह सड़क पर 30 साल के लिए टोल टैक्स लगाकर तथा औद्योगिक, व्यावसायिक आवासीय विकास हेतु जमीनें विकसित करके कमाई कर सकेगा। जमीन का अधिग्रहण भी कम्पनी ही करेगी और इसमें 1893 के भूमि अधिग्रहण कानून के स्थान पर राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम यू0पी0 रोड साइड लैण्ड कन्ट्रोल एक्ट लागू होगा जो कि बेहद विभेदकारी एवं दमनात्मक है। कम्पनी को टैक्स में भी 35 साल की छूट मिलेगी।

योजना की घोषणा से स्पष्ट है कि सरकार ने प्रदेश के समग्र विकास की अनदेखी कर विकास के काम को केवल कम्पनियों एवं दलालों के विकास की दृष्टि से देखा है। परियोजना की कीमत कम से कम रखने की दृष्टि से अधिग्रहीत की जाने वाली जमीन की कीमत न्यूनतम रखी गई है। विस्थापितों को 150 वर्गमीटर शहरों में अथवा 250 वर्गमीटर ग्रामीण क्षेत्रों में आवास के लिए आबंटित किये जाने का प्रावाधान किया गया है। जाहिर है आबंटन कम्पनी करेगी और विस्थापितों को यह जमीन खरीदनी होगी, क्योंकि तो सरकार ने लाखों की संख्या में होने वाले इन विस्थापितों की इस भूमि के लिए स्वयं कोई धनराशि आबंटित की है और ही कम्पनी को ही बाय किया है कि कम्पनी ऐसे क्षेत्रो का निर्माण करके पहले विस्थापितों को आबंटित करे। यही नहीं, योजना की यह शर्त है कि विकसित किये गये फ्लैट या प्लाटों में 15 प्रतिशत विस्थापितों को बेचा जाये। कम्पनी के लिए जमीन के अधिग्रहण का काम स्वयं सरकार करा रही है।

मुआवजे के रूप में सरकार ने केवल एक वर्ष तक परिवार के एक व्यक्ति को न्यूनतम मजदूरी का भुगतान, 25,000/– रुपये वैकल्पिक कार्यस्थल के निर्माण तथा 10,000/– रुपये घर बदलने के भुगतान के रूप में प्रतिकर घोषित किया है। यह स्पष्ट नहीं है कि यह धनराशि सरकार देगी या कम्पनी, क्योंकि कम्पनी से यह रकम दिलाने की स्पष्ट व्यवस्था घोषित नहीं है और सरकार की इस योजना में वित्तीय भागीदारी नहीं है।

मुआवजे के लिए सरकार ने यह भी घोषणा की है कि जो लोग अधिग्रहीत की जाने वाली जमीन पर तीन वर्ष से ज्यादा समय से रह रहे उन्ह अलग से मुआवजा मिलेगा। यह भी घोषणा है कि परिवार के एक व्यक्ति को नौकरी मिलेगी या 750 दिन के लिए न्यूनतम मजदूरी के बराबर की धनराशि मिलेगी, पर इसे देने की जिम्मेदारी भी निर्धारित नहीं की गई है।

इस परियोजना की तारीफ में कुछ सरकारी समर्थकों ने मायावती की तुलना बुद्धिमान बादशाह शेरशाह सूरी से करने का प्रयास किया है परन्तु यह स्पष्ट है कि जी0टी0 रोड बनाने की शेरशाह सूरी की बुद्धिमत्ता और मायावती की जनविनाश की इस बेवकूफी में विपरीत ध्रुवों का मेल है। शेरशाह सूरी का जी0टी0 रोड लगभग नदी की दक्षिणी छोर पर चल रहा है और इसकी मरम्मत और विकास परिवहन को बेहतर बनाने की पूर्ति कर सकती थी। परन्तु तीन फसली चार फसली गंगा के किनारे की मूल्यवान भूमि से करीब दो लाख परिवारों को विस्थापित करके एक नया सम्पर्क मार्ग बनाया जा रहा है। कहा जा रहा है कि गंगा के पानी से उत्तर की ओर फैलने वाली बाढ़ भी नियंत्रिात हो जायेगी क्योंकि गंगा एक्सप्रेसवे बांध का भी काम करेगा। परन्तु इस तथ्य को नजरअन्दाज किया जा रहा है कि गंगा घाटी के बिहार उत्तर प्रदेश के क्षेत्रो में बाढ़ का बड़ा कारण गंगा में बह रहा पानी नहीं है बल्कि गंगा के उत्तर हिमालय पर्वत से बहकर आनेवाला पानी है जो कि आकर गंगा में मिलता है और यह सारा पानी बांध से बाधित होकर गंगा के उत्तर के सारे क्षेत्रा में भयंकर बाढ़ को जन्म देगा, ठीक उसी तरह जैसे कि बिहार के उत्तरी जिलों में पूरी खरीफ की फसल इस बाढ़ से बर्बाद हो जाती है। जाहिर है कि इसका असर खेती की बर्बादी पर पड़ेगा ही, बल्कि लाखों की संख्या में लोग बारबार बेघर होंगे। यही नहीं उत्तरी छोर पर सड़क के रूप में बड़ा बांध बनने से दक्षिणी क्षेत्रा में भी बाढ़ की समस्या बढ़ेगी।

