February 29, 2008...9:00 pm

भारत में केवल 41 प्रतिशत लोगों के पास किसी भी प्रकार का रोजगार! बढ़ती बेरोजगारी व बढ़ती विकास दर जन–विरोधी व्यवस्था का कमाल!

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बढ़ती बेरोजगारी

11 फरवरी, 2008 को जयपुर (राजस्थान) के पास अम्बर शहर में सी.आई.एस.एफ. (केन्द्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल) के लिए नाई व धोबियों की नौकरियां हेतु भरती चल रही थी। हालांकि ये पोस्ट `कुशल’ माने जाते हैं, परीक्षा के लिए 80,000 उम्मीदवार पहुंच गये। बिहार, राजस्थान, हरियाणा व अन्य प्रान्तों में पिछले वर्षों में अर्धसैनिक  बलों में भर्तियों के दौरान हुई घटनाओं की याद ताजा कराते हुए, यहां भी भगदड़ मच गई। अधिकारियों के अनुसार एक उम्मीदवार मारा गया व चार गंभीर रूप से घायल हुए। चलें लखनऊ (उ प्र) के पास भावनवां गांव। 28 जनवरी, 2008 की भोर में एक नाई माजिद (50 वर्ष) भूख व ठंड से मर गये। 26 जनवरी को उसके 11 सदस्यीय परिवार के लिए उसकी पत्नी ने आधा किलो आटा मांगकर रोटियां बनाई थी। परन्तु 27 जनवरी को फिर माजिद को काम नहीं मिला, तो रात को परिवार भूखा सोया। इलाका अधिकारियों ने स्वीकार किया कि 2002 में जब गरीबी रेखा के नीचे के लोगों का सर्वेक्षण चल रहा था, माजिद का नाम छूट गया। इसलिए इस परिवार के पास गरीबी रेखा के नीचे वाला राशन कार्ड भी नहीं था, जिससे कम से कम सस्ता अनाज तो मिल जाता। राजाधानी दिल्ली में कुछ माह पहले दक्षिण दिल्ली के अच्छे स्तर की एक कालोनी में रहने वाली 12वीं पास महिला भूख से मर गई। इसकी पुष्टि उसकी पोस्टमार्टम रिपोर्ट से हुई। उसकी दो बहनें (एक पोस्टग्रेजुएट व एक बी.ए. पास) भूख से आमरी हालत में पाई गईं। एक–एक कर तीनों की नौकरियां छूट गई थीं तथा आय का कोई और स्रोत नहीं था। 

ऐसी बहुत–सी घटनाएं रोज अखबारों में आती हैं। पर, अखबारों के मुख्य पृष्ठों पर होता है  भारत का विकास दर 9 प्रतिशत है, अर्थव्यवस्था चमक रही है, नौकरियां बढ़ रही हैं ! साथ ही महिला राष्ट्रपति जी बयान देती हैं कि देश को सामाजिक न्याय का भी ध्यान रखना चाहिए। जोर–शोर से सरकारी घोषणाएं होती हैं कि राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना 1 अप्रैल, 2008 से पूरे भारत में लागू हो जायेगी। वहीं सी.ए.जी. की एक ड्राफ्ट रिपोर्ट  में, जहां–जहां यह योजना जारी है, इसका मूल्यांकन किया गया है। इसके अनुसार, जहां रोजगार पैदा किया जाना था वहां ऐसा बहुत सीमित तरीके से हुआ है तथा कई अन्य तरह की समस्याएं योजना लागू करने में अवरोध हैं। कुल मिलाकर, सवाल उठता है कि देशवासियों के साथ `पूरे भारत में इस योजना को लागू करने’ के नाम पर मजाक तो नहीं किया जा रहा ?

साथ ही, 2005–’06 के लिए रोजगार व बेरोजगारी की स्थिति का आंकलन करते हुए राष्ट्रीय सैम्पल सर्वे संगठन (एन.एस.एस.ओ.) की रिपोर्ट हाल में घोषित हुई है। यह बताता है कि भारत में 41 प्रतिशत आबादी के पास रोजगार है। यह भी स्पष्ट है कि रोजगार–प्राप्त लोगों का अनुपात घट रहा है क्योंकि 2004–’05 में यह 43 प्रतिशत था। यानी, कुल मिलाकर स्थिति यही है कि सरकारें व पैसे वाले वर्ग का भारत कितना भी चमके; आम लोगों के लिए बेरोजगारी बढ़ रही है, रोजगार के अवसर घट रहे हैं, कर्जों के बोझ असहनीय हो रहे हैं। यह सब सरकारी नीतियों का सीधा असर है। सच यह है कि भारत के शासक रोजगार पैदा करने वाली नीतियां अपनायेंगे ही नहीं।

