March 22, 2008...10:57 am

केन्द्रीय बजट 2008–’09 - जनता के लिए घडि़याली आंसू तथा धनी वर्गों को रियायतें

Jump to Comments

जहां पहले बजट से तात्पर्य सरकार के एक वर्ष के आयव्यय का विवरण नये करों और नये खर्चों का विवरण प्रस्तुत करना होता था जिनसे सरकार द्वारा अपनायी जा रही दिशा का पता चलता था, वहीं बजट 2008 तथा पिछले कई वर्षों के बजट महज खोखली घोषणाओं के पर्याय बन गये हैं। गणित से इनका रिश्ता कमजोर है; सामानों की कीमतों तथा महंगाई के सवाल के साथसाथ करों का सवाल बजट से हटा ही दिया गया है।

वित्तमंत्री श्री चिंदम्बरम द्वारा संसद में पेश संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन का पांचवां बजट विदेशी तथा देसी बड़े पूंजीपतियों तथा बड़े भूस्वामियों का हितपोषक है, परन्तु अखबार वालों ने इसके केवल एक सतही पक्ष को उछाल कर, इसे इस रूप में प्रचारित किया है जैसे कि यह आम आदमी के हित का बजट हो। इस तरह का प्रचार केवल बजट के असली मकसद पर पर्दा डालने के काम आता है तथा यह जनता के लिए केवल नारे उछालने पैसे वालों के हितपोषण का काम करता है।

वित्तमंत्री का बजट भाषण

वित्तमंत्री ने अपना बजट भाषण यह कह कर शुरू किया कि भारत के विकास की कहानी प्रेरणाजनक रोचक है। उन्होंने बताया कि पिछले 3 वर्षों में विकास दर 8 प्रतिशत से धिक रहा है तथा सेवा क्षेत्र औद्योगिक निर्माण क्षेत्र विकास के दो स्तंभ रहे हैं। उनके अनुसार औद्योगिक निर्माण की रफ्तार 9.4 प्रतिशत की दर से बढ़ेगी। औद्योगिक निर्माण के सवाल पर उन्होंने कहा कि पूंजीगत सामानों का विकास दर नहीं गिरा। यह स्वीकार करते हुए कि औद्योगिक उत्पादन की दर में अप्रैल से दिसम्बर 2007 के बीच कुछ कमी आई है, वित्तमंत्री ने कहा कि पूंजीगत सामानों में विकास दर 20.2 प्रतिशत पर बहुत ऊंचा है; जिसका मतलब है कि उद्योग अभी भी बड़ी पूंजी निवेश कर रहा है भविष्य के बारे में नजरिया सकारात्मक है। 13 दिन बाद, 13 मार्च, 2008 को प्रकाशित औद्योगिक वृद्धि के आंकड़ों के अनुसार औद्योगिक विकास दर जनवरी ‘08 में 5.3 प्रतिशत थी, जबकि पिछले वर्ष यह 11.6 प्रतिशत थी। पूंजीगत सामानों में विकास का आंकड़ा 16.3 प्रतिशत पिछली जनवरी से गिरकर 2.1 प्रतिशत ही रह गया है। (इकानोमिक टाईम्स, 13 मार्च, 200 8) इसी तरह पूरा बजट आंकड़ों तथ्यों की हेराफेरी पर आधारित है।

ही वित्तमंत्री ने इस तरफ ध्यान दिलाया कि पिछले तीन वर्षों में किसानों द्वारा आत्महत्याओं की घटनायें बढ़ती गई हैं, 47 प्रतिशत भारतीय महिलायें खून की कमी के रोग से पीडि़त पाई गई हैं तथा भारत में कुपोषण की दर अफ़्रीका के कई देशों के दोगुनी है। तो यह है भारत के विकास की प्रेरणाजनक कहानी!

विकास दर पर प्रसन्नता प्रकट करने के बाद वित्तमंत्री ने यह भी फरमाया कि हालांकि भारत की आर्थिक स्थिति बहुत बढि़या है, परन्तु दुनिया भर में चल रही आर्थिक मंदी का असर हमारे जैसे विकासशील देश पर क्या होगा यह देखना पड़ेगा। यह भूला जाये कि पिछले 18 वर्षों से भारत के शासक वर्गों का नारा है `वैश्वीकरण‘, जबकि जरुरत यह रही है कि भारत की अर्थव्यवस्था को जनता की जरूरतों के अनुकूल आत्मनिर्भर तरीके से विकसित किया जाये। परन्तु अपनी `विश्व अर्थव्यवस्था से जोड़ोकी नीतियों के परिणामस्वरूप मंडराती आर्थिक समस्याओं का बोझ वे फिर जनता के सिर मढ़ेंगे और नीतियां वही रखेंगे।

