March 1, 2008...11:04 am
चन्द्रशेखर आजाद के 78वें शहादत दिवस पर : जमुना घाटी में सामंत–माफिया गिरोहों व बसपा नेताओं को संगठित चुनौती
रोजगार की रक्षा के लिए मशीनें हटाने का बालू मजदूरों का पुन: सफल संघर्ष
27 फरवरी, 2008 को इलाहाबाद में कई संगठन अमर शहीद चन्द्रशेखर आजाद का 78वां शहादत दिवस मना रहे थे। पार्टी ने भी इस अवसर पर घूरपुर में एक यादगार सभा का आयोजन किया था, जिसमें लगभग 300 लोगों ने भाग लिया। सभा को सम्बोधित करते हुए पार्टी के नेताओं ने उपस्थित साथियों को समझाया कि भारत की जनता का मुक्ति संघर्ष गांव के सामन्तों, उनके गुण्डों और राज्य समर्थित माफिया व ठेकेदारों को क्रांतिकारी वर्गों के संघर्ष द्वारा चुनौती देकर ही विकसित किया जा सकता है। क्रांतिकारी वर्गों की ऐसी गोलबंदी की मुख्य ताकत ग्रामीण भूमिहीन व गरीब किसान है । ये किन सवालों पर संघर्ष शुरू करते हैं, यह बात इनके जीवन के ठोस सवालों से तय होती है। पार्टी के कार्यकर्ताओं पर ये जिम्मेदारी है कि इनके फौरी संघर्षों को क्रांतिकारी संघर्षों में विकसित करें। चन्द्रशेखर आजाद व उनके साथियों का, भारत की जनता की आजादी का सपना साकार करने का आधार, आज की ठोस परिस्थितियों में यही हो सकता है, क्योंकि जनता तथा देश की आजादी विदेशी लुटेरों और उनकी लूट के स्थानीय सहयोगी, बड़े दलाल पूंजीपति और गांव के बड़े जमींदारों के वर्तमान राज में कैद है।
भारत की जनता की आजादी के इस महत्वपूर्ण यादगार दिवस के अवसर पर जमुना घाटी के बालू मजदूरों ने माफिया के शोषण, अत्याचार तथा बालू खनन व्यवस्था पर वर्चस्व के विरुद्ध इलाहाबाद, कौशाम्बी व चित्राकूट जिलों में एक और महत्वपूर्ण संघर्ष किया। अखिल भारतीय किसान मजदूर सभा के नेतृत्व में गोलबंद बालू मजदूर बसपा सरकार के गठन के बाद से ही इलाहाबाद शहर से करीब 40–50 किलोमीटर पश्चिम की ओर माफिया द्वारा नदी के बालू खनन के कार्य में बड़े पैमाने पर लगायी गयी खनन मशीनों व लोडरों के प्रयोग के विरुद्ध संघर्ष कर रहे थे।
उत्तर प्रदेश में बालू खनन का काम नदी में सरकारी पट्टों के आबंटन के मायम से कराया जाता है। इन पट्टों के पट्टेधारक आम तौर पर इलाके के बड़े जमींदार, माफिया व तात्कालिक सरकार से सम्बद्ध नेता होते ह जो रिश्वत की बड़ी धनराशि अदा करके पट्टे प्राप्त करते है और अधिकारियों को लगातार हिस्सा देते रहते है । हालांकि उत्तर प्रदेश उपखनन नियमावली 1963 के अन्तर्गत नदी की बालू, मोरम, बजरी और बोल्डर जैसे छोटे खनिजों के खनन का काम स्थानीय पिछड़े वर्ग के लोगों के रोजगार की सुरक्षा के लिए आरक्षित है और खनन कार्य में मशीनों का प्रयोग वर्जित है, उत्तरोत्तर सरकारें सरकारी राजस्व की पूर्ती के बहाने इस नियम के उल्लंघन में लीन रही है, यह कहकर कि मजदूरों द्वारा बालू निकासी से राजस्व की पूर्ति नहीं हो पाती।
अद्र्धसामंती शोषण