रोजगार की स्थिति पर रिपोर्ट : मुख्य बिंदु

भारत में, जनगणना के अलावा, समय–समय पर अलग–अलग मुद्दों पर अखिल भारतीय स्तर पर `सैम्पल सर्वे’ किये जाते हैं जिसमें आबादी के कुछ हिस्से को जांच का केन्द्र बनाया जाता है। ये सर्वे कुल स्थिति के संकेत देते हैं तथा सरकारी नीतियों में फेरबदल के आधार भी बनते हैं। 2005–’06 में ऐसा सर्वे रोजगार व बेरोजगारी की स्थिति को लेकर किया गया। सर्वे के इस 62वें दौर की रिपोर्ट हाल ही में घोषित हुई है। 4798 गांवों व 5125 शहरी इलाकों में रहने वाले कुल 3.7 लाख लोगों से इस सर्वे के दौरान सम्पर्क किया गया। रोजगार व बेरोजगारी का सही आंकलन लगाने के लिए तीन अलग पहलू देखे गये :

(क) `आम’ तरीका : यानी, पिछले 365 दिनों में रोजगार था या नहीं।

(ख) मौजूदा साप्ताहिक : सर्वे किये जाने वाले सप्ताह के पहले वाले सप्ताह में रोजगार था या नहीं।

(ग) मौजूदा दैनिक : सर्वे के दिन/एक दिन पहले रोजगार था या नहीं।

रिपोर्ट के अनुसार : 2005–’06 में देश की 41 प्रतिशत आबादी के पास रोजगार था। 2004–’05 में 43 प्रतिशत आबादी के पास रोजगार था।

56 प्रतिशत ग्रामीण पुरुषों व 31 प्रतिशत ग्रामीण महिलाओं तथा 57 प्रतिशत शहरी पुरुषों व 15 प्रतिशत शहरी महिलाओं के पास रोजगार था; यानी यह स्पष्ट है कि महिलाओं की तुलना में ज्यादा पुरुषों के पास रोजगार है। अत: 2004 के मुकाबले ग्रामीण महिलाओं की नौकरियां 2 प्रतिशत कम हो गईं। शहरी पुरुषों के लिए रोजगार रेट 1 प्रतिशत गिरा व व महिलाओं के लिए 3 प्रतिशत।

 देश में कामकाजी लोगों की कुल आबादी का अनुपात ग्रामीण क्षेत्रों के लिए 43 प्रतिशत व शहरी क्षेत्रों के लिए 35 प्रतिशत है। इस अनुपात की दैनिक दर साप्ताहिक दर से कम है व साप्ताहिक दर `आम’ दर से कम है। इसका मतलब है कि कई लोगों के पास भले ही 365 दिनों में कुछ दिन रोजगार रहता है, परन्तु मौजूदा तौर पर वे बेरोजगार थे। यह अद्र्धरोजगारी की स्थिति दिखाता है। इस सर्वे में छात्राओं व घरेलू महिलाओं को `कामकाजी’ नहीं माना गया है।

 50 प्रतिशत ग्रामीण परिवार स्वरोजगार में जुटे हैं। ये कुल ग्रामीण आबादी के 55 प्रतिशत हैं।

 35 प्रतिशत आबादी (यानी ग्रामीण परिवारों का 38 प्रतिशत) ग्रामीण श्रमिकों की है।

 शहरों में 42 प्रतिशत परिवारों में नियमित रोजगार था (जो कि शहरी आबादी का 40 प्रतिशत है)।

 36 प्रतिशत परिवार (शहरी आबादी का 42 प्रतिशत) स्वरोजगार से जुड़े है

देश के `श्रम करने के काबिल’ आबादी में  (यानी 15 वर्ष से 59 वर्ष की आयु की आबादी) 58 प्रतिशत ग्रामीण लोगों (पुरुष व महिला) तथा 65 प्रतिशत शहरी लोगों के पास रोजगार था; चाहे दैनिक रोजगार हो, चाहे साप्ताहिक अथवा `आम’।

दैनिक व साप्ताहिक रोजगार दरों का आम रोजगार दर से तुलना करने से देश में अर्धरोजगारी (अंडरइम्प्लाएमेंट) की स्थिति पता चलती है। `आम’ कामकाजी/आबादी अनुपात व मौजूदा साप्ताहिक दर में ग्रामीण इलाकों में 4 प्रतिशत (पुरुष 3 प्रतिशत, महिला 5 प्रतिशत) फर्क है व शहरी क्षेत्रो में 1 प्रतिशत (महिला व पुरुष, दोनों 1 प्रतिशत) का फर्क। यह स्पष्ट है कि ग्रामीण महिलाओं में अर्धरोजगार ज्यादा है।

स्वरोजगार

मोटे रूप से यह पाया गया कि स्वरोजगारों की संख्या ग्रामीण पुरुषों में घट गई है।

 1983 के सर्वे रिपोर्ट के अनुसार 61 प्रतिशत पुरुष स्वरोजगार में जुटे थे। अब केवल 57 प्रतिशत ही इस वर्ग में पाये जा रहे हैं। महिलाओं की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है (62 प्रतिशत)।

