March 22, 2008...10:57 am

केन्द्रीय बजट 2008–’09 – जनता के लिए घडि़याली आंसू तथा धनी वर्गों को रियायतें

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जहां पहले बजट से तात्पर्य सरकार के एक वर्ष के आयव्यय का विवरण नये करों और नये खर्चों का विवरण प्रस्तुत करना होता था जिनसे सरकार द्वारा अपनायी जा रही दिशा का पता चलता था, वहीं बजट 2008 तथा पिछले कई वर्षों के बजट महज खोखली घोषणाओं के पर्याय बन गये हैं। गणित से इनका रिश्ता कमजोर है; सामानों की कीमतों तथा महंगाई के सवाल के साथसाथ करों का सवाल बजट से हटा ही दिया गया है।

वित्तमंत्री श्री चिंदम्बरम द्वारा संसद में पेश संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन का पांचवां बजट विदेशी तथा देसी बड़े पूंजीपतियों तथा बड़े भूस्वामियों का हितपोषक है, परन्तु अखबार वालों ने इसके केवल एक सतही पक्ष को उछाल कर, इसे इस रूप में प्रचारित किया है जैसे कि यह आम आदमी के हित का बजट हो। इस तरह का प्रचार केवल बजट के असली मकसद पर पर्दा डालने के काम आता है तथा यह जनता के लिए केवल नारे उछालने पैसे वालों के हितपोषण का काम करता है।

वित्तमंत्री का बजट भाषण

वित्तमंत्री ने अपना बजट भाषण यह कह कर शुरू किया कि भारत के विकास की कहानी प्रेरणाजनक रोचक है। उन्होंने बताया कि पिछले 3 वर्षों में विकास दर 8 प्रतिशत से धिक रहा है तथा सेवा क्षेत्र औद्योगिक निर्माण क्षेत्र विकास के दो स्तंभ रहे हैं। उनके अनुसार औद्योगिक निर्माण की रफ्तार 9.4 प्रतिशत की दर से बढ़ेगी। औद्योगिक निर्माण के सवाल पर उन्होंने कहा कि पूंजीगत सामानों का विकास दर नहीं गिरा। यह स्वीकार करते हुए कि औद्योगिक उत्पादन की दर में अप्रैल से दिसम्बर 2007 के बीच कुछ कमी आई है, वित्तमंत्री ने कहा कि पूंजीगत सामानों में विकास दर 20.2 प्रतिशत पर बहुत ऊंचा है; जिसका मतलब है कि उद्योग अभी भी बड़ी पूंजी निवेश कर रहा है भविष्य के बारे में नजरिया सकारात्मक है। 13 दिन बाद, 13 मार्च, 2008 को प्रकाशित औद्योगिक वृद्धि के आंकड़ों के अनुसार औद्योगिक विकास दर जनवरी ‘08 में 5.3 प्रतिशत थी, जबकि पिछले वर्ष यह 11.6 प्रतिशत थी। पूंजीगत सामानों में विकास का आंकड़ा 16.3 प्रतिशत पिछली जनवरी से गिरकर 2.1 प्रतिशत ही रह गया है। (इकानोमिक टाईम्स, 13 मार्च, 2008) इसी तरह पूरा बजट आंकड़ों तथ्यों की हेराफेरी पर आधारित है।

ही वित्तमंत्री ने इस तरफ ध्यान दिलाया कि पिछले तीन वर्षों में किसानों द्वारा आत्महत्याओं की घटनायें बढ़ती गई हैं, 47 प्रतिशत भारतीय महिलायें खून की कमी के रोग से पीडि़त पाई गई हैं तथा भारत में कुपोषण की दर अफ़्रीका के कई देशों के दोगुनी है। तो यह है भारत के विकास की प्रेरणाजनक कहानी!