इस व्यवसाय के शोषण के क्रूर रूप, मजदूर के बीच माफिया के बंदूकधारियों का डर, गांव पर राजनीतिक वर्चस्व वाले स्थानीय सामन्ती तत्वों व दलालों द्वारा माफिया को गांव में जगह देना, उनकी माफिया के साथ धन्धे में हिस्सेदारी और भ्रष्ट सरकारी महकमे द्वारा इन सबको खुला समर्थन, मजदूरों के शोषण की पूरी स्थिति के लिए जिम्मेदार हैं। माफिया तथा इलाके के दबंग जमींदार न केवल बालू निकासी में नाविकों (मजदूर व नाविक प्राप्त धनराशि को बराबर बांटते है) को कम रेट देते रहे है बल्कि उनसे लम्बी उधारी पर बालू गिरवाते रहे है। यही नहीं, वे नदी के कछार की जमीन पर ककड़ी, खीरे की खेती, मछली के व्यवसाय और नदी की आर–पार की उतरवायी पर भी अवैध ढंग से मनचाहा गुण्डा टैक्स वसूलते है और महिलाओं के साथ बदसलूकी करते है। लम्बे समय से बेलचों के द्वारा बालू खनन करने वाले मजदूर व नाविक इनके शोषण व अत्याचार के मूक शिकार रहे ह। बालू के धन्धे के अलावा नदी तट पर खेती, मछली पकड़ना व बेचना, बाध बुन कर बेचना, चारपाई आदि की बुनाई तथा अपने या जमींदारों के खेतों पर खेती करना इन किसानों–कारीगरों–मजदूरों के जीविकोपार्जन का आधार रहा है।
बालू की निकासी व बाजार में बिक्री के व्यवसाय में उत्पादन के संबंध नदी के पट्टों पर माफिया गिरोहों के सामंती वर्चस्व पर आधारित है जिसका कानूनी अधिकार खदान के पट्टे देने की सरकारी व्यवस्था में है। पारम्परिक रूप से तथा उन जगहों पर जहां बालू की निकासी इतनी कम होती है कि इन तत्वों को व्यावसायिक रूचि नहीं है, वहां गांव के मजदूर व नाविक ही इस काम को अधिकारपूर्वक करते रहे है। क्योंकि पहले से ही नदी के पारम्परिक कामों से सामंत लोग गुण्डा टैक्स वसूलते रहे थे, अब बालू निकासी के धन्धे में भी वे पट्टेधारकों के स्थानीय आधार बने हुए है तथा इस व्यवसाय में अद्र्धसामंती शोषण का इस्तेमाल कर रहे है।
मजदूर संघर्ष का विकास
2004–’05 में पहली बार बड़े पैमाने पर, सपा शासन के दौरान 2 स्थानीय विधायकों, एक सपा व एक भाजपा, की पहल पर शहर से लगभग 15–20 किलोमीटर दूर माफियाओं ने एक के बाद एक, कई मशीनें लगाई थीं। इसकी अनुमति उन्हें उच्च न्यायालय से राजस्व पूर्ति करने की आड़ में अगली तारीख तक अंशकालिक रूप में मिली थी। पर सरकारी गठजोड़ ने इसे स्थाई रूप दे दिया। मशीनों के प्रयोग से बालू बेहद सस्ती हो गई और हजारों मजदूर एकाएक बेरोजगार हो गये। प्रशासन के समक्ष कई विशाल प्रदर्शनों के बावजूद जब मशीनें नहीं रोकी गयीं और माफिया की हेकड़ी बढ़ती गई, तो 3 मार्च 2005 को हजारों की संख्या में संगठित ढंग से मजदूरों ने मशीनों पर हमला बोला और करीब 5 मशीनों को तहस नहस कर दिया। घटना में 2 मजदूरों को माफिया द्वारा चलाई गई गोलियों से चोट लगी पर सपा प्रशासन ने सैकड़ों मजदूरों पर आगजनी, लूटपाट के फर्जी मुकदमे दर्ज किए। प्रशासन की मदद से मशीनों को दुबारा चलवाने और इन मुकदमों के विरुद्ध कई महीनों तक जनसंघर्ष जारी रहा जिसके फलस्वरूप आगे की कार्यवाही रूकी हुई है।
