March 4, 2008...6:47 pm
प . बंगाल - पुलिस द्वारा फारवर्ड ब्लॉक के कार्यकर्ताओं की हत्या के विरोध में ‘बंगाल बंद’
प. बंगाल की सी.पी.एम. नेतृत्वाधीन `वाम‘ मोर्चा सरकार की जन–विरोधी नीतियों के खिलाफ प्रदेश की जनता के बढ़ते संघर्षों की पृष्ठभूमि में `वाम‘ मोर्चे के घटकों के बीच तेज होते अंतर्विरोध के क्रम में 5 फरवरी, 2008 को पुलिस ने कूच बिहार जिले के दिनहाता सब–डिवीजन में फारवर्ड ब्लॉक द्वारा संगठित प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाई तथा 5 प्रदर्शनकारियों की हत्या कर दी। फारवर्ड ब्लॉक द्वारा प्रांत भर में सब–डिवीजन कार्यालयों पर प्रदर्शन आयोजित किये गये थे। इसी आवाह्न पर दिनहाता सब–डिवीजन आफिसर के कार्यालय पर प्रदर्शन किया गया था। राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना के तहत वर्ष में 100 दिन रोजगार देना तथा गरीबी रेखा से नीचे के लोगों (बी पी एल) के लिए कार्डों की सूचि की गलतियों को दूर करना फारवर्ड ब्लॉक के विरोध–प्रदर्शनों की मुख्य मांगों में शामिल थे।
जनता के बढ़ते विक्षोभ का निशाना बन रही सी.पी.एम. को अपने नेतृत्वाधीन मोर्चे के घटक फारवर्ड ब्लॉक द्वारा किया गया विरोध भी बर्दाश्त नहीं हुआ तथा उसकी सरकार ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर गोलियों की बौछार कर दी। प्रदेश में गृह विभाग (पुलिस) राज्य के मुख्यमंत्री सी.पी.एम. नेता बुद्धदेव भट्टाचार्य के पास है। फारवर्ड ब्लॉक के विधायक अक्षय ठाकुर के अनुसार पुलिस द्वारा की गई अंधाधुंध गोलीबारी में 50 से अधिक प्रदर्शनकारियों को गोलियां लगीं। मृत लोगों के अलावा 25 लोगों को गंभीर हालत में अस्पतालों में भरती कराया गया।
फारवर्ड ब्लॉक की पश्चिम बंगाल राज्य कमेटी के सचिव अशोक घोष ने प्रदर्शनकारियों पर हमले को पूर्व–नियोजित बताते हुए इन हत्याओं को दूसरे नंदीग्राम की संज्ञा दी। श्री अशोक घोष ने सी.पी.एम. के राज्य सचिव बिमान बसु द्वारा प्रदर्शनकारियों पर हिंसा, तोड़फोड़ के आरोपों को झूठ का पुलिंदा बताया। फारवर्ड ब्लॉक ने इसके खिलाफ 6 फरवरी, ‘08 को 24 घंटे के `बंगाल बंद‘ की घोषणा की। बाद में इसकी अविधि घटाकर 12 घंटे कर दी गई। विपक्षी पार्टियों ने भी बंद का समर्थन किया। बंद का समर्थन करते हुए सी.पी.आई. (एम–एल)–न्यू डेमोक्रेसी की प. बंगाल राज्य कमेटी ने सी.पी.एम. द्वारा विरोध को हिंसक दमन से कुचलने की निंदा की।
6 फरवरी, ‘08 का `बंगाल बंद‘ पूर्णत: सफल रहा। बाजार, यातायात सभी कुछ बंद रहे तथा सरकारी कार्यालयों में भी उपस्थिति नगण्य रही।
फारवर्ड ब्लॉक सी.पी.एम. के बाद `वाम‘ मोर्चे का सबसे बड़ा घटक है। 31 वर्षों के `वाम‘ मोर्चे के शासन में यह पहला अवसर था जब शासक मोर्चे के घटक ने अपनी ही राज्य सरकार के खिलाफ बंद का आवाह्न किया। यह भी पहला अवसर था जबकि शासक `वाम‘ मोर्चे के घटक दल के प्रदर्शन पर पुलिस ने गोलियां चलाकर प्रदर्शनकारियों की हत्या की। यद्यपि सी.पी.एम. अपने कार्यकर्ताओं के माध्यम से `वाम‘ मोर्चे की सहयोगी पार्टियों के कार्यकर्ताओं की हत्याएं प. बंगाल के ग्रामीण अंचलों में लम्बे समय से कराती रही है।
पिछले विधानसभा चुनावों के बाद बुद्धदेव भट्टाचार्य सरकार तथा सी.पी.एम. द्वारा साम्राज्यवाद–परस्त नई आर्थिक नीतियों के क्रियान्वयन में लाई गई तेजी ने प. बंगाल में सी.पी.एम. की भ्रष्ट निरंकुश शासन के खिलाफ जनता को संघर्ष में उतार दिया है तथा प. बंगाल में दशकों से जन संघर्षों में व्याप्त ठहराव को तोड़ दिया है। सिंगुर में टाटा व नंदीग्राम में सलीम ग्रुप के विशेष आर्थिक क्षेत्रा के लिए भूमि अधिग्रहण के खिलाफ किसान संघर्ष तेज हुआ तथा सी.पी.एम. की गुण्डावाहिनी व पुलिस का मुकाबला करते हुए आगे बढ़ा। प्रांत में राशन व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता के गुस्से का लावा उबल पड़ा। सिंगुर–नंदीग्राम के बाद सी.पी.एम. का शिकंजा कमजोर हुआ तथा अन्य सवालों पर भी जनता का आक्रोश सामने आया। इन घटनाओं की पृष्ठभूमि में `वाम‘ मोर्चे में भी दरारें पड़ने लगीं। आर.एस.पी. तथा फारवर्ड ब्लॉक ने किसानों पर सी.पी.एम. के हिंसक हमलों का विरोध किया। फारवर्ड ब्लॉक ने प. बंगाल में आगामी पंचायत चुनाव अलग से लड़ने की घोषणा की है।
सी.पी.एम. नेतृत्वाधीन सरकार की जन–विरोधी नीतियां, संघर्षरत किसानों के हिंसक दमन तथा जनता के बढ़ते संघर्षों की पृष्ठभूमि में `वाम‘ मोर्चे के घटकों का विरोध मौजूदा व्यवस्था में सत्ता में भागीदारी की उनकी नीति के कारण सीमित है। सीपीएम. द्वारा सभी विरोध को कुचलने के लिए पाशविक दमन के बावजूद `वाम‘ मोर्चे के घटक फारवर्ड ब्लॉक व आर.एस.पी. सत्ता में रहने का मोह छोड़ने को तैयार नहीं हैं। 17 फरवरी, ‘08 को नागपुर में सम्पन्न हुई फारवर्ड ब्लॉक की राष्ट्रीय परिषद की बैठक में शासक `वाम‘ मोर्चे में बने रहने का फैसला लिया गया। परन्तु बंगाल में सी.पी.एम. के कुशासन तथा दमन के खिलाफ जनता के बढ़ते संघर्ष इन पार्टियों के सामने जन संघर्षों के पक्ष में खड़ा होने तथा `वाम‘ मोर्चे में रहकर सत्ता का सुख भोगने के विरोध को तेज कर रहे हैं। ये पार्टियां अपने अंतर्विरोधो को जैसे भी हल करें, जन संघर्षों का उभार `वाम‘ मोर्चे की नीतियों को चुनौती दे रहा है तथा अधिकाधिक जनता को संघर्ष में उतार रहा है।
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