गेहूं की बढ़ती कीमत, गिरती पैदावार विशेष आर्थिक क्षेत्र

वित्तमंत्री ने आगे बताया कि कृषि का विकास दर 2.6 प्रतिशत रहा है। उन्होंने खाद्य फसलों में कपास को तो शामिल किया है पर गेहूं को चुपके से छोड़ दिया है शायद जनता को कपास खिलाने का इरादा है ! क्योंकि बाजार के अभाव में भी कपास किसान आत्महत्यायें कर रहे हैं। साथ ही उन्होंने बताया कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में खाद्य फसलों की कीमत तेजी से बढ़ी है चावल की कीमत 15 प्रतिशत बढ़ी है तथा गेहूं की कीमत 88 प्रतिशत। वित्तमंत्री का कहना था कि इन्हीं कारणों ( शासक वर्गों द्वारा लाये गये वैश्वीकरण के कारण जो उन्होंने नहीं कहा) से घरेलू कीमतों पर दबाव है, विशेषकर खाद्य सामानों की कीमतों पर। अत: उनके अनुसार खाद्य सामग्री की आपूर्ति को संभालना अहम सवाल है। जाहिर है श्री चिंदम्बरम तीव्र कीमत बढ़ओत्री की संभावना को तर्कसंगत ठहराने के लिए जमीन तैयार कर रहे हैं !

परन्तु, इस सवाल पर सरकार व्यवहार में क्या रही है ? वह विशेष आर्थिक क्षेत्रो (सेज) से जुड़ी नीतियों में कोई परिवर्तन नहीं कर रही है। गेहूं उत्पादन के मुख्य क्षेत्रो विशेषकर, पंजाब, पश्चिम उत्तर प्रदेश हरियाणा की जमीनें तो सरकारें बड़े पूंजीपति घरानों बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को सौंप रही हैं। यानी, सरकार खुद ही चाहती है कि हमारे देश में गेहूँ की कमी रहे तथा इसका आयात करना पड़े, ताकि आर्थिक मंदी से ग्रस्त अमेरिका अन्य विकसित देशों की पैदावार को बाजार मिल सके तथा इस खरीदफरोख्त में इनको कमीशन।

अनाज उत्पादन में लगी जमीन का क्षेत्रफल 1980 में 1042 लाख हेक्टेयर था, जो 1990 में 1032 लाख हेक्टेयर हुआ तथा 2005–’06 में केवल 995 लाख हेक्टेयर रह गया। इसी तरह अनाज उत्पादन का विकास दर ‘80 के दशक में 3 प्रतिशत से कुछ ज्यादा था, जो 1990 से नई आर्थिक नीतियों के अमल के दौरान, 90 के दशक में ही 1.9 प्रतिशत (जनसंख्या वृद्धि दर से भी कम) हो गया और 2001 के बाद अनाज उत्पादन में कोई वृद्धि नहीं हुई। 2001–’02 में कुल उत्पादन 2920 लाख टन था।

इसी तरह मंत्री महोदय ने बताया कि ताम्बे लोहे की कीमत भी विश्व बाजार में बढ़ रही है पर, इसके बावजूद सरकार इनके खदानों के निजीकरण में लगी है ताकि विदेशी कम्पनियां भारत की प्रचुर खनिज संपदा से मालामाल हो सकें।

सम्मिलित विकास

बजट में बारबार इस शब्द का इस्तेमाल हुआ है और इस तरह के विकास के ठोस कदमों के रूप में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी एक्ट (नरेगा) राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य योजना जैसी योजनाओं का उल्लेख है। ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून तो साल में केवल 100 दिन काम देने की बात करता है और न्यूनतम वेतन का आश्वासन भी नहीं देता। नरेगा योजना के लिए महज 16,000 करोड़ रुपये रखे गये हैं। कैग रिपोर्ट कई अन्य रिपोर्टें यह सिद्ध कर चुकी हैं कि रोजगार योजना व्यापक भ्रष्टाचार से ग्रस्त है जिसमें पंचायत नेता अपने आकाओं को हिस्सा देकर मालामाल हो गये हैं। मरे हुये लोगों के नाम काम कर रहे लोगों की सूची में हैं तथा काम करके वेतन पाने के कारण कई ग्रामीणों ने आत्महत्यायें भी की हैं। इससे कितने दिन की नौकरी मिलेगी और किसको कितना वेतन? स्वास्थ्य मिशन की पूरी योजना स्वास्थ्य सेवाओं के व्यापारीकरण की योजना है और बजट में भी उसका लक्ष्य समुदाय जिसका मालिक हो जो केन्द्रीकृत हो जैसी स्वास्थ्य सेवायें देना है जिसके लिए 4,62,000 सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता तैयार किये गये हैं। जिन अन्य योजनाओं का जिक्र है उनमें मिडडे मिल योजना शामिल है जो देश भर में व्यापक भ्रष्टाचार का स्रोत है तथा जिसमें पांचवीं कक्षा तक के ही बच्चों को एक समय के खाने के नाम पर बिस्किट चने बांटे जाते हैं।

किसानों के लिए कर्ज माफी : एक कड़वा मजाक

जिस कारण से अखबारों कांग्रेसी सांसदों द्वारा इसे `आम आदमीका बजट ठहराने का शोर हुआ वह कारण है कर्ज माफी की घोषणा। इस घोषणा के अनेक पहलू हैं जिन पर ध्यान दिया जाना चाहिए तथा जो स्पष्ट करता है कि भारत में कृषि के खिलाफ सरकारें कितने कदम उठा रही हैं।