इस परियोजना को तैयार करने का सरकारी मकसद स्पष्ट रूप से यह है कि खेती की सस्ती जमीन अधिग्रहीत करके उद्योग, आवास, विशेष आर्थिक क्षेत्रा, भवन निर्माण आदि धन्धों को बढ़ावा दिया जाये जैसा कि साम्राज्यवादी संस्था विश्व बैंक भी प्रोत्साहित कर रहा है। साम्राज्यवादियों और उनके दलालों के लिए जनता की आत्मनिर्भरता का विकास देश के विकास के लिए जरूरी नहीं है और कम्पनियों दलालों का विकास ही देश के विकास का मापदण्ड है। इसी तर्ज पर अधिरचना एवं औद्योगिक विकास आयुक्त श्री अतुल कुमार गुप्ता ने पत्राकारों से बात करते हुए पहले तो यह कहा कि अधिग्रहीत होने वाली सारी जमीन लगभग बेकार भूमि है जिसकी व्यावसायिक कीमत बहुत कम है। परन्तु बहस के दौरान उन्होंने यह कहा कि इसको बदकिस्मती समझिए या खुशकिस्मती, उत्तर प्रदेश बेहद उपजाऊ कृषि भूमि, जिस पर दो या तीन फसलें पैदा होती हैं, पर गर्व कर सकता है। विशेष आर्थिक क्षेत्रो के निर्माण के हमारे ज्यादातर प्रस्ताव केन्द्र सरकार के उस नये नियम में उलझ गये कि इन क्षेत्रो में 10 प्रतिशत से ज्यादा खेती की जमीन नहीं होनी चाहिए। परन्तु विशेष आर्थिक क्षेत्रो को लगा यह धक्का गंगा एक्सप्रेसवे परियोजना से हल हो जायेगा। यह केवल एक हाईवे नहीं होगा बल्कि 1047 कि0मी0 लम्बी दूरी में विशेष आर्थिक क्षेत्रो के निर्माण के लिए पर्याप्त जगह अवसर प्रदान करेगा।

जब अपने जन्म दिन पर इस परियोजना की घोषणा करते हुए मायावती ने यह दावा किया कि यह परियोजना किसानों के हित की है क्योंकि बलिया के किसान अब दस घंटे में अपनी पैदा की गई सब्जी दिल्ली तक बिकने के लिए भेज सकेंगे तो वे स्वयं भी इस बात को जानती थीं कि साम्राज्यवादपरस्त अन्य योजनाओं की तरह यह योजना भी किसानों की बर्बादी उन्हें उजाड़ने की योजना है और लाभ केवल कम्पनियों, बिचौलियों दलालों को होगा। शासक वर्ग के अन्य दल एक्सप्रेसवे का विरोध कर रहे ह। सपा, भाजपा कांग्रेस ने तो साफ ही कह दिया कि एक्सप्रेसवे स्वीकार किया जा सकता है परन्तु उद्योग विशेष क्षेत्रा के लिए खेती की कीमती जमीन कम दाम पर लिया जाना स्वीकार नहीं किया जा सकता है। उनके अनुसार किसानों का अधिकार केवल अच्छे दाम पर अपनी जमीन बेचना है।

इस तरह की जनविरोधी योजनाओं का दृढ़ता से विरोध करना देश की जनता उनकी आजीविका की रक्षा के लिए बेहद जरूरी है और यह काम तभी सम्भव है जब लोग शासक वर्गों की पार्टियों के दलाल चरित्रा को समझते हुए विस्थापन के विरुद्ध दृढ़तापूर्वक मुकाबला करें।

Leave a Reply

You must be logged in to post a comment.