 रोजगार में जुटी आबादी में नियमित नौकरियों में लगीं महिलाओं का अनुपात शहरी व ग्रामीण, दोनों ही भागों में कम था। ग्रामीण क्षेत्रो में `आम’ तौर पर कार्यरत पुरुषों में आधे से अधिक  (57 प्रतिशत) स्वरोजगार करते हैं (महिलाएं 62 प्रतिशत)। शहरों में `आम’ तौर पर कार्यरत पुरुषों में 42 प्रतिशतस्वरोजगार में जुटे हैं (महिलाएं 44 प्रतिशत)।

कैजुअल प्रथा

1983 से 2005–’06 तक कैजुअल कार्य में जुटे पुरुषों का अनुपात बढ़ गया है व ऐसा ग्रामीण पुरुषों में ज्यादा हुआ है (ग्रामीण क्षेत्रो में 29 प्रतिशत से अब 33 प्रतिशत, शहरी क्षेत्रो में 15 प्रतिशत से अब 16 प्रतिशत) महिला कैजुअल कामगार 1983 से 2005–’06 तक ग्रामीण इलाकों में 1 प्रतिशत से कम हुईं व शहरों में 11 प्रतिशत से।

वेतनभोगी (नियमित रोजगार) पुरुषों का अनुपात गांवों में 1983 के समान है पर शहरों में 2 प्रतिशत गिरा है। महिलाओं में अनुपात शहरी क्षेत्रो में 14 प्रतिशत बढ़ गया है।

साप्ताहिक व दैनिक रोजगार रेट

`आम’ रोजगार वाले पुरुषों (यानी 365 दिनों में जिनके पास रोजगार `आम तौर’ पर होता है) से जब पूछा गया कि सर्वे के सप्ताह से पहले वाले सप्ताह में उनकी रोजगार की स्थिति क्या थी, तो पाया गया कि ग्रामीण इलाकों में 5 प्रतिशत व शहर में 2 प्रतिशत पुरुष बेरोजगार थे। महिलाओं में, विशेषकर ग्रामीण महिलाओं में, स्थिति ज्यादा गंभीर है  18 प्रतिशत महिलाएं ग्रामीण क्षेत्रो में व 8 प्रतिशत शहरी क्षेत्रो में बेरोजगार थे

जिन लोगों के पास सर्वे के सप्ताह में रोजगार था पर उस दिन नहीं था : शहरी पुरुष 3 प्रतिशत, ग्रामीण पुरुष 6 प्रतिशत; शहरी महिला 11 प्रतिशत व ग्रामीण महिला 21 प्रतिशत। इसका मतलब है कि दोनों तरह के क्षेत्रो में काम की कमी के दौरान काम से हटने वाली महिलाओं का अनुपात ज्यादा है।

बेरोजगारी

इस समस्या के विवरण के लिए भी तीन अलग सवाल रखे गये थे लगातार बेरोजगार (यानि 365 दिनों में), कई सप्ताह बेरोजगार व सर्वे के समय बेरोजगार।

हर 1,000 आबादी में कितने बेरोजगार हैं, इसके आंकलन के बजाए अगर यह देखा जाये कि हर 1,000 कामकाज के काबिल आबादी में कितने बेरोजगार हैं, तो यह स्पष्ट तौर पर पता चलता है कि कामकाज के काबिल आबादी का कितना भाग बेरोजगार है। इस रिपोर्ट में इस दर को `बेरोजगारी दर’ माना गया है।

बेरोजगारी दर शहरों में महिलाओं के लिए पुरुषों की तुलना में ज्यादा है, परन्तु ग्रामीण क्षेत्रो में कम है। दैनिक बेरोजगारी रेट `आम’ रेट व साप्ताहिक रेट से अधिक है, जो दर्शाता है कि बहुत सारे रोजगार के अवसर कुछ विशेष समय पर मिलते हैं।

1993–’94 की तुलना में बेरोजगारी रेट शहरी महिलाओं को छोड़ (जिनमें बदलाव नहीं), 2005–’06 में 1 प्रतिशत बढ़ गया। 2004–’05 की तुलना में बेरोजगारी रेट शहरी व ग्रामीण पुरुषों के लिए बढ़ गया व महिलाओं के लिए समान रहा।

महिलाओं के रोजगार की स्थिति

एन.एस.एस.ओ. रिपोर्ट के अनुसार, भले ग्रामीण क्षेत्रा हों या शहरी, लैंगिक आधार पर भेदभाव एक सच्चाई है।

 देश के कामकाजी लोगों में महिलाओं का अनुपात पुरुषों के मुकाबले कम है। देश के कामकाजी लोग/आबादी अनुपात में ग्रामीण इलाकों में महिलाओं के लिए दर 31 प्रतिशत है, जबकि पुरुषों के लिए 55 प्रतिशत है। शहरी इलाकों में महिलाओं के लिए यह दर 14 प्रतिशत है जबकि पुरुषों के लिए 54 प्रतिशत। 1,000 पुरुषों की तुलना में शहर में 214 महिलाओं के पास व गांव में 396 महिलाओं के पास रोजगार है।