विकास दर पर प्रसन्नता प्रकट करने के बाद वित्तमंत्री ने यह भी फरमाया कि हालांकि भारत की आर्थिक स्थिति बहुत बढि़या है, परन्तु दुनिया भर में चल रही आर्थिक मंदी का असर हमारे जैसे विकासशील देश पर क्या होगा यह देखना पड़ेगा। यह भूला जाये कि पिछले 18 वर्षों से भारत के शासक वर्गों का नारा है `वैश्वीकरण‘, जबकि जरुरत यह रही है कि भारत की अर्थव्यवस्था को जनता की जरूरतों के अनुकूल आत्मनिर्भर तरीके से विकसित किया जाये। परन्तु अपनी `विश्व अर्थव्यवस्था से जोड़ोकी नीतियों के परिणामस्वरूप मंडराती आर्थिक समस्याओं का बोझ वे फिर जनता के सिर मढ़ेंगे और नीतियां वही रखेंगे।

गेहूं की बढ़ती कीमत, गिरती पैदावार विशेष आर्थिक क्षेत्र

वित्तमंत्री ने आगे बताया कि कृषि का विकास दर 2.6 प्रतिशत रहा है। उन्होंने खाद्य फसलों में कपास को तो शामिल किया है पर गेहूं को चुपके से छोड़ दिया है शायद जनता को कपास खिलाने का इरादा है ! क्योंकि बाजार के अभाव में भी कपास किसान आत्महत्यायें कर रहे हैं। साथ ही उन्होंने बताया कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में खाद्य फसलों की कीमत तेजी से बढ़ी है चावल की कीमत 15 प्रतिशत बढ़ी है तथा गेहूं की कीमत 88 प्रतिशत। वित्तमंत्री का कहना था कि इन्हीं कारणों ( शासक वर्गों द्वारा लाये गये वैश्वीकरण के कारण जो उन्होंने नहीं कहा) से घरेलू कीमतों पर दबाव है, विशेषकर खाद्य सामानों की कीमतों पर। अत: उनके अनुसार खाद्य सामग्री की आपूर्ति को संभालना अहम सवाल है। जाहिर है श्री चिंदम्बरम तीव्र कीमत बढ़ओत्री की संभावना को तर्कसंगत ठहराने के लिए जमीन तैयार कर रहे हैं !

परन्तु, इस सवाल पर सरकार व्यवहार में क्या रही है ? वह विशेष आर्थिक क्षेत्रो (सेज) से जुड़ी नीतियों में कोई परिवर्तन नहीं कर रही है। गेहूं उत्पादन के मुख्य क्षेत्रो विशेषकर, पंजाब, पश्चिम उत्तर प्रदेश हरियाणा की जमीनें तो सरकारें बड़े पूंजीपति घरानों बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को सौंप रही हैं। यानी, सरकार खुद ही चाहती है कि हमारे देश में गेहूँ की कमी रहे तथा इसका आयात करना पड़े, ताकि आर्थिक मंदी से ग्रस्त अमेरिका अन्य विकसित देशों की पैदावार को बाजार मिल सके तथा इस खरीदफरोख्त में इनको कमीशन।

अनाज उत्पादन में लगी जमीन का क्षेत्रफल 1980 में 1042 लाख हेक्टेयर था, जो 1990 में 1032 लाख हेक्टेयर हुआ तथा 2005–’06 में केवल 995 लाख हेक्टेयर रह गया। इसी तरह अनाज उत्पादन का विकास दर ‘80 के दशक में 3 प्रतिशत से कुछ ज्यादा था, जो 1990 से नई आर्थिक नीतियों के अमल के दौरान, 90 के दशक में ही 1.9 प्रतिशत (जनसंख्या वृद्धि दर से भी कम) हो गया और 2001 के बाद अनाज उत्पादन में कोई वृद्धि नहीं हुई। 2001–’02 में कुल उत्पादन 2920 लाख टन था।

इसी तरह मंत्री महोदय ने बताया कि ताम्बे लोहे की कीमत भी विश्व बाजार में बढ़ रही है पर, इसके बावजूद सरकार इनके खदानों के निजीकरण में लगी है ताकि विदेशी कम्पनियां भारत की प्रचुर खनिज संपदा से मालामाल हो सकें।

