March 23, 2008...10:05 am

शहादत की 77व वर्षगांठ पर शहीद भगत सिंह तथा समकालीन कम्युनिस