 ग्रामीण क्षेत्रो में औसतन महिला का कैजुअल श्रम के लिए दैनिक वेतन पुरुष की तुलना में 20 रुपये कम होता है, हालांकि दोनों समान घंटे काम करते हैं। गैर–कैजुअल श्रमिकों में वेतन का फर्क 50 रु. प्रतिदिन है।

 हालांकि महिलाएं व बच्चे ग्रामीण कामकाजियों का 60 प्रतिशत हैं, उनके दैनिक वेतन बहुत कम हैं  महिलाओं के लिए दिन के 30 रु. तथा बच्चों के लिए दिन के 12 रुपये। शहरी इलाकों में जहां पुरुषों को 80 रु. प्रतिदिन मिलते हैं, महिलाओं के लिए यह वेतन 44 रु. प्रतिदिन है व बच्चों के लिए 33 रु. प्रतिदिन। मोटे तौर पर यह कहना सच है कि मिलने वाला वेतन विभिन्न राज्य सरकारों व केन्द्र सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम वेतनों का 50 प्रतिशत भी नहीं है।

 ग्रामीण क्षेत्रो में महिलाओं के लिए यह कोई जरूरी नहीं है कि शिक्षा का स्तर बेहतर होने से वेतन बेहतर हो। इन क्षेत्रो में ग्रेजुएट महिलाओं को 170 रु. प्रतिदिन वेतन मिलता है, जबकि पुरुषों को 239 रुपये प्रतिदिन।

सेवा व निर्माण (मैन्यूफैक्चरिंग) क्षेत्रो में शहरी इलाकों में बच्चियों का वेतन 10 रुपये प्रतिदिन पाया गया, जबकि बच्चों को लगभग 30 रुपये प्रतिदिन मिल जाते हैं। होटलों में छोटे लड़कों का वेतन 25 रु. प्रतिदिन के आसपास रहता है।

सरकारी रोजगार योजनाएं  विफल

इस रिपोर्ट ने बेहद स्पष्ट तरीके से उजागर किया है कि सरकारी योजनाओं (बांध व सड़क निर्माण, रोजगार सुरक्षा स्कीमें, सम्पूर्ण ग्राम रोजगार योजना, `काम के बदले अनाज’ योजना आदि) में सर्वे किये गये लोगों में (15 वर्ष के ऊपर के लोग) ग्रामीण क्षेत्रो में 5 प्रतिशत को ऐसी योजनाओं के तहत रोजगार मिला। 7 प्रतिशत ने ऐसा काम ढूंढ़ा पर उन्हें नहीं मिला तथा 88 प्रतिशत ने ऐसे काम तलाशे ही नहीं। जिन 5 प्रतिशत को रोजगार मिला उनमें 6 प्रतिशत पुरुष थे व 3 प्रतिशत महिलाएं। 7 प्रतिशत जिन्हें काम नहीं मिला, उनमें 8 प्रतिशत पुरुष थे व 6 प्रतिशत महिलाएं। 85 प्रतिशत पुरुषों व 91 प्रतिशत महिलाओं ने ऐसा काम ढूंढ़ा ही नहीं।

जिन लोगों ने ऐसी योजनाओं के तहत काम किया उनमें पुरुषों को 365 दिनों में औसतन 17 दिन काम मिला तथा महिलाओं को 365 दिनों में 18 दिन। कुछ बेहतर तबके के लोगों को 365 दिनों में 24 दिन काम मिला। काम करने वाले पुरुषों को औसतन 56 रु. प्रतिदिन वेतन मिला व महिलाओं को 54 रु. प्रतिदिन।

इसके संदर्भ में सरकार द्वारा 1 अप्रैल, 2008 से `रोजगार गारंटी योजना’ को अखिल भारतीय रूप देने की घोषणाओं का असली आंकलन किया जा सकता है। यह उस स्कीम का हाल है जिसे प्रधानमंत्री (जो असली क्रान्तिकारियों को तो आतंकवादी कहते हैं) क्रान्तिकारी व ऐतिहासिक कहते हैं।

उम्र के आधार पर कामकाजी लोग/ आबादी अनुपात, युवकों में रोजगार

उम्र के आधार पर देखा जाये तो इस रिपोर्ट में यह अनुपात 30–59 वर्ष के वर्ग में सबसे अधिक था तथा इसके पश्चात ही युवा वर्ग को स्थान मिलता है (15–29 वर्ष)। युवा वर्ग (15–29 वर्ष) में यह अनुपात अनपढ़ों में सबसे ज्यादा है, चाहे ग्रामीण क्षेत्रा हों या शहरी। ग्रामीण क्षेत्रो में अनपढ़ युवतियों के लिए यह अनुपात सबसे ज्यादा है।

