March 8, 2008...11:17 pm
8 मार्च - महिला आंदोलन के सामने उपस्थित चुनौतियां
8 मार्च, 2008 अंतर्राष्ट्रीय कामगार महिला दिवस के आसपास कई तरह की खबरें आईं जो भारत में महिलाओं की स्थिति के बारे में बहुत से सरकारी प्रचार का पर्दाफाश करती है । कुछ ऐसे तथ्य तो खुद सरकार के अपने सैम्पल सर्वेक्षण से ही आये जिसने दिखाया कि पुरुषों के मुकाबले कम महिलाओं के पास रोजगार है (महिला 31 प्रतिशत ग्रामीण व 15 प्रतिशत शहरी, पुरुष क्रमश: 56 प्रतिशतए 57 प्रतिशत), समान काम के लिए महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले स्थायी कार्यों में लगभग 50 रुपये कम व अस्थायी कार्यों में लगभग 20 रुपये कम वेतन मिलता है। साथ ही, ऐसे भी आंकड़े आये है जो बताते हैं कि भारत में महिलाओं में कुपोषण का स्तर अफ़्रीका के कई गरीब देशों के स्तर से भी दोगुना है तथा लगभग आधी महिलाओं को खून की कमी की बीमारी है। ये दोनों आंकड़े इस तथ्य के बढि़या संकेत हैं कि भारत के तथाकथित `विकास‘ और वैश्वीकरण के चमकते नतीजा की असलियत क्या है।
8 मार्च, 2008 के इर्द–गिर्द `इन्वेस्ट इंडिया इनकम व सेविंग‘ नामक निजी संस्थान ने 2007 में हुए सर्वेक्षण के नतीजे घोषित किये। इसके अनुसार, 18–59 वर्ष के बीच की उम्र की महिलाओं में 13 प्रतिशत महिलायें वेतन पर काम करती हैं। इनमें से 80 प्रतिशत ग्रामीण महिलायें हैं। 10 में से 9 कामकाजी महिलायें असंगठित क्षेत्रो में कार्यरत हैं तथा 35 प्रतिशत से अधिक खेती से जुड़े काम करती हैं। उत्तर भारत के प्रांतों में कामकाजी महिलाओं का अनुपात कम है (पंजाब 4.7 प्रतिशत, हरियाणा 3.6 प्रतिशत, दिल्ली 4.3 प्रतिशत, उत्तर प्रदेश 5.4 प्रतिशत); इनकी संख्या बिहार में 16.3 प्रतिशत (वेतन के लिए कार्यरत महिलायें) है, उड़ीसा में 26 प्रतिशत, तमिलनाडु में 39 प्रतिशत व आंध्र में 30.5 प्रतिशत है। जो महिलायें कार्यरत हैं (यानी 18–59 वर्ष) उनमें से मात्रा 26 प्रतिशत ने कहा कि वे अपने वेतन का इस्तेमाल तय कर सकती हैं।
इस सारी स्थिति के संदर्भ में भारत में अंतर्राष्ट्रीय कामगार महिला दिवस 2008 पर हुई घोषणाओं व कार्रवाईयों को देखा जा सकता है। शासक वर्गों द्वारा लागू साम्राज्यवाद–परस्त नई आर्थिक नीतियों के वर्षों के दौरान इस दिवस का हाल प्रतिक्रियावादी सरकारों व सुधारवादी ताकतों ने ऐसा कर दिया है कि उसके संघर्ष के संदेश व वर्गीय छाप को बचाये रखना भी एक बड़ा सवाल बन गया है। उदारहण के तौर पर, जबसे प्रगतिशील गठबंधन सरकार केन्द्र में राज कर रही है, कांग्रेस व सी.पी.एम.–सी.पी.आई. से जुड़े महिला संगठन एक बार तो संसद में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण के सवाल पर फूल चढ़ा ही देते हैं। समस्या यह है कि प्रगतिशीलता का दावा करने वाले महिला संगठन भी इसी सवाल को प्रमुख या एकमात्र सवाल बना देने तक सीमित हो जाते हैं। इतने सांकेतिक कदम को उठाने में शासक वर्गों की असमर्थता का पर्दाफाश करने के लिए यह सवाल भी इस्तेमाल होना चाहिए, परन्तु कुल मिलाकर शासकों द्वारा महिलाओं व आम जनता पर बढ़ते हमले व सुधारवादियों की भूमिका और महिला–मुक्ति के मूल सवाल क्या 8 मार्च के संदर्भ में छोडे़ जा सकते हैं अथवा क्या महज कागजी मांगों तक सीमित किये जा सकते हैं ? 