सम्मिलित विकास

बजट में बारबार इस शब्द का इस्तेमाल हुआ है और इस तरह के विकास के ठोस कदमों के रूप में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी एक्ट (नरेगा) राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य योजना जैसी योजनाओं का उल्लेख है। ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून तो साल में केवल 100 दिन काम देने की बात करता है और न्यूनतम वेतन का आश्वासन भी नहीं देता। नरेगा योजना के लिए महज 16,000 करोड़ रुपये रखे गये हैं। कैग रिपोर्ट कई अन्य रिपोर्टें यह सिद्ध कर चुकी हैं कि रोजगार योजना व्यापक भ्रष्टाचार से ग्रस्त है जिसमें पंचायत नेता अपने आकाओं को हिस्सा देकर मालामाल हो गये हैं। मरे हुये लोगों के नाम काम कर रहे लोगों की सूची में हैं तथा काम करके वेतन पाने के कारण कई ग्रामीणों ने आत्महत्यायें भी की हैं। इससे कितने दिन की नौकरी मिलेगी और किसको कितना वेतन? स्वास्थ्य मिशन की पूरी योजना स्वास्थ्य सेवाओं के व्यापारीकरण की योजना है और बजट में भी उसका लक्ष्य समुदाय जिसका मालिक हो जो केन्द्रीकृत हो जैसी स्वास्थ्य सेवायें देना है जिसके लिए 4,62,000 सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता तैयार किये गये हैं। जिन अन्य योजनाओं का जिक्र है उनमें मिडडे मिल योजना शामिल है जो देश भर में व्यापक भ्रष्टाचार का स्रोत है तथा जिसमें पांचवीं कक्षा तक के ही बच्चों को एक समय के खाने के नाम पर बिस्किट चने बांटे जाते हैं।

किसानों के लिए कर्ज माफी : एक कड़वा मजाक

जिस कारण से अखबारों कांग्रेसी सांसदों द्वारा इसे `आम आदमीका बजट ठहराने का शोर हुआ वह कारण है कर्ज माफी की घोषणा। इस घोषणा के अनेक पहलू हैं जिन पर ध्यान दिया जाना चाहिए तथा जो स्पष्ट करता है कि भारत में कृषि के खिलाफ सरकारें कितने कदम उठा रही हैं।

दलाल सरकार शासकों की स्पष्ट समझ है कि गांववासियों को कृषि से हटकर दूसरे ग्रामीण कामों में लगना चाहिए जिससे कि उनकी जमीन ठेकाकृषि या कम्पनियों को देने के काम सके। यह समझ सरकारी घोषणाओं में दिखती रहती है।

वित्तमंत्री की बजट घोषणा के अनुसार 2 हेक्टेयर (यानी 5 एकड़) से कम जमीन वाले किसानों के कर्ज माफ कर दिये जायेंगे, अगर उन्होंने उसका कोई भाग भी लौटाया हो। कर्जों की राशि को उन्होंने 60,000 करोड़ रुपये बताया, पर इसके लिए उन्होनें बजट में कोई प्राविधान नहीं दिखाया कि आखिर ये पैसे कहां से दिये जायेंगे। प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया कि ये कर्जे तबतब माफ होंगे जब वे देय होंगे। ये कर्जे केवल वे कर्जे हैं जो किसानों ने बैंकों या सहकारी समितियों से लिए हैं।

इस प्राविधान को यहां तक देखा जाये तो समस्याएं ही समस्याएं हैं। 60,000 करोड़ रुपये का यह आंकड़ा कहां से आया ? बैंकों के रिकार्डों के अनुसार 1 हेक्टयेर (यानी 2.5 एकड़) से कम जमीन वाले किसानों (जो बड़ी किसान श्रेणी है) में से 7.2 मिलियन किसानों के पास बैंकों में खाता है, जिन पर 20,499 करोड़ रुपये के कर्जे हैं। इसी प्रकार 1–2 हेक्टेयर (2.5–5 एकड़, यानी मयम किसान) वाले किसानों में से 5.9 मिलियन किसानों के पास बैंकों में खाते हैं, जिन पर 20,578 करोड़ रुपये के कर्जे हैं। दोनों को मिलाकर 41,077 करोड़ रुपये का कर्ज है। (पी. साईनाथ, हिन्दू, 10.3.2008) फिर 60,000 करोड़ रुपये का सवाल कहां से आया ?