युवा वर्ग में 5 प्रतिशत शहरी व 1 प्रतिशत ग्रामीण लोगों के पास कुछ औपचारिक तकनीकी शिक्षा थी अथवा प्राप्त कर रहे थे। 7 प्रतिशत ग्रामीण युवकों व 9 प्रतिशत शहरी युवकों को औपचारिक या अनौपचारिक व्यावसायिक (यानी, वोकेशनल जो कि तकनीकी नहीं है) प्रशिक्षण प्राप्त था।

युवक वर्ग में कामकाजी लोग/आबादी का अनुपात ग्रामीण व शहरी, दोनों क्षेत्रो में, अपनढ़ों के लिए सबसे ज्यादा पाया गया जबकि 15–59 वर्षों के वर्ग को अगर लिया जाये तो पोस्टग्रेजुएटों के लिए शहरी क्षेत्रो में यह अनुपात सर्वा‌ धिक था।

`बेरोजगारी रेट’ साक्षर नौजवानों में सबसे अधिक पाई गई  ग्रामीण क्षेत्रो में 12 प्रतिशत, शहरी क्षेत्राों में 16 प्रतिशत।

रिपोर्ट के अनुसार, कृषि में रोजगार का अनुपात घट रहा है

इस रिपोर्ट में कामकाजी ग्रामीण लोगों में 65 प्रतिशत पुरुष व 81 प्रतिशत महिलायें प्राथमिक क्षेत्रों (यानि कृषि जिसमें माईनिंग व पत्थर खनन जुड़ा नहीं है) में जुड़े थे।

 1983 में 78 प्रतिशत पुरुष व 88 प्रतिशत महिलाएं प्राथमिक क्षेत्रों में जुड़े थे।

 1987 में 75 प्रतिशत पुरुष व 85 प्रतिशत महिलाएं प्राथमिक क्षेत्रों में जुड़े थे।

 1993 में 74 प्रतिशत पुरुष व 86 प्रतिशत महिलाएं प्राथमिक क्षेत्रों में जुड़े थे।

 1999 में 71 प्रतिशत पुरुष व 85 प्रतिशत महिलाएं प्राथमिक क्षेत्रों में जुड़े थे।

इन्हीं वर्षों में ग्रामीण भारत में द्वितीय क्षेत्रा (यानि कृषि को छोड़कर) में पुरुषों के काम करने का अनुपात बढ़ा है। 1983 में यह 10 प्रतिशत था जो अब 17 प्रतिशत है।

शासकों की नीतियां तो रोजगार की स्थिति में और संकट पैदा कर रही हैं

जहां सरकारी ऐजेन्सियां ही इस तरह की रिपोर्ट पेश कर रही हैं, वहीं इनके तथ्यों का कोई भी असर न केन्द्र सरकार की नीतियों और न ही राज्य सरकारों की नीतियों पर पड़ रहा है। उल्टे, बहुत से ऐसे सवाल हैं जो हालात को और भी गंभीर बनायेंगे।

सरकार की टैक्सटाईल नीति व निर्यात पर चोट

टैक्सटाईल क्षेत्र  भारत के सबसे पुराने उद्योगों में से है। इतने विशाल देश में क्रयशक्ति में कमी के कारण इस उद्योग का बड़ा हिस्सा निर्यात पर निर्भर है तथा शासक वर्ग इसी में खुश हैं। हाल में अमेरिकी अर्थव्यवस्था में आये संकट का एक असर है कि रुपये की तुलना में डालर की कीमत घटी है  यानी, भारतीय निर्यात अमेरिकी बाजार में महंगे हो गये हैं। गिरते निर्यात को कारण बनाकर देश में व्यापक छंटनी व ले–आफ हुए हैं। एक अनुमान है कि पैंतालीस लाख नौकरियां पिछले छ: महीनों में छंटनी का शिकार हुई हैं। यह आंकड़ा तो महज बड़े उद्योगों व संगठित क्षेत्रा की स्थिति को ही दर्शाता है। असंगठित क्षेत्रो में व्यापक तौर पर छंटनी व ले–आफ हुए हैं। कई जगह कामगारों को दो–तीन महीने की `दिवाली की छुट्टी’ दी गई  वेतन के बिना। सरकारों ने बड़ी मात्रा में इस क्षेत्रा को सब्सिडी तो दी, पर छंटनी–तालाबंदी पर रोक नहीं लगाई। सरकारों के पास घरेलू बाजार में राशन दुकानों से बिक्री के लिए `जनता कपड़ा’ बनवाने का रास्ता भी था जो विशाल घरेलू बाजार का फायदा उठा कर इस उद्योग को स्थिर रूप से काम देती और जनता की जरूरतों पर यह क्षेत्रा आधारित होता। जाहिर है, यह रास्ता नहीं अपनाया जा रहा है।

और तो और, 12 फरवरी, 2008 के इकोनॉमिक टाईम्स ने रिपोर्ट छापी कि टैक्सटाईल उद्योगपतियों (बड़े घरानों) की बैठक में विचार किया गया  श्रम की उत्पादकता पर! कुछ मालिकों ने सुझाव दिया कि अगर सरकारें ले–आफ रोकने वाले `प्राचीन कानून’ (जिसने पैंतालीस लाख नौकरियों को तो बचाया नहीं) बदल डालें तो राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी जैसी योजना टैक्सटाईल क्षेत्र में लागू की जा सकती है जिसमें 365 दिनों में से 200 दिन काम दिया जायेगा !

