March 15, 2008...9:22 am
लखनऊ - किसानों और मजदूरों की मांगों पर पार्टी का जोरदार प्रदर्शन
12 मार्च को विधान सभा, लखनऊ के सामने पार्टी ने एक बड़ा धरना देकर राज्य सरकार को किसानों और मजदूरों की विभि समस्याओं पर चेतावनी दी। इसमें भाग लेने के लिए हजारों की संख्या में हाथों में लाल झण्डियां व नारे लिखी हुई तख्तियां लिए किसान व मजदूर, महिलाएं व पुरुष रेलवे स्टेशन पर एकत्रा हुए और विधान सभा तक मार्च किया। रोटी और रोजी की सुरक्षा, खेतों व गांवों से न उजाड़े जाने की गुहार और बड़े सामंतों, गुण्डों, माफिया व पूंजीपतियों के शोषण से रक्षा की मांग लिए ये हजारों मेहनतकश करीब 7 जिलों से एकत्रा हुए थे।
पूरी सभा में लगातार इनके मुख से निकलने वाले नारे गूंजते रहे जो सरकार की वर्तमान नीतियों और विदेशी लुटेरों तथा स्थानीय दलालों के भ्रष्ट राज में इनके दु:ख–दर्द की व्यथा का बयान कर रहे थे `घोषित 100 रुपये खेत मजदूरी लागू करो‘, `जमीन के पट्टों पर कब्जा दो‘, जमींदारों के कब्जे से गांव समाज, बचत–बंजर व सीलिंग की जमीन मुक्त करो‘, `बालू खनन में माफिया राज पर रोक लगाओ‘, `खनन काम, तालाबों की खुदाई में मशीनों व जे0सी0बी0 के प्रयोग पर रोक लगाओ‘, `साल भर रोजगार की गारंटी करो‘, `उद्योगों में ठेकेदारी प्रथा पर रोक लगाओ‘, `न्यूनतम मजदूरी लागू करो‘, `श्रम विभाग की जिम्मेदारी तय करो‘, `खाद–बीज–डीजल के बढ़ते दाम पर रोक लगाओ‘, `कोल आदिवासियों को आदिवासी दर्जा दो‘, `वैट कानून, अप्रत्यक्ष कर रद्द करो‘, `माफिया समर्थन बन्द करो‘, `यू0पी0 कोका रद्द करो‘ आदि। मुट्ठी बांध कर उठ रहे हाथ मानों एक अगले व बड़े संघर्ष का संकल्प लिए राजाधानी में आए हों।
धरने को संबोधित करते हुए भाकपा (माले)–न्यू डेमोक्रेसी की दिल्ली कमेटी सचिव का0 अपर्णा ने कहा कि सत्ता में आई बसपा जैसी पार्टियां गरीब लोगों को आपस में बांटने के काम को जारी रखे हुए है, जाति उत्पीड़न दूर नहीं कर रहीं। केन्द्र सरकार द्वारा गठित मण्डल कमीशन ने कहा था कि जातीय भेदभाव का सबसे बड़ा आधार गांवों में जमीन की मिल्कियत में असमानता है और इसे दूर किये बिना जातीय भेदभाव दूर नहीं किया जा सकता। बसपा समेत सभी सरकारों ने जमींदारों का राज चलाया है, गरीब और भूमिहीन किसानों को जमीन बांटने की समस्या को अनदेखा किया है और हम यहां यह कहने आए है कि यदि सरकार ने गरीबों को जमीनें नहीं दी तो जमीन के लिए लड़ाई तेजी से आगे बढ़ेगी।
उन्होंने बताया कि मायावती सरकार राशन व्यवस्था में कोई सुधार नहीं कर रही है। गरीबी रेखा कार्ड के सीमित व बेहद भ्रष्ट वितरण से उत्तर प्रदेश के गरीब, जिनमें दलितों की बड़ी संख्या है, पीडि़त है, आत्महत्या कर रहे हैं और भूखमरी से पूरे के पूरे परिवार मर रहे हैं। सिर्फ बुन्देलखण्ड ही नहीं, ऐसी खबरें पूरे उत्तर प्रदेश से आ रही है और शासक वर्ग अपनी जिस आजादी का जश्न मनाने में लीन है उस आजादी का फल आम लोगों को भुखमरी के रूप में मिला है। बेरोजगारी और खेती से पलायन आम नियम बन गए हैं। मायावती शासन में भी गांवों में बड़े जमींदारों और माफिया तंत्रा का राज चल रहा है और जीने के मौजूदा साधन भी छीने जा रहे हैं, जैसा कि जमुना नदी के बालू निकासी के काम में माफिया ने मशीन लगाकर किया। उन्होंने संघर्ष के दम पर माफिया की मशीनों को उखाड़ने के लिए बालू श्रमिकों को बाधाई दी। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि पार्टी के नेतृत्व में मजदूर और किसान अपने विस्थापन के विरुद्ध तो लड़ेंगे ही, साथ में न्यूनतम मजदूरी को लागू कराने के लिए भी, जिसमें महिलाओं और पुरुष की मजदूरी में कोई फर्क नहीं होगा और दोनों के लिए बराबर मजदूरी की लड़ाई भी आगे बढ़ेगी। अंत में उन्होंने भगत सिंह के उस चिंतन को दोहराते हुए, कि अगर गोरे साहब चले गए और कालों का राज आ गया तो आम लोगों के लिए कुछ नहीं बदलेगा, चेतावनी दी कि शासक वर्ग मेहनतकशों के हालात बिगाड़ कर उन्हें चुनौती दे रहे है और मजदूर और किसान इसे स्वीकार कर इस लूट के राज को उखाड़ कर ही सांस लेंगे।
उत्तर प्रदेश पार्टी सचिव का0 आशीष ने सरकार से मांग की कि वह सीलिंग में निकली जमीनों को जमींदारों के कब्जे से तुरन्त मुक्त कराए, जंगल विभाग द्वारा गरीबों की बेदखली पर रोक लगाए वरना दलितों व अन्य गरीबों के संघर्ष का सैलाब उठ खड़ा होगा। उन्होंने निजी सूदखोरों पर हमला करते हुए मांग की कि बैंक दर पर हिसाब कराकर निजी कर्जों को माफ कराया जाए। उन्होंने कहा कि मायावती दलितों की नहीं; विश्व बैंक, विदेशी कम्पनियों, दलाल पूंजीपतियों और जमींदारो की चहेती हैं। बसपा सरकार केवल किसानों को उजाड़ कर हरे–भरे खेतों में गंगा एक्सप्रेस–वे और उद्योगों के सीमेन्ट के जंगल खड़े कर रही है। इससे बेरोजगारी बढ़ेगी, खाद्य संकट बढ़ेगा, अनाज महंगा होगा, भूखमरी बढ़ेगी और बेबस मजदूरों के सस्ते श्रम से लुटेरों की तिजोरियां भरेंगी। उन्होंने नहरों के रखरखाव और तालाबों की खुदाई के न होने को खेती के संकट का बड़ा कारण बताया और कहा कि बुन्देलखण्ड में हो रही आत्महत्याओं और बड़े पैमाने पर इलाके से पलायन भी तभी थमेगा जब प्राकृतिक जलस्रोतों का रखरखाव ठीक किया जाएगा। उन्होंने बुन्देलखण्ड में एक साल के लिए मुफ्त अनाज देने की मांग उठाई।
नदी व पहाड़ में खनन के काम में बसपा राज में भी माफिया वर्चस्व पर हमला करते हुए उन्होंने मांग रखी कि इन छोटे खनिजों के खनन में, जो स्थानीय रोजगार के लिए आरक्षित ह, मशीनों के प्रयोग पर पूर्ण रोक लगाई जाए और माफिया वर्चस्व पर प्रतिबंध लगाया जाए। उन्होंने समझाया कि यह तभी सम्भव है जब मजदूरों को खनन की खुली छूट दी जाए और सरकारी रायल्टी की वसूली बैरियर पर की जाए।