दरअसल, कर्ज माफी का सवाल पिछले एकदो वर्षों से विदर्भ में किसानों द्वारा आत्महत्याओं के संदर्भ में उठता रहा है। परन्तु, विदर्भ (महाराष्ट्र), अनंतपुर (आंध्र प्रदेश) आदि जगहों, जहां कर्जजाल में फंसकर बड़ी संख्या में किसानों ने आत्महत्यायें की हैं और कर रहे हैं, पर 50 प्रतिशत किसानों के पास 3 हेक्टयेर (7.5 एकड़) जमीन है जो कि सूखाग्रस्त क्षेत्रा होने सिंचाई व्यवस्था के अभाव के कारण कम उत्पादक है। इन किसानों को तो कर्जमाफी से कोई भी राहत नहीं मिलेगी। साथ ही, यह आम जानकारी का सवाल है कि सूखे इलाके सिंचाई वाले इलाकों को एक नजर से नहीं देखा जा सकता। परन्तु, कांग्रेस ने शायद जानबूझकर यह सवाल `राजकुमारराहुल गांधी द्वारा उठाने के लिए छोड़ दिया ताकि उन्हें किसानों का मसीहा बनने का कोई रास्ता मिले !

वित्तमंत्री ने तो बेवकूफी की सारी सीमाएं लांघते हुए कहा कि अगर 2 हेक्टेयर के ऊपर वाले किसान 75 प्रतिशत बैंक कर्ज वापस कर दें तो 25 प्रतिशत कर्ज माफ हो जायेगा। जो किसान 75 प्रतिशत कर्ज चुका देगा वह क्या 25 प्रतिशत और नहीं चुका देगा? इतना ही मूर्खतापूर्ण यह कहना भी है कि 2 हेक्टेयर से कम जमीन वाले किसानों ने अगर कुछ भी कर्ज चुका दिया है तो उसका कर्ज माफ नहीं होगा ! कुल मिलाकर, बात यहां यह है कि बैंकों के ये कर्जे धिकांश किसान चुका ही नहीं पाते और इस प्रकार ये कर्ज वैसे ही बैंकों के `खराब कर्जोंके खाते में धीरेधीरे चले जाते हैं।

इससे जुड़ा सवाल उठा कि आखिर ये 60,000 करोड़ रुपये आयेंगे कहां से बजट में तो कोई प्राविधान ही नहीं है, तो जवाब में वित्तमंत्री ने कहा कि 10 हजार करोड़ रुपये का प्रबंध तो वे इस वर्ष के करों से कर देंगे इसी स्रोत से 15 हजार करोड़ 30 जून तक करेंगे तथा बाकी अगले तीन वर्षों के बजट से आयेंगे जबकि उनकी सरकार का जीवन ही इस वर्ष खत्म होना है।

इस सबसे अलग मूल बात यहां यह है कि किसानों के कर्जों का बड़ा हिस्सा (विदर्भ में 3/4) साहुकारों का है जो बहुत ऊंची ब्याज दर लगाते हैं तथा अपनी सामाजिक ताकत के बलबूते वसूली के लिए किसानों को परेशान भी करते हैं। अंग्रेज सरकार भी कर्ज माफी करवाती थी, परन्तु उनमें साहुकारों की कर्जवसूली पर रोक शामिल थी। यहां तो इतना भी नहीं हो रहा है और वित्तमंत्री ने संसद में कहा कि जिस राज्य सरकार को इसकी फिक्र है वह सूदखोरी रोकने के कदम खुद ही उठा सकती है। हजारों आत्महत्यायें गवाह हैं कि कोई भी सरकार इस समस्या पर ध्यान नहीं दे रही है।