भूमि अधिग्रहण की नीतियां

विकास व औद्योगिकरण के नाम पर केन्द्र व राज्य सरकारें बहुराष्ट्रीय कम्पनियों व बड़े पूंजीपति घरानों के लिए भूमि अधिग्रहण में जुटी हैं। अन्य सभी सवालों को छोड़कर, रोजगार पर इसके असर को यहां देखा जाये। जो भूमि ली जा रही है वह बंजर भूमि नहीं है बल्कि देश की बहुत उपजाऊ कृषि भूमि है। उड़ीसा में पोस्को कम्पनी के लिए आंकलन किया गया है कि 20,000 बसे–बसाये परिवारों को बेरोजगार कर (ये पान की खेती, चावल की खेती व मछलियां पकड़ने के काम में लगे हैं तथा पान व मछली निर्यात किये जाते हैं) लगभग 4,500 नौकरियां (मैनजर इत्यादि सहित) पैदा की जायेंगी। कलिंगनगर में टाटा का प्रस्तावित प्लांट 10,000 परिवारों को उजाड़ कर 2,500 नौकरियां पैदा करने की बात कर रहा है। यही स्थिति दूसरे इलाकों में है। इनके असर भी सामने आने लगे हैं। 10 फरवरी, 2008 को सिंगुर (प. बंगाल) में 45 वर्षीय भूमिहीन किसान भूख से मर गये। वह खेत मजदूर थे जिन्हें टाटा द्वारा इलाके में जमीन लेने के बाद से काम नहीं मिला। उनकी पत्नी ने बयान दिया है कि पिछले महीनों में कभी भी घर में पर्याप्त खाना नहीं होता था।

गिरता औद्योगिक विकास दर, कृषि में आया संकट

दिसम्बर ‘06 की तुलना में (जब यह विकास दर 13.4 प्रतिशत था) दिसम्बर ‘07 का विकास दर लगभग आधा हो गया है (7.6 प्रतिशत)। बिजली उत्पादन, निर्माण (मैन्यूफैक्चरिंग) व खनन में भी विकास दर घट गया है। मूल उत्पादों का उत्पादन दर दिसम्बर ‘06 के 12.4 प्रतिशत से 3.1 प्रतिशत हो गया है। इस सब का असर रोजगार पर पड़ता है। वैसे भी कृषि क्षेत्र में सरकारों की नीतियों के कारण आये संकट के कारण मझौले व छोटे किसान देश के कई इलाकों में बढ़ती संख्या में आत्महत्यायें कर रहे हैं। सूदखोरी आसमान छू रही है तथा सरकारें जिस तरह जनता की तबाही में हाथ बंटा रही हैं उससे यही भ्रम पैदा होता है कि स्थिति विकल्पहीन है।

एन.जी.ओ. अपनी जगह बनाने में लगे हैं

ये एन.एस.एस.ओ. रिपोर्ट या ड्राफ्ट कैग (सी.ए.जी.) रिपोर्ट यह स्पष्ट दर्शाते हैं कि सरकार की राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना कानून अधिकतर कागजों तक सीमित हैं। पर, यह कहते हुए कि इसी कानून के तहत राजस्थान में 6 जिलों में पिछले वर्ष हर परिवार को 77 दिन का काम मिला श्रीमती अरूणा राय व जीन डे्रेज ने सरकार के पक्ष में सफाई पेश की है (हिन्दुस्तान टाईम्स, फरवरी 1, 2008)। उनका कहना है कि इस कानून ने सार्वजनिक कामों की योजनाओं को लागू करने में बुनियादी फर्क ला दिया है। इसमें वे बताते हैं कि अब न्यूनतम वेतन न देने के शोषण करने वाले व्यवहारों से मुकाबला किया जा सकता है व लोगों को इस प्रोग्राम में व्याप्त भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ने देता है ! फिर वे बताते हैं कि ड्राफ्ट सी.ए.जी. रिपोर्ट का केवल यह मतलब है कि अगर अच्छी तरह तैयारी न की जाये तो 1 अप्रैल के बाद यह पलट कर मार सकती है।

18 फरवरी, 2008 को हिन्दुस्तान टाईम्स में ही एक जांच रिपोर्ट छपी। यह राजस्थान के उन 6 जिलों की है जहां रोजगार गारंटी योजना लागू होती है और जांचकर्ताओं में श्रीमति अरूणा रॉय व जीन ड्रेज के नाम भी हैं। इस जांच में पता चला कि ऐसे पांच लोगों, जो कई वर्ष पहले मर गये थे, के नाम योजना के मस्टर रोल पर हैं। कई ऐसे लोगों के नाम भी थे जो कई वर्ष पहले इलाका छोड़ चुके हैं; दलितों के पास नौकरी कार्ड नहीं है तथा उनसे कार्ड बनाने के लिए घूस मांगी गई, पंचायत अधिकारी योजना से कमाई कर रहे हैं आदि–आदि। इस स्थिति को अपने पूर्व लेख में श्रीमति रॉय व ड्रेज ने कानून को ग्रामीण समुदाय के लिए जीवन का नया स्रोत करार दिया।