परन्तु इस संघर्ष के बाद धीरे –धीरे कंजासा–बीकर गांवों के इस केन्द्र से और 30 किलोमीटर ऊपर बालू के पट्टाधारक माफियाओं ने मशीनें लगानी शुरू कर दीं और बसपा सरकार के बनने के बाद उसके वरिष्ठ नेतागण, मंत्री इन्द्रजीत सरोज, सांसद व विधायक प्रत्याशी केशरी देवी पटेल व दीपक पटेल तथा ब्लाक प्रमुख गिरीश पासी आदि की अगुवाई में मशीनें केन्द्रित होने लगीं। उस 8–10 किलोमीटर के दायरे में लगभग 25 मशीनें केन्द्रित हो गयीं और मशीनों की बालू सस्ती होने के कारण इलाहाबाद के पूरे शेष क्षेत्रो पर भी इसका प्रभाव पड़ने लगा। बड़े पैमाने पर लोग बेरोजगार होने लगे। इसमें करीब 100 गांवों के लगभग 50 हजार लोग प्रभावित है।
इस नये क्षेत्रो में, जो शहर से दूर होने के कारण सामंती गुण्डों के वर्चस्व से और भी ज्यादा प्रभावित है, मजदूरों का शोषण और ज्यादा है। बड़े पैमाने पर मजदूरों की जमीनें सामंतों ने कब्जा की हुई है और खास तौर पर नदी की कटान में कटी हुई जमीन के बदले में, बीच नदी में निकली लंका भूमि पर मिले पट्टों पर भी इन्ह सामंतों का कब्जा है। गुण्डा टैक्स न देने पर या मजदूरों द्वारा विरोध करने पर गोलियां चल जाना और मजदूरों की मौत हो जाना आम बात है। इसी इलाके में ये मशीनें केन्द्रित हुईं।
पिछले कई महीनों से इस इलाके के साथियों के बीच चर्चा के बाद इन मशीनों को हटाने के सवाल पर मजदूरों के संघर्ष का सिलसिला शुरू हुआ जिसमें दोनों जिलों की तहसीलों व थानों पर कई छोटे–बड़े प्रदर्शन मजदूरों ने किये। 20 दिसम्बर, ‘07 को कौसाम्बी जिले के औधन गांव में एक बड़ी जनसभा आयोजित की गई जिसमें लगभग 1000 से ज्यादा लोगों ने भाग लिया। इस गांव में कौसाम्बी के सबसे दबंग पट्टेधारक गिरीश पासी का जातीय आधार पर मजबूत वर्चस्व रहा है, पर क्योंकि बिरादरी के ज्यादातर लोग मजदूरी करने और नाव चलाने पर निर्भर है, यहां आंदोलन का अच्छा आधार तैयार होता गया और उसे बिरादरी का साथ नहीं मिल पाया। साथ ही दूर–दराज के गांवों में लगातार लोगों की बैठकें करने के कारण आंदोलन जीतने के प्रति एक विश्वास बनता चला गया और धीरे–धीरे लोग सीधे मशीनों को रोकने की तैयारी में जुटने लगे। कौसाम्बी जिले के जलालपुर, मदारीपुर, गोहटी, तारापुर, पनसारा, बिसौना, फुलवा, नन्दा पूरा, केवट पूरा, मल्हीपुर, कटैया, बियूर, असरावल, भकन्दा, खुर्द, मैनापुर, शेरगढ़, नसीरपुर, औधन, सैदपुर, पिपरहटा, चित्राकूट जिले के कोटरा, परदवां व बडियारी तथा इलाहाबाद जिले की बारा तहसील के पड़ुआ, प्रतापपुर, सेमरी, अमिलिया, बिलहोर, पचवर, जगदीशपुर, बीरवल, कंजासा, बीकर, पालपुर, बसवार आदि गावों में तैयारी बैठकें हुईं। फिर भी इस नये इलाके के लोगों को यह उम्मीद थी कि पुराने इलाके से भी अच्छी गोलबंदी हो ताकि एक मजबूत ताकत सामने आए।
20 फरवरी, 08 को मजदूरों ने नये इलाके के पड़ुआ गांव में एक जनसभा रखी जिसमें लगभग 2000 लोगों ने जोश के साथ भागीदारी की जिसमें काफी जनता पुराने इलाके से थी। बारा तहसील का प्रशासन भी भारी संख्या में मौजूद था। उसने कुछ देर आनाकानी करने के बाद साफ रूप से घोषणा की कि मशीनों को तत्काल प्रभाव से रोक दिया जाएगा और एक सप्ताह के अंदर दोनों जिलों के प्रशासन साथ बैठ कर स्थाई हल निकाल लें