कर्ज माफी की घोषणा पर यदि अपनेआप में अमल भी हुआ तो यह महाराष्ट्र के गा किसानों अन्य इलाकों के छोटे मयम किसानों को कुछ राहत दे सकती है। किसानों पर बढ़ते बोझ के संदर्भ में इसे देखते हुए यह भी यान रखना चाहिए कि बजट में कृषि की सहायता के लिए किसी भी कोष की घोषणा नहीं हुई है। उल्टे, एक तरफ बताया गया है कि कृषि विकास दर 2007–’08 में 2.6 प्रतिशत हो गयी तथा दूसरी तरफ दावा किया गया है कि कृषि में पूंजीनिर्माण 10 प्रतिशत से बढ़कर ` कृषि में सकल घरेलू उत्पादका 12.5 प्रतिशत हो गया है। इसमें एक नया आंकड़ा इस्तेमाल हो गया कृषि में सकल घरेलू उत्पाद, जो खुद लगातार गिर रहा है। गिरते आंकड़े में 2 प्रतिशत वृद्धि दिखाना क्या जानबूझकर सत्य पर पर्दा डालना नहीं है?

60,000 करोड़ रुपये की कर्जमाफी के आंकड़े को सरकार ऐसे उछाल रही है जैसे कि इतना पैसा वह जनता पर बहा रही है। कुछ अन्य आंकड़े देखे जायें। 2001–’04 के बीच केन्द्र की एन.डी.. सरकार ने `छोटेपूंजीपति घरानों के 44,000 करोड़ रुपये के `खराब कर्जमाफ कर दिये।

सरकार द्वारा कर्ज माफी के आंकड़ों के सम्बंध में जरा इस पर भी गौर करें। मुकेश अंबानी की एक वर्ष की कमाई 22.9 बिलियन डालर (यानी 91,000 करोड़ रुपये) है तथा अनिल अंबानी की 23.8 बिलियन डालर (यानी 95,000 करोड़ रुपये) 60,000 करोड़ रुपये तो केवल 15 बिलियन डालर बनते हैं। पोस्को कम्पनी भारत की लौहइस्पात को बेचकर 98,000 करोड़ रुपये सालाना कमायेगी। टाटा घराने की केवल एक कम्पनी टाटा स्टील द्वारा केवल कोरस सौदे पर ही 8 अरब डालर लगाये गये, यानी लगभग 32,000 करोड़ रुपये। पर, इन सब का तो पैसों पर धिकार माना जाता है; और जब यह जनता के नाम लिखा जाता है (वह भी बिना उसका प्रबंध किये) तो चर्चा का विषय बनता है।

यहां यह उल्लेखनीय है कि सरकार का सारा जोर खेती की हालत सुधारने पर नही अबल्कि किसानों को कर्जदार बनाने पर है। कोई आश्चर्य नह होना चाहिए कि साम्राज्यवादपरस्त नीतियों के पैरोकार मनमोहन सिंह के `काबिलवित्त मंत्री चिदम्बरम अपनी सरकार की सम्मिलित विकास की नीति का सबूत किसानों पर कर्ज के बोझ को बढ़ाना समझते है।  यह वित्त मंत्री के बजट भाषण में स्पष्ट देखा जा सकता है।

