गोरखालैण्ड अलग प्रान्त की मांग को लेकर प. बंगाल के पर्वतीय क्षेत्रो का राजनैतिक माहौल फिर गरमा गया है। 10 मार्च, ‘08 को दार्जीलिंग हिल डवलपमैंट काउंसिल के प्रशासक सुभाष घीसिंग ने इस्तीफा दे दिया जिस मांग को लेकर गोरखा जनमुक्ति मोर्चे ने घीसिंग के पर्वतीय क्षेत्रो में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा रखा था। गोरखालैण्ड नेशनल लिबरेशन फ़्रन्ट के नेताओं तथा कार्यकर्ताओं का जनमुक्ति मोर्चे में जाने का प्रवाह जारी है। पर्वतीय क्षेत्रो में अलग प्रांत की मांग को लेकर संघर्ष फिर तेज हो रहा है।
प. बंगाल के नेपाली भाषी गोरखा बहुल पर्वतीय तथा दुआर क्षेत्रो में अलग प्रांत की मांग काफी पुरानी है। 1814–’15 के अंग्रेज–नेपाल युद्ध के बाद हुई सुगौली संधि के तहत दार्जीलिंग क्षेत्रा को नेपाल से लेकर सिक्किम को दिया गया तथा 1835 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने इस क्षेत्रा को अपने शासन में शामिल किया। 1864 में अंग्रेज–भूटान युद्ध के बाद अंग्रेज शासकों द्वारा कालिपपांग तथा दुआर क्षेत्र को हथियाने के बाद 1866 में पर्वतीय तथा दुआर क्षेत्रो का मौजूदा रूप अस्तित्व में आया। 1907 में दार्जीलिंग के पर्वतीय क्षेत्रो व दुआर के नेपाली भाषी क्षेत्रो की अलग प्रशासनिक इकाई की मांग उठायी गयी। 1943 में आल–इण्डिया गोरखा लीग का गठन किया गया जिसने 1947 में उत्तराखण्ड के नाम से अलग प्रांत की मांग उठायी। अप्रैल 1947 में सी.पी.आई. के स्थानीय नेताओं ने `गोरखास्तान‘ की मांग उठायी।
बीसवीं शताब्दी के छठे दशक में राज्यों के पुनर्गठन के समय भी यह क्षेत्र चर्चा में रहा। चाय बागानों के मजदूरो के बीच काम कर रही सी.पी.आई. ने राज्य पुनर्गठन आयोग को क्षेत्रीय स्वायत्तता के लिए ज्ञापन दिया तथा आल–इण्डिया गोरखा लीग ने नेपाली भाषी पर्वतीय क्षेत्रो व दुआर को केन्द्र शासित संघीय क्षेत्रा (यूनियन टेरीटरी) का दर्जा देने की मांग उठायी। परन्तु शासक कांग्रेस ने इन मांगों को अनदेखा किया। बीसवीं सदी के नौवें दशक में अलग प्रांत के लिए जी.एन.एल.एफ. के नेतृत्व में आन्दोलन ने जोर पकड़ा। आन्दोलन में क्षेत्र की जनता ने व्यापक पैमाने पर हिस्सेदारी की तथा चाय बागानों, लकड़ी व पर्यटन (टी, टिम्बर, टूरिज्म) बुरी तरह प्रभावित हुआ। परन्तु, सुभाष घीसिंग के नेतृत्व में जी.एन.एल.एफ. ने अलग प्रांत के लिए आन्दोलन को छोड़कर 1988 में पर्वतीय परिषद (डी.जी.एच.सी.) पर समझौता कर लिया। सुभाष घीसिंग परिषद के अयक्ष बन गये।
गोरखालैण्ड आन्दोलन के प्रति शासक `वाम‘ मोर्चे की नेतृत्वकारी पार्टी सी.पी.एम. ने जहां एक ओर आन्दोलन का क्रूर दमन किया, वहीं बांग्ला भाषी तथा नेपाली भाषी जनता को बांटने की साजिशें कीं। गोरखालैण्ड के प्रति शासक सी.पी.एम. के रवैये से असंतुष्ट सी.पी.एम. के स्थानीय नेताओं ने सी.पी.एम. छोड़कर अलग संगठन सी.पी.आर.एम. का गठन किया।