33 प्रतिशत आरक्षण का नतीजा भी तो यही होगा कि मौजूदा असमान समाज के राजतंत्रा में चंद महिलाओं को भी हिस्सेदारी मिल जायेगी। महिला मायावती का उत्तराखण्ड के लिए संघर्षरत महिलाओं के सामूहिक बलात्कार पर रवैया, सुषमा स्वराज का गुजरात में मुस्लिम महिलाओं के साथ व्यापक व क्रूर हिंसा व लैंगिक हिंसा के प्रति रवैया (हालांकि वे नंदीग्राम में आंसू बहाने चली गयीं) तथा वृंदा कारत व सी.पी.एम. की अन्य महिला नेत्रियों का नंदीग्राम में लैंगिक हिंसा के प्रति रवैया इस सच्चाई की पुष्टि हैं।
कुछ वर्षों से बड़ी कम्पनियों व विदेशी कम्पनियों विशेषकर श्रृंगार व घरेलू इस्तेमाल के सामान बेचने वाली ने 8 मार्च के अवसर को अपने सामानों को बेचने के लिए इस्तेमाल करना शुरू किया है तथा इस दिन को `त्योहार‘ के तौर पर प्रचारित करना शुरू किया है। पहले से ही कई एन.जी.ओ. महिला संगठन भी इस दिन को इस तरह प्रचारित करती थीं। अब इस रूप में इसके इस्तेमाल की झलकें कई सुधारवादी महिला संगठनों द्वारा भी दिखती हैं। भारत के महिला आन्दोलन जो अपने–आप में बहुत सीमित है व जो अधिकांश कामगार महिलाओं तक अपने संदेश को ले ही जा नहीं पाये हैं के लिए ऐसे लक्षण चिंता के विषय हैं और इसे बहस का सवाल बनाया जाना चाहिए।
इस वर्ष भी 8 मार्च के एक सप्ताह पहले से प्रधानमंत्री, महिला सांसद (विशेषकर संशोधनवादी पार्टियों से जुड़ी हुईं) तथा दो महिला मुख्यमंत्रियों शीला दीक्षित व मायावती ने महिलाओं के लिए विभि योजनाओं या 33 प्रतिशत आरक्षण पर आम चर्चा शुरू कर दी थीं। 8 मार्च को प्रधानमंत्री से महिला सांसदों (जिनमें सी.पी.एम. से जुड़ी एडवा की प्रतिनिधि भी शामिल थीं) व संगठनों का दल मिला व उन्हें एक मांगपत्रा दिया। चुंकि आम घोषणा हो चुकी है कि 33 प्रतिशत आरक्षण का बिल बजट सत्र में नहीं आ रहा है (जिसका सी.पी.एम. की एडवा व सी.पी.आई. की एन.एफ.आई.डब्ल्यू. या इन पार्टियों के सांसदों ने कोई विरोध नहीं किया), तो प्रधानमंत्री महोदय ने फरमाया कि इस पर 20 मार्च को चर्चा कर इसे संसद के अगले सत्रा में जरूर लायेंगे। उनका कहना था कि राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के साथ यह कदम उनकी सरकार के महिलापक्षीय चरित्रा की गवाह है। याद रखा जाये कि इस स्वास्थ्य मिशन का असली मकसद ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं का निजीकरण है ! क्या ये सेवाएं आम महिलाओं की पहुंच से और बाहर नहीं हो जायेंगी ? क्या यह मिशन दोहरी स्वास्थ्य नीति को और गहरा नहीं करेगा, जहां यह बात नीतिगत रूप में स्वीकार्य होगी कि ग्रामीण गरीबों को डाक्टर नहीं, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र नहीं, बल्कि `मान्यताप्राप्त सामाजिक कार्यकर्ता‘ देखेगा ? यह है भारत की महिलाओं के लिए मनमोहन सिंह का तोहफा !