कोल जनजातियों को जनजाति का दर्जा देने की मांग रखते हुए उन्होंने कहा कि शासक दलों ने इसे वोट बक की राजनीति के रूप में इस्तेमाल किया है और जहां कोल लोग बगल के मयप्रदेश में जनजाति के रूप में पहचाने जाते ह, उत्तर प्रदेश सरकार ने इन्हें अनुसूचित जाति की श्रेणी में रखकर लम्बे समय से इनके साथ अन्याय किया हुआ है। ये प्रान्त के दक्षिणी–पूर्वी जिलों में विकास की सबसे निचली श्रेणी में ह और विशेष शिक्षा व स्वास्थ्य प्राविधान, मकानों के लिए विशेष सुविधाओं आदि, आदिवासी विकास की विशेष सरकारी योजनाओं से भी वंचित है।
लखनऊ के जाने–माने बुद्धिजीवी व क्रांतिकारी आंदोलन के समर्थक उच्च न्यायालय के अधिवक्ता का0 सी0बी0 सिंह ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि इतनी बड़ी संख्या में लखनऊ में अपनी आवाज उठाने के लिए बहुत साल बाद मजदूर व किसान एक क्रांतिकारी झण्डे के नीचे एकत्रा हुए है और सभी प्रदर्शनकारी साथी इसके लिए बाधाई के पात्र है । उन्होंने नदी, पहाड़ व जमीन के कब्जे की मांग को संघर्ष की सही दिशा बताते हुए विश्वास व्यक्त किया कि कब्जे की जो लड़ाई गांव–गांव में शुरू हो रही है वह एक दिन लखनऊ की सत्ता पर भी कब्जा करेगी।
आई0एफ0टी0यू0 राष्ट्रीय कमेटी सदस्य का0 रामनरेश त्यागी ने उद्योगों में ठेकेदारी प्रथा समाप्त करने, न्यूनतम मजदूरी व श्रम कानून लागू करने और इन सब के लिए सरकारी मशीनरी की जिम्मेदारी तय करने की मांग उठाई।
अखिल भारतीय किसान मजदूर सभा के उत्तर प्रदेश अयक्ष का0 धरमपाल सिंह ने सभा का संचालन करते हुए सरकार को गन्ने का पेमेन्ट न करने के लिए आड़े हाथों लिया और ग्रामीण इलाकों के बन्द उद्योगों, फर्जी सोसाईटियों व खाली पड़ी अधिग्रहीत जमीनों को मजदूरों में वितरित करने की मांग उठाई ताकि लोग अपनी जीविका चला सकें। अप्रत्यक्ष करों पर हमला करते हुए उन्होंने इन्हें महंगाई का, विशेषकर डीजल के दामों में वृद्धि का, बड़ा कारण बताया और मांग की कि सभी अप्रत्यक्ष कर रद्द किये जाएं। साथ में छोटे दुकानदारों को बर्बाद करने वाले वैट कानून को रद्द करने की भी मांग उठाई।
सभा में उन्नाव के का0 संतराम, मदन पाल सिंह, बिजनौर के का0 सुभाष, मुरादाबाद के का0 कल्लन शाह, इलाहाबाद के का0 वी0पी0 पटेल, का0 राजकुमार, का0 धानपत्ति देवी, का0 रामकैलाश, का0 साहिबलाल निषाद, का0 फूलचन्द आदि ने भी अपने विचार व्यक्त किये। इसमें गिट्टी व बालू के न्यूनतम रेट तय करने, वन विभाग द्वारा मजदूर बस्तियों के न उजाड़े जाने और सभी पात्र लोगों को गरीबी रेखा कार्ड व सस्ता राशन देने की मांगें उठाई गईं और सरकारी महकमे के भ्रष्टाचार की तीखी आलोचना की गई।
अंत में का0 हीरालाल व का0 वी0पी0 ने मांगपत्रा पढ़ कर सुनाये जो बाद में प्रशासन को सौंपे गए। सभी वक्ताओं ने उपरोक्त सवालों पर बड़े जनांदोलन विकसित करने का आवाह्न किया और समस्याएं हल न होने पर सरकारी उदासीनता के विरुद्ध संघर्ष बढ़ाकर सरकारी काम जाम करने की चेतावानी दी। सभा की अयक्षता का0 रघुवंश त्यागी ने की और का0 रामकुमार, कुमकुम, शोबरन, मुन्ना `राही‘ व घनश्याम ने क्रांतिकारी गीत सुनाए।
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