February 29, 2008...5:37 pm
महाराष्ट्र में राज ठाकरे की मुहिम : शासक पार्टियों द्वारा जनता को बांटने की साजिशों का एक और उदाहरण
मुम्बई तथा महाराष्ट्र में उत्तर प्रदेश तथा बिहार से आये मजदूरों के खिलाफ राज ठाकरे की मुहिम जहां शासक वर्गों की व्यवस्था के अंतर्विरोधो को उजागर करती है, वहीं यह शासक वर्गों की विभिन्न पार्टियों द्वारा देश में बेरोजगारी की बढ़ती समस्या के खिलाफ युवाओं के आक्रोश को दिग्भ्रमित करने का प्रयास है। साथ ही, मुम्बई तथा महाराष्ट्र की घटनाएं इस बात का भी खुलासा करती है कि शासक वर्गों की पार्टियां सत्ता की छीना–झपटी में किस हद तक जा सकती हैं। शासक वर्गों की पार्टियों के बीच सत्ता की यह मार–काट साम्राज्यवाद–परस्त नई आर्थिक नीतियों की पृष्ठभूमि में चल रही है जिस पर ये सब पार्टियां एकमत हैं तथा जो देश में बेरोजगारी की समस्या को और विकराल बना रही हैं। शासक वर्गों की पार्टियों का प्रयास है कि जनता के बीच विद्वेष को तेज कर जनता के वास्तविक शत्रुओं का हित साधन करें तथा इस विद्वेष की आग में अपनी सत्ता की रोटियां सेकें।
इन घटनाओं ने शासक वर्गों की `विकास’ की नीति पर भी सवालिया निशान खड़ा किया है जिसके तहत देश पर साम्राज्यवादी शोषण व सामंती उत्पीड़न का शिकंजा मजबूत रखते हुए देश के बड़े हिस्से को पिछड़ेपन के अंधेरे में रखते हुए समृद्धि के `टापुओं’ के निर्माण की नीति लागू की गई है।
महाराष्ट्र में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के राज ठाकरे द्वारा शुरू की गई मुहिम को महाराष्ट्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस–एन.सी.पी. सरकार का वरदहस्त प्राप्त है। आगामी चुनावों को देखते हुए वे शिवसेना के आधार में सेंध लगाने के लिए प्रयासरत हैं। न केवल राज ठाकरे व उनके गुट को महाराष्ट्र से बाहर के लोगों के खिलाफ विषवमन की खुली छूट दी गई, उसके खिलाफ केस भी दस दिन बाद दर्ज किया गया। उसकी गिरफ्तारी को एक प्रचार–मुहिम में बदल दिया गया। विलासराव देशमुख की सरकार पूरे घटनाक्रम को मूकदर्शक बनकर देखती रही जबकि उनके सत्तारूढ़ गठबंधन को महाराष्ट्र में कई नगर निकायों में राज ठाकरे की एम.एन.एस. का समर्थन प्राप्त है।
कांग्रेस–एन.सी.पी. सरकार न केवल शिवसेना के आधार में सेंध लगाने की योजना पर अमल कर रही है, साथ ही महाराष्ट्र में अपने कुशासन के खिलाफ गुस्से को उत्तर प्रदेश व बिहार से आये मजदूरों के खिलाफ मोड़ने का प्रयास कर रही है। कांग्रेस–एन।सी.पी. के शासनकाल में महाराष्ट्र किसानों की आत्महत्याओं में शीर्ष स्थान पर पहुंच गया है। कांग्रेस–एन.सी.पी. सरकार बहुराष्ट्रीय कम्पनियों तथा बड़े पूंजीपति घरानों के लिए बड़े पैमाने पर भूमि का अधिग्रहण कर रही है तथा किसानों व गांवों के अन्य तबकों को बेरोजगार कर रही है। महाराष्ट्र सरकार द्वारा लागू की जा रही नीतियों के तहत बेरोजगारी और बढ़ी है तथा रोजगार पर दबाव तेज हुआ है। अन्यथा मुम्बई में बाहर के लोगों का आकर काम करना कोई नई बात नहीं है और न ही इसमें हाल के समय में विशेष तेजी आई है।
दूसरी ओर, शिवसेना कांग्रेस सरकार पर राज ठाकरे का समर्थन करने के लिए अंगुली उठाते हुए तथा राज ठाकरे की चुनौती को समझते हुए देश के अन्य हिस्सों से आये मजदूरों के खिलाफ मुहिम में साझेदारी कर रही है। उसकी सहयोगी भाजपा भी सत्ता के आंकड़ों का हिसाब करते हुए जहां कांग्रेस की उसी बात के लिए आलोचना कर रही है, वहीं असली सवाल पर वह चुप्पी साधे हुए है। इस पूरे विवाद पर अपने–आपको राष्ट्रीय पार्टियां कहने वाली कांग्रेस व भाजपा का रवैया उनके असली चरित्रा का खुलासा करता है।