सिंचाई व्यवस्था

खेती के परिप्रेक्ष्य में भारत में सिंचाई व्यवस्था की उपलबता अहम सवाल रहा है जिसके अभाव में खेती केवल मानसून पर निर्भर रह जाती है। भारत में केवल 42 प्रतिशत भूमि सिंचित है जिसमें धिकांशत: निजी ट्यूबवेलों से सिंचाई होती है। `हरित क्रांतिके दौर में इस सिंचाई मायम के व्यापक इस्तेमाल ने भूमिगत पानी के स्तर को पंजाब, हरियाणा, कर्नाटक, आंध्र, विदर्भ बुंदेलखण्ड में बहुत नीचे गिरा दिया है। कनाल तालाब सिंचाई पर जोर देकर सरकारें बड़ी परियोजनाओं पर पैसे बहाती हैं। इनमें से कई पुरानी परियोजनाओं के अंतर्गत पानी खेती से हटाकर निजी उद्योगों को दिया जा रहा है। यह स्थिति हिराकुड बांध पर लड़ते विस्थापितों ने रोकी तथा यह आरोप नर्मदा बांध प्रस्तावित पोलावर बांध पर भी है। इस बजट में घोषित किया गया है कि .आई.बी.पी. (एक्सीलरेटेड इरिगेशन बेनीफिट प्रोग्राम) के तहत 24 बडी़ मयम सिंचाई परियोजनाऐं 753 छोटी योजनाऐं इस वर्ष पूरी की जायेंगी तथा इनसे 5 लाख हेक्टेयर जमीन में सिंचाई होगी। इसके लिए 20,000 करोड़ रुपये दिये गये हैं। इसके अतिरिक्त टपक सिंचाई को 500 करोड़ दिये गये हैं, यह कहकर कि यह 4 लाख हेक्टेयर जमीन की सिंचाई करेगी; जबकि पिछले दो वर्षों में इस परियोजना (सूक्ष्म सिंचाई की केन्द्रीय योजना) ने 5 लाख 48 हजार हेक्टेयर जमीन पर सिंचाई प्रदान की। विश्व बैंक तमिलनाडु, आंध्र कर्नाटक सरकारों के साथ 900,000 हेक्टेयर में सिंचाई व्यवस्था की मरम्मत करेगी पुराना पानी एकत्रा करने के स्रोतों की मरम्मत करेगी उन्हें फिर कामयाब बनायेगी। (यानी उतने ही क्षेत्रो को जितना दोनों केन्द्रीय योजनायें करेंगी !) इसी तरह विश्व बैंक उड़ीसा बंगाल से भी समझौते करने जा रही है। (बजट भाषण के अनुसार)

इसमें समस्या स्पष्ट झलक रही है। क्या विश्व बैंक भारत के किसानों के लिए सिंचाई व्यवस्था में सहायता करने रही है ? जाहिर है इस कदम का रिश्ता बजट भाषण में रेखांकित किये गये `संकटसे है कि पूंजी निवेश (निजी पूंजी से मतलब है) बहुत ज्यादा है जिसे लगाने के लिए पर्याप्त रूप से सोखने के काबिल अर्थव्यवस्था को विकसित करना होगा। वैश्वीकरण के दौर में एक चेष्टा किसानों को कृषि से हटाकर अन्य कार्यों में लगाना है तथा हाल में कई बड़े कारपोरेट घरानों ने अनाज अन्य खाद्य फसलों की कीमतें देख इस क्षेत्र में घुसने का फैसला किया है। किसानों के लिए राष्ट्रीय नीति का जिक्र भी बजट भाषण में है जिसमें व्यावसायिक ठेका खेती पर जोर है।

सिंचाई उपलब कराने के घोषित इरादों को इस तथ्य के सामने देखना चाहिए कि आर्थिक सर्वेक्षण 2008 के अनुसार 10वीं पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत पांच वर्षों में केवल 8 लाख हेक्टेयर जमीन सिंचित कराई गई। जाहिर है यदि इस बजट के लक्ष्य पूरे हो पाये तो उसका कारण किसानों की फिक्र नहीं, बल्कि कारपोरेट निवेशकर्ताओं के आने की आशा होगी।

कृषि से जुड़ा अंतिम सवाल यह है कि बजट पेश होने के ठीक बाद से लगातार चर्चा शुरू है कि भारत का औद्योगिक विकास दर चाहे औद्योगिक निर्माण क्षेत्र हो या बिजली उत्पादन अथवा खदानों में काम गिर रहा है। अगर किसानों की हालत गिरती रही तो औद्योगिक उत्पाद का घरेलू बाजार और संकुचित होगा ?