केन्द्र सरकार ने इससे पहले इस कानून (नगेरा) की सफाई में कहा है कि 2006–’07 में किसी भी दिन इसके तहत लगभग 30 लाख लोगों को 200 जिलों (जहां यह लागू है) में काम मिला है। इस बात को लगभग तथ्य मानते हुए, लेखकों ने फिर माना है कि राज्य सरकारों ने अधिकतर इस कानून पर जोर ही नहीं दिया व दूसरी ओर केन्द्र में यू.पी.ए. का कानून के प्रति दोमुंहा व्यवहार है  वे उसके संगठनात्मक चुनौतियों को स्वीकार नहीं करते बल्कि अपनी मुख्य उपलबियों में से एक के तौर पर नगेरा को पेश करते हैं।

दोनों लेखक (व तीसरे लेखक श्री निखिल डे) केन्द्रीय रोजगार गारंटी काऊंसिल के सदस्य हैं। यह `केन्द्रीय काऊंसिल’ उन पोस्टों/संस्थानों में है जो यू.पी.ए. सरकार के दौर में `प्रगतिशीलों’ व एन.जी.ओ. के प्रमुख लोगों को सरकारी पदें देकर राज में सम्मिलित करने के लिए स्थापित किये गये। बहुत होशियारी से, कठिन शब्दों में, उन्होंने सरकार की सफाई पेश की है। रोजगार गारंटी तो दूर, जनता के हाथ से तो सरकारें चलते हुए रोजगार छीन रही हैं।

शासकों का गारंटी तरीका  जनाक्रोश को जनता को बांटने के लिए इस्तेमाल किया जाये

बेरोजगारी के बढ़ते प्रकोप के सामने जनता के गुस्से को पथभ्रष्ट करने के लिए शासकों ने कई झुनझने फेंक रखे हैं। यह सच है कि इनके बावजूद देश के पैमाने पर रोजगार के स्रोतों पर हमलों के विरुद्ध स्थानीय संघर्ष फूट पड़ते हैं (कहीं भूमि अधिग्रहण–विरोधी, कहीं छंटनी– विरोधी)। पर, मौटे तौर पर शासक वर्ग जनता को बांटकर मूल सवालों से इनकी नजर हटाने के लिए प्रयासरत रहे तथा कुछ हद तक सफल भी रहे।

पिछले एक वर्ष की कुछ घटनाओं को देखें। राजस्थान में गुज्जरों के आन्दोलन को लेकर कई लोग राजकीय हिंसा में मारे भी गये तथा गुज्जर–मीणा एक दूसरे के खिलाफ खड़े हैं। कारण ? मीणाओं को अनुसूचित जनजाति होने के नाते जो फायदे मिलते हैं; गुज्जरों का मानना है कि वे उनके भी हैं। यह फायदा क्या है ? पढ़ाई व नौकरियों के लिए आरक्षण। उड़ीसा में कई वर्षों से पाण व कंधो  के बीच विवाद फूटकर आयापाण आदिवासी माना जाना चाहते हैं हालांकि वे अनुसूचित जनजाति नहीं हैं बल्कि गरीब दलित हैं  क्योंकि उन्हें भी आरक्षण के फायदे मिलेंगे। असम में चाय जातियों का गुवाहाटी की सड़कों पर कांग्रेस के भड़काने पर शहर वालों ने विरोध किया क्योंकि वे जनजाति माना जाना चाहते हैं। ऐसा माने जाने पर आरक्षण के फायदे मिलते हैं और कुछ काम भी मिलता है।

इसी तरह मुम्बई में राज ठाकरे या उसके पहले शिव सेना जो सवाल उठा कर अपनी पहचान बनाते हैं उसमें भी लोगों के रोजगार असुरक्षा को भड़काने की चेष्टा है।

उत्तर भारत में, विशेषकर मेडिकल कॉलेजों में, उभरा आरक्षण–विरोधी आन्दोलन मूल रूप से इस बात को लेकर भी था कि जो नौकरियां व अवसर ऊपरी जातियों के कब्जे में है उन्हें क्यों बांटा जा रहा है।

सवाल को अब तो यहां लेकर आना चाहिए  क्यों 1947 के 60 वर्ष बाद भी सबके लिए रोजगार व सबके लिए शिक्षा का प्रबंध नहीं हो रहा है ? क्यों बिल्लियों की तरह जनता रोटी के हिस्सों के लिए लड़ने को मजबूर है तथा शासकों को चैन से पूरी रोटी खाने दे रही है ? क्या यह असंभव सपना है, बढ़ती जनसंख्या की देन है, या नीतियों में खोट