महाराष्ट्र में शासक वर्गों की पार्टियों के राजनीतिक अंतर्विरोध से उपजे इस विवाद की आड़ में उत्तर प्रदेश तथा बिहार के शासक वर्गों के राजनीतिज्ञ अपनी कलुसित छवि सुधारने के लिए प्रयासरत हैं। मुलायम सिंह यादव और मायावती, लालू यादव और नितीश कुमार इस बहती गंगा में उत्तर प्रदेश व बिहार के लोगों के खिलाफ अपने अपराधों को धोने का प्रयास कर रहे हैं। बिहार में ग्रामीण क्षेत्रो में अद्र्धसामंती उत्पीड़न व जकड़न, पिछड़ेपन व बेरोजगारी के लिए क्या लालू यादव तथा नितीश कुमार जिम्मेदार नहीं हैं जिसके चलते बड़ी संख्या में लोग पलायन करने के लिए मजबूर हैं ? बिहार में बंद पड़े उद्योगों की सुध लेने के लिए न लालू यादव को होश है न नितीश कुमार को, जिनके मजदूर भुखमरी व विपता के शिकार हैं। क्या लालू यादव व नितीश कुमार ने इन उद्योगों को फिर से चलाने के प्रयास किये ? जाहिर है नहीं। और, अब बिहार की जनता के ये अपराधी जनता के पक्षार होने का दिखावा कर रहे हैं। बिहार को अति पिछड़ा रखने के लिए यही पार्टियां तथा इनकी सरकारों की नीतियां जिम्मेदार हैं।
ऐसी ही हालत उत्तर प्रदेश की है जिसके विशाल क्षेत्रा काफी पिछड़े हुए हैं। पिछले एक दशक से यहां मुलायम सिंह यादव तथा मायावती का शासन है तथा इसके पहले कांग्रेस व भाजपा का शासन रहा है। लेकिन जनता की हालत में मौलिक बदलाव नहीं आया तथा विशाल ग्रामीण भूभाग अद्र्धसामंती उत्पीड़न व जकड़न के शिकार हैं। अगर इसके लिए कांग्रेस व भाजपा, मुलायम सिंह व मायावती जिम्मेदार नहीं, तो कौन जिम्मेदार है ? जनता के पिछड़े तबकों को जातीय आधार पर वोट बैंक बनाकर ये पार्टियां उनकी समस्याएं हल करने की जगह साम्राज्यवादी कम्पनियों, बड़े पूंजीपति घरानों तथा बड़े भूस्वामियों की सेवा में लगी रही हैं। जहां भूमि सुधारों को लागू करने का कोई प्रयास नह किया जा रहा है, यहां तक कि कागजों पर दशकों से आबंटित भूमि पर भूमिहीनों को कब्जा दिलाने की सुध भी इन पार्टियों को नह है, वह ये बड़ी जमीन विशालकाय कम्पनियों को दे रही ह। जनता की समस्याएं कम होने की जगह और विकराल होती गई हैं।
और जब शासक वर्गों की अन्य पार्टियां इस खेल में लगी हैं तो सी.पी.एम. कैसे पीछे रह सकती थी ? उसके एक मंत्री ने बयान देकर राजस्थान के मारवाडि़यों को भ्रष्ट तरीका अपनाने का अपराधी बताया। यह कहते समय वह शायद भूल गये कि पिछले 31 वर्षों से पश्चिम बंगाल में उनकी पार्टी लगातार सत्ता में रही है तथा यह भ्रष्टाचार उनकी अपनी सरकार के शासन का मूल्यांकन है।
महाराष्ट्र की घटनाएं जहां शासक वर्गों की पार्टियों द्वारा लागू की जा रही नीतियों के चलते बढ़ती बेरोजगारी से पैदा हुई हैं, वहीं ये यह भी दर्शाती हैं कि शासक वर्गों की पार्टियां इस समस्या का `समाधान’ कैसे करना चाहती हैं। निश्चय ही वे जन–विरोधी , रोजगार–विरोधी नीतियों को बदलने की जगह जनता को बांटकर, उसके विभि हिस्सों को आपस में लड़ाने की साजिश तेज कर रही हैं। साम्राज्यवाद–परस्त बड़े पूंजीपतियों व बड़े जमींदारों की ये पार्टियां और कर भी क्या सकती हैं ? इनसे जनपक्षीय विकास की आशा करना ही व्यर्थ है, क्योंकि इनका वर्ग चरित्रा ही जन–विरोधी व देश– विरोधी है। जनता को साम्प्रदायिक, जातीय व क्षेत्रीय आधार पर बांटकर ये अपने `विकास’ की दिशा पर अमल जारी रखेंगी। इनसे क्षेत्रीय असमानता, जातीय उत्पीड़न व साम्प्रदायिक आधार पर भेदभाव की समाप्ति की अपेक्षा ही व्यर्थ है। न ही ये बेरोजगारी खत्म करने की नीतियां अपनायेंगी अथवा अपना सकती ह। उल्टे इनकी सरकारों की नीतियां बेरोजगारी को और बढ़ा रही ह व बढ़ायेंगी।
महाराष्ट्र की घटनाओं ने फिर देश में क्रान्तिकारी परिवर्तन के लिए संघर्ष को तेज करने की जरूरत को रेखांकित किया है। भारत में साम्राज्यवादी शोषण तथा अद्र्धसामंती उत्पीड़न समाप्त करके ही बेरोजगारी की समस्या को हल किया जा सकता है। और, ऐसा देश में नवजनवादी क्रांति को विजयी बनाकर ही किया जा सकता है।
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