डी.जी.एच.सी. के गठन के बाद सुभाष घीसिंग व उनके सहयोगियों ने क्षेत्रा की जनता की आकांक्षाओं के साथ खिलवाड़ किया तथा इन क्षेत्रो में पीने के पानी तक की समस्या विकराल रूप धारण करती गयी। सी.पी.एम. की राज्य सरकार के साथ मिलकर सुभाष घीसिंग ग्रुप सत्ता के टुकड़ों पर संतुष्ट हो गया। चाय बागानों के मजदूरों व पर्वतीय क्षेत्रा के किसानों की समस्याओं पर कोई ध्यान ही नहीं दिया गया।
दरअसल, डी.जी.एच.सी. के बहुत सीमित अधिकार हैं तथा यह केन्द्र की सत्तारुढ़ सरकार, प. बंगाल की सी.पी.एम. सरकार तथा सुभाष घीसिंग की जी.एन.एल.एफ. के बीच प्रशासनिक प्रबंध है जिसका संविधान की योजना में कोई स्थान नहीं है। जनता की बढ़ती समस्याओं तथा डी.जी.एच.सी. की अक्षमता के चलते नेपाली भाषी पर्वतीय क्षेत्रो व दुआर में अलग प्रांत गोरखालैण्ड की मांग फिर जोर पकड़ने लगी। पर्वतीय परिषद के चुनाव न होने पर 2005 से सुभाष घीसिंग परिषद के अयक्ष के स्थान पर राज्य सरकार द्वारा नियुक्त प्रशासक के रूप में कुर्सी पर जमे रहे।
दूसरी ओर, गोरखा जनमुक्ति मोर्चे के नेतृत्व में अलग प्रान्त की मांग जोर पकड़ने लगी तथा घीसिंग के पूर्व सहयोगी बिमल गुरंग के नेतृत्व में मोर्चे में घीसिंग–विरोधी तेवर बढ़ते गये। जी.एन.एल.एफ. के कार्यकर्ता मोर्चे में शामिल होने लगे। अलग प्रांत की मांग को कुंद करने के लिए सुभाष घीसिंग ने सी.पी.एम. व कांग्रेस के साथ मिलकर डी.जी.एच.एस. को संविधान के छठे श्येडूल में शामिल करने की बात उठायी। यह पश्चिम बंगाल पर लागू नहीं है तथा इसके लिए संविधान में संशोधन आवश्यक है। सुभाष घीसिंग द्वारा यह मांग उठाया जाना तथा इसको सी.पी.एम. व कांग्रेस का समर्थन अलग प्रांत की मांग के लिए आन्दोलन के खिलाफ साजिश है। गोरखा जनमुक्ति मोर्चे ने इस मांग को अस्वीकार करते हुए इन क्षेत्रो में सुभाष घीसिंग के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया।
गोरखालैण्ड अलग प्रान्त की मांग इन क्षेत्रो की जनता की जनवादी मांग है। 9वें दशक के गोरखालैण्ड आन्दोलन के दौरान सी.पी.आई. (एम–एल)–न्यू डेमोक्रेसी ने इस जनवादी मांग का समर्थन किया था। पार्टी की तत्कालीन केन्द्रीय कमेटी के सदस्य का. साधन सरकार द्वारा गोरखालैण्ड की मांग का समर्थन करते हुए लिखित एक पुस्तिका प्रकाशित की गयी थी तथा पार्टी ने आन्दोलन के समर्थन में कार्यक्रम लिये थे। सी.पी.आई. (एम–एल)–न्यू डेमोक्रेसी अभी भी इस जनवादी मांग का समर्थन करती है।
प. बंगाल में सत्तारुढ़ सी.पी.एम. का रवैया एक ओर इस आन्दोलन का दमन करना तथा दूसरी ओर बांग्ला भाषियों व गोरखाओं के बीच विभाजन को गहरा करना है। शासक पार्टी के रूप में पतित हो चुकी सी.पी.एम. का रवैया इस जनवादी मांग के प्रति वैसा ही है जैसा शासक वर्गों की अन्य पार्टियां अपने द्वारा शासित प्रान्तों में सामान्यत: अपनाती रही हैं।