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी 33 प्रतिशत आरक्षण के चक्कर में नहीं फंसीं। वह महिलाओं को यह बताने में व्यस्त थीं कि 60,000 करोड़ रुपये की कर्जमाफी से कृषक महिलाओं को कितना फायदा होगा। कितना होगा, पूछा जाये विदर्भ की विधवाओं से जो आदमियों की आत्महत्याओं के बाद कर्ज व परिवार दोनों का बोझ ढ़ो रही है और जिन्हें कोई राहत नहीं मिलेगी। पूछा जाये कृषि कार्य से जुड़ी महिलाओं से जिन्ह काम के बदले समान वेतन भी नहीं मिलता।
लोकसभा अयक्ष साहब का `सपना‘ है कि वे उस अधिवेशन की अयक्षता करें जिसमें महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का बिल पास हो। अपने सपने को साकार करने के लिए वे अपनी पार्टी (सी.पी.एम.) को कहकर सरकार पर ठोस और प्रभावशाली दबाव बना भी सकते हैं, पर वे ऐसा करेंगे नहीं। यह तय है कि सभी शासक यह बात पहचान रहे हैं कि 33 प्रतिशत आरक्षण का सवाल यदि न हो तो शायद हर साल 8 मार्च को कहने को कुछ नहीं बचेगा।
केन्द्रीय महिला मंत्रालय ने 2004–’05 के लिए `स्त्रीशक्ति‘ पुरस्कार बांटे ऐसी शक्तिशाली महिलाओं को जिन्हें जनता तो नहीं, पर मंत्रालय जरूर पहचानता है। शीला दीक्षित ने दिल्ली के लिए `लाड़ली‘ योजना की घोषणा की जिसमें सरकार कुछ बच्चियों (बी.पी.एल. परिवारों से) के लिए 16 वर्षों में लगभग 30,000 रुपये जमा करायेगी ताकि 16 वर्षों के बाद बैंक उन्हें 1 लाख रुपये दे सके। सपना तो सुंदर है यह अलग बात है कि न सरकार रहेगी, न जमा राशि पर ब्याज की दर। मायावती ने उत्तर प्रदेश की महिलाओं के लिए चार–पांच घोषणाएं कीं, परंतु वह दलित महिलाओं के ज्वलंत सवाल भूमि पट्टों के वितरण, जिसके बिना मंडल ने कहा था कि दलित शोषण हलविहीन है, के आसपास भी नहीं मंडरायीं।
राजाधानी दिल्ली में 8 मार्च की सुबह इंडिया गेट पर अमर जवान ज्योति (भारत–पाक युद्ध के पश्चात स्थापित) पर अन्य संगठनों के साथ एडवा भी विश्व शांति के लिए व सामाजिक असमानता के खिलाफ प्रार्थना करने के कार्यक्रम (हिन्दू, 9 मार्च, 200
में शामिल हुई ! शायद यह वैश्वीकरण का नया सबक है कि विश्व शांति के लिए साम्राज्यवाद का सक्रिय विरोध नहीं, दुनिया में समाजवाद की स्थापना नहीं, राष्ट्रीय स्तर पर इंकलाब नहीं, बल्कि प्रार्थना से काम चलाया जायेगा ! बुद्धदेव ने सच कहा था केवल वे ही नहीं, पूरी पार्टी `कट्टरपंथ‘ का छोड़ने के नाम पर भौतिकवाद को भी त्याग बैठी है; इंकलाबी चरित्रा तो दूर की बात है।
मार्च 2008 : महिलाओ की स्थिति