दलाल सरकार शासकों की स्पष्ट समझ है कि गांववासियों को कृषि से हटकर दूसरे ग्रामीण कामों में लगना चाहिए जिससे कि उनकी जमीन ठेकाकृषि या कम्पनियों को देने के काम सके। यह समझ सरकारी घोषणाओं में दिखती रहती है।

वित्तमंत्री की बजट घोषणा के अनुसार 2 हेक्टेयर (यानी 5 एकड़) से कम जमीन वाले किसानों के कर्ज माफ कर दिये जायेंगे, अगर उन्होंने उसका कोई भाग भी लौटाया हो। कर्जों की राशि को उन्होंने 60,000 करोड़ रुपये बताया, पर इसके लिए उन्होनें बजट में कोई प्राविधान नहीं दिखाया कि आखिर ये पैसे कहां से दिये जायेंगे। प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया कि ये कर्जे तबतब माफ होंगे जब वे देय होंगे। ये कर्जे केवल वे कर्जे हैं जो किसानों ने बैंकों या सहकारी समितियों से लिए हैं।

इस प्राविधान को यहां तक देखा जाये तो समस्याएं ही समस्याएं हैं। 60,000 करोड़ रुपये का यह आंकड़ा कहां से आया ? बैंकों के रिकार्डों के अनुसार 1 हेक्टयेर (यानी 2.5 एकड़) से कम जमीन वाले किसानों (जो बड़ी किसान श्रेणी है) में से 7.2 मिलियन किसानों के पास बैंकों में खाता है, जिन पर 20,499 करोड़ रुपये के कर्जे हैं। इसी प्रकार 1–2 हेक्टेयर (2.5–5 एकड़, यानी मयम किसान) वाले किसानों में से 5.9 मिलियन किसानों के पास बैंकों में खाते हैं, जिन पर 20,578 करोड़ रुपये के कर्जे हैं। दोनों को मिलाकर 41,077 करोड़ रुपये का कर्ज है। (पी. साईनाथ, हिन्दू, 10.3.200 8) फिर 60,000 करोड़ रुपये का सवाल कहां से आया ?

दरअसल, कर्ज माफी का सवाल पिछले एकदो वर्षों से विदर्भ में किसानों द्वारा आत्महत्याओं के संदर्भ में उठता रहा है। परन्तु, विदर्भ (महाराष्ट्र), अनंतपुर (आंध्र प्रदेश) आदि जगहों, जहां कर्जजाल में फंसकर बड़ी संख्या में किसानों ने आत्महत्यायें की हैं और कर रहे हैं, पर 50 प्रतिशत किसानों के पास 3 हेक्टयेर (7.5 एकड़) जमीन है जो कि सूखाग्रस्त क्षेत्रा होने सिंचाई व्यवस्था के अभाव के कारण कम उत्पादक है। इन किसानों को तो कर्जमाफी से कोई भी राहत नहीं मिलेगी। साथ ही, यह आम जानकारी का सवाल है कि सूखे इलाके सिंचाई वाले इलाकों को एक नजर से नहीं देखा जा सकता। परन्तु, कांग्रेस ने शायद जानबूझकर यह सवाल `राजकुमारराहुल गांधी द्वारा उठाने के लिए छोड़ दिया ताकि उन्हें किसानों का मसीहा बनने का कोई रास्ता मिले !

वित्तमंत्री ने तो बेवकूफी की सारी सीमाएं लांघते हुए कहा कि अगर 2 हेक्टेयर के ऊपर वाले किसान 75 प्रतिशत बैंक कर्ज वापस कर दें तो 25 प्रतिशत कर्ज माफ हो जायेगा। जो किसान 75 प्रतिशत कर्ज चुका देगा वह क्या 25 प्रतिशत और नहीं चुका देगा? इतना ही मूर्खतापूर्ण यह कहना भी है कि 2 हेक्टेयर से कम जमीन वाले किसानों ने अगर कुछ भी कर्ज चुका दिया है तो उसका कर्ज माफ नहीं होगा ! कुल मिलाकर, बात यहां यह है कि बैंकों के ये कर्जे धिकांश किसान चुका ही नहीं पाते और इस प्रकार ये कर्ज वैसे ही बैंकों के `खराब कर्जोंके खाते में धीरेधीरे चले जाते हैं।

इससे जुड़ा सवाल उठा कि आखिर ये 60,000 करोड़ रुपये आयेंगे कहां से बजट में तो कोई प्राविधान ही नहीं है, तो जवाब में वित्तमंत्री ने कहा कि 10 हजार करोड़ रुपये का प्रबंध तो वे इस वर्ष के करों से कर देंगे इसी स्रोत से 15 हजार करोड़ 30 जून तक करेंगे तथा बाकी अगले तीन वर्षों के बजट से आयेंगे जबकि उनकी सरकार का जीवन ही इस वर्ष खत्म होना है।

इस सबसे अलग मूल बात यहां यह है कि किसानों के कर्जों का बड़ा हिस्सा (विदर्भ में 3/4) साहुकारों