बड़े पूंजीपति घरानों को राहत ही राहत

बजट प्रावाधानों में एक वाक्य में बहुत कुछ कह डाला गया बड़े पूंजीपतियों पर करों (कारपोरेट टैक्स) की बढोंत्री नहीं होगी। काफी चर्चा चल रही है कि इस क्षेत्र को कुछ धिक राहत तो देनी चाहिए थी, जबकि `अन्य तबकोंको `इतनीराहत मिली है। अर्थशास्त्र के विशेषज्ञों के अनुसार, जब यह कहा जा रहा है कि इस कर में कोई `बदलाव नहींतो इस कर के पीछे छुपे छूटों में भी तो कहीं कोई कमी नहीं लाई जा रही है। इस तरह, कारपोरेट क्षेत्र को मिल रही सब्सिडियों का कुल मूल्य 278,000 करोड़ रुपये है जो 1 प्रतिशत से भी कम आबादी द्वारा इस्तेमाल हो रही है। इसके विपरीत, आम लोगों को दी जा रही सब्सिडियों का कुल मूल्य 50,000 करोड़ रुपये है जो बहुमत आबादी में बांटी जाती है।

सामाजिक क्षेत्र : स्वास्थ्य और शिक्षा

इन दोनों क्षेत्रो को बजट सामाजिक क्षेत्र में सुधारों के स्तंभ बताती है। स्वास्थ्य के लिए कुल 16,534 करोड़ रुपये दिये गये हैं जिसमें 12,050 करोड़ केवल राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के लिए है। इसके अलावा, राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना शुरू किया जा रहा है जिसके लिए केन्द्रीय बजट में कुल प्रावाधान 205 करोड़ रुपये है ! इस योजना के तहत असंगठित मजदूर, जिसके पास बी.पी.एल. कार्ड है, को 30,000 रुपये की स्वास्थ्य सेवा इस्तेमाल के लिए सहायता दी जायेगी। इसका मतलब क्या होगा ? देश में निजी क्षेत्र मजदूरों के लिए .एस.आई. योजना है जिसके तहत डाक्टर हैं, अस्पताल हैं, डिस्पेंसरियां हैं तथा जिसमें इस योजना के अंतर्गत दिये गये स्वास्थ्य सेवाओं का सारा खर्चा `कवरहोता है। दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान वित्तमंत्री के अनुसार जिन तीन प्रांतों में यह योजना तुरंत लागू होगी तीनों प्रांतों में .एस.आई. योजना लागू होने की दर बहुत कम है (दिल्ली में 12 प्रतिशत) तथा समयसमय पर इसे पर्याप्त रूप से लागू करने की मांग को लेकर मजदूर आन्दोलन भी होता है (जैसे पिछले वर्ष पानीपत में टैक्सटाईल क्षेत्र में) इस योजना को लागू करके ऐसी योजना लाई जा रही है जिसमें बी.पी.एल. काडरारकों को सहूलियत दी जायेगी। बी.पी.एल. कार्ड बनने में भ्रष्टाचार का तो देश भर को अनुभव है। सरकारी डिस्पेंसरी अस्पतालों के विकास के लिए तो एक वाक्य भी नहीं है बजट में। तब यह 30,000 रु. के `कवरको लेकर मजदूर जायेगा निजी अस्पतालों में। इस क्षेत्र में 30,000 रुपये कितनी देर तक चलेंगे?

बजट में स्वास्थ्य अनुसंधान से जुड़े दो सवाल और हैं। अनुसंधान की `आउटसोर्सिंग‘ (यानी निजीकरण) को बढ़ावा देने के लिए, अगर अनुसंधान में जुटी किसी कम्पनी को काम दिया जायेगा तो सरकार उसके लिए 125 प्रतिशत छूट देगी। दूसरी तरफ, अनुसंधान के एक महत्वपूर्ण सरकारी केन्द्र दिल्ली के .आई.आई.एम.एस. को अनुसंधान के लिए केवल 50 लाख रुपये वार्षिक बजट दिया गया है जबकि जनता के पैसों से इसमें अनुसंधान के लिए कीमती धिरचना खड़ी है।

एक अन्य प्राविधान है कि अगर कुछ मुख्य शहरों को छोड़कर बाकी कहीं भी अस्पताल खोले जायेंगे तो उन्हें पांच वर्षों के लिए कोई भी कर नहीं देना पड़ेगा। जाहिर है ये दोनों प्राविधान अनुसंधान स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण व्यावसायीकरण को मदद करेंगी तथा यह शासकों की लम्बे समय से सोचीसमझी लागू की जा रही नीति है जिसके तहत अंतत: सरकार स्वास्थ्य सेवा उपलब कराने की अपनी जिम्मेदारी से हाथ हटा लेगी।

यही सवाल शिक्षा क्षेत्रा में भी है जहां नयेनये शिक्षा संस्थान खोलने की घोषणाएं हैं परन्तु बजट में उनके लिए पैसे का प्राविधान नहीं। तय है कि मोटी फीस वसूलने वाले निजी क्षेत्र के संस्थान खुलेंगे।

इन दोनों सवालों स्वास्थ्य शिक्षा पर यह दोहराना जरूरी है कि ये ही क्षेत्र तय करते हैं कि देश के श्रमिक बल की हालत क्या होगी। राष्ट्रीय सैम्पल सर्वेक्षण 2005–’06 के अनुसार 10 प्रतिशत से भी कम नौजवानों को किसी भी तरह का तकनीकी प्रशिक्षण मिलता है परन्तु, एक भी आई.टी.आई. का प्रस्ताव नहीं है।

वित्तमंत्री की घोषणा में इस बात पर जोर दिया गया है कि शिक्षा बजट में 20 प्रतिशत बढोंत्री की गई है तथा स्वास्थ्य सेवा में 15 प्रतिशत। इसके बावजूद स्वास्थ्य बजट सकल घरेलू उत्पाद के 1 प्रतिशत से भी कम ही है। हालांकि छठे वेतन आयोग की रिपोर्ट 30 मार्च, 2008 को घोषित होने वाली है, उसके तहत बढ़ने वाले खर्चों की गुंजाईश (विभि तबकों की वेतन बढ़ोतरी) बजट में कहीं भी नहीं है। जिन योजनाओं के लिए पैसे दिये भी गये हैं उसमें भी सोचने की बात है कि वार्षिक तौर पर महंगाई ही 6 प्रतिशत से 7 प्रतिशत बढ़ जाती है।

स्मार्ट कार्ड : गरीबी का पहचानपत्र

सभी सेवाओं के व्यावसायीकरण निजीकरण को आगे बढ़ाती यह बजट जनता को ठोस क्या दे रही है ? योजना है कि राशन समेत सभी विकास सुविधायें केवल गरीबी रेखा के नीचे वालों को एक स्मार्ट कार्ड जारी करके दी जायेगी। अब गया यह नया कार्ड बी.पी.एल. कार्ड बनाने से जुड़ी भ्रष्टाचार अन्याय को एक और शिकार मिल जायेगा। इसी संदर्भ में यह भी स्पष्ट करना ठीक रहेगा कि यह गरीबी रेखा जिसके साथ राशन व्यवस्था, राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना अन्य योजनायें जुड़ी हुई हैं को तय करने के आंकड़े सरकारी जरूरतों के साथ बदलते रहते हैं। अब हाल यह हो गया है कि जनता के हालात दिनदिन बिगड़ रहे हैं, सभी दूसरे मापदंड इसके सबूत हैं; परन्तु गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों की संख्या सरकारी आंकड़ों के अनुसार कम होती जा रही है।

वित्तमंत्री के बजट भाषण के अनुसार सरकार हर दिन हर घंटे पूर्ण रोजगार तथा गरीबी असमानता के खात्मे के लिए काम कर रही है। परन्तु, इसका नतीजा ? रोजगार दर 43 प्रतिशत से 41 प्रतिशत हो गया है, रोजगार योजना नरेगा में दिन के काम का वेतन न्यूनतम वेतन भी नहीं है, काम की `गांरटीकेवल 100 दिन की है, असमानता निबा बढ़ रही है। और, यह सब शासकों की नीतियों की ही देन है। अगर सरकार काम करना बंद कर दे तो शायद जनता को ज्यादा फायदा होगा !

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