बीता वर्ष ऐसा रहा जिसमें आम जनवादी संघर्षों में भाग ले रहीं आन्दोलनकारी महिलाओं को वीभत्स हिंसा (जिसमें लैंगिक हिंसा शामिल रही) का शिकार बनाया गया तथा इस क्रम में सरकारी बलों के साथ–साथ गुंडा ताकतों का भी इस्तेमाल किया गया। रास्ता दिखाया एडवा की पार्टी सी.पी.एम. ने, जिसके राज में `काडर‘ नामक गुडों ने 14 मार्च, 2007 और फिर वर्ष के अंत में नंदीग्राम में जबरन भूमि अधिग्रहण के विरुद्ध लड़ती महिलाओं (जिनमें बहुत–सी मुस्लिम भी थीं और बहुत–सी नाबालिग भी) को सामूहिक बलात्कार का शिकार बनाया, उनकी हत्या के अतिरिक्त। इन लड़ती महिलाओं में से कईयों ने पुलिस में रिपोर्ट भी लिखवायी और मेडिकल जांच भी करवायी। सारे सबूत होने के बावजूद सी.पी.एम. पोलित ब्यूरो सदस्या वृंदा कारत ने कहा कि ऐसे एक–दो केस होंगे, उन्हें देखा जायेगा। एडवा ने नंदीग्राम हिंसा के दौर में वार्षिक अधिवेशन कर `महिलाओं पर हिंसा‘ के सवाल पर `मांग‘ तैयार की, पर 8 मार्च के दिन भी संसद मार्ग पर उसकी रैली नंदीग्राम की महिलाओं को याद करने से भाग गयी। नंदीग्राम में जबरन भूमि अधिग्रहण के विरुद्ध जनांदोलन में पार्टी गुंडों द्वारा नियोजित लैंगिक हिंसा की पहल हुई। इस वर्ष नंदीग्राम की महिलाओं के लिए न्याय मांगना पूरे भारत के महिला आन्दोलन का कर्तव्य है। नंदीग्राम में महिलाओं के खिलाफ हिंसा के बावजूद सी.पी.आई. की महिला संगठन ने 8 मार्च को सी.पी.एम. की एडवा के साथ मिलकर कार्यक्रम किया।
लगभग कुछ इसी प्रकार की हिंसा गुवाहाटी (असम) में कांग्रेसी गुंडों ने चाय आदिवासी मुंडा महिलाओं के साथ की। इस घटना में एक 14 वर्षीय बच्ची को निर्वस्त्रा करके शिकार की तरह सड़क पर दौराया गया। पर, गरीब द्रौपदियों के लिए कोई कृष्ण नहीं आते। असम के मुख्यमंत्री ने बच्ची के बदन के शोषण की कीमत लगायी 1 लाख रुपये तथा 10वीं कक्षा तक नि:शुल्क शिक्षा !
सरकारी हिंसा का प्रकोप इरास्मा (उड़ीसा) में बहुराष्ट्रीय कम्पनी पोस्को के खिलाफ लड़ती महिलाओं ने भी देखा, जब पुलिस व गुंडों ने पोस्को के इशारे पर उनके अधिग्रहण–विरोधी संघर्ष को बर्बरता से कुचलने की चेष्टा की। कलिंगनगर की महिलायें स्वयं व मां, पत्नी, बहन के रूप में टाटा के गुंडे व पुलिस की मिलीजुली हिंसा का निशाना हैं। निस्संदेह, पिछले वर्ष महिलाओं पर भूमि अधिग्रहण के द्वारा होती हिंसा एक बहुत अहम सवाल के रूप में बरकरार रहा है। इससे उनका सामाजिक ढांचा व सुरक्षा का जाल टूट जाता है, सांस्कृतिक तौर–तरीके भी छिन जाते हैं और शोषण का हथियार भी बनते हैं, उन्हें भयंकर गरीबी में धकेला जाता है। अब किसान महिलायें ऐसे `विकास‘ <