नीतियां ऐसी कि देशहित जनहित नहीं, दलाली कामयाब रहे

1947 से ही आर्थिक नीतियों का मकसद यह नहीं रहा है कि देश को आत्मनिर्भर बनाया जाये, बहुमत जनता को नजर में रखकर विकास की परिभाषा तय की जाये तथा ऐसी नीतियां लागू की जाएं जिससे देश की जरूरतों पर आधारित औद्योगिकरण हो, खाद्य सामग्री में आत्मनिर्भर बनाया जाये तथा घरेलू बाजारों का विकास किया जाये। आत्मनिर्भर भारत बनाने का रास्ता साम्राज्यवाद व उसके दलालों के शोषण को खत्म कर कृषि क्रान्ति के कार्य को पूरा करके ही हो सकता था। यह रास्ता तेलंगाना ने दिखाया था लेकिन शासकों ने इसे नकारा। भारत का रास्ता साम्राज्यवादी पूंजी पर आधारित `विकास’ तथा दलाली को पनपाने का रहा है जिसका फायदा दलाल वर्गों को हो। इसीलिए, नगेरा कानून नहीं, साम्राज्यवादी पूंजी व बड़े पूंजीपति घराने की सेवा नहीं; रोटी के टुकड़ों को अपने बीच नोच कर नहीं बल्कि बेरोजगारी का सवाल नीतियों के बदलाव से ही हल हो सकता है। इसके लिए नवजनवादी क्रान्ति को विजयी बनाना होगा।

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राष्ट्रीय सैम्पल सर्वे रिपोर्ट 2005–’06 के कुछ अन्य पहलू

अगर मुख्य काम (जहां कामगार की प्राथमिक अवस्था हो) व सब्सिडीयरी कामों को गिना जाये, तो कामकाजी/आबादी अनुपात ग्रामीण इलाकों में पुरुषों के लिए 55 प्रतिशत और महिलाओं के लिए 31 प्रतिशत (कुल 43 प्रतिशत) तथा शहरी इलाकों में पुरुषों के लिए 54 प्रतिशत व महिलाओं के लिए 14 प्रतिशत (कुल 35 प्रतिशत) है।

इसमें सभी पुरुषों में लगभग 1 प्रतिशत ने सब्सिडीयरी कार्य किये थे, परन्तु 9.1 प्रतिशत ग्रामीण व 2.1 प्रतिशत शहरी महिलाओं ने इस तरह का काम किया था।

इस अनुपात की `आम’ संख्या व मौजूदा–सप्ताहिक में गांवों में 4 प्रतिशत फर्क है (पुरुष 3 प्रतिशत, महिला 5 प्रतिशत) तथा शहरी क्षेत्रो में 1 प्रतिशत (पुरुष व महिलाओं के लिए समान)। मौजूदा–दैनिक शहर में साप्ताहिक से 2 प्रतिशत कम है (दैनिक 32 प्रतिशत, साप्ताहिक 34 प्रतिशत) व ग्रामीण इलाकों में 35 प्रतिशत है जो साप्ताहिक से 4 प्रतिशत कम है। महिलाओं के लिए ग्रामीण क्षेत्रो में दैनिक 20 प्रतिशत है पर साप्ताहिक 31 प्रतिशत (यानी 11 प्रतिशत का फर्क है)।

अगर इसी अनुपात को 2004–’05 के अनुपातों के साथ तुलना करें तब पता चलता है कि यह अनुपात 2005–’06 में ग्रामीण पुरुषों के लिए बदला नहीं, पर शहरी क्षेत्रो के पुरुषों के लिए 1 प्रतिशत कम हो गया। ग्रामीण महिलाओं के लिए 2 प्रतिशत कम हुआ और शहरी क्षेत्रो की महिलाओं के लिए 3 प्रतिशत।

 1983 से अब तक ग्रामीण क्षेत्रो में द्वितीय कार्यों में पुरुषों का अनुपात बढ़ता गया है  10 प्रतिशत 1983 में तथा अब 17 प्रतिशत। महिला 1983 में 7 प्रतिशत व 12 प्रतिशत अब।

शहरों में 2005–’06 में `टरशीयरी सेक्टरों‘ में जुटे पुरुष 59 प्रतिशत थे (द्वितीय कार्यों में 34 प्रतिशत) व महिलाएं 52 प्रतिशत (द्वितीय कार्यों में 33 प्रतिशत)।

 13 प्रतिशत लोग (16 प्रतिशत ग्रामीण व 3 प्रतिशत शहरी, 13 प्रतिशत पुरुष व 12 प्रतिशत महिलाएं)  सब्सिडीयरी आर्थिक कार्यों में जुटे हैं।

शहरी व ग्रामीण क्षेत्रो में ऐसी महिलाओं, जिनके पास रोजगार नहीं था, ने पुरुषों से ज्यादा संख्या में कहा कि उन्होंने कुछ सब्सिडीयरी काम बीच–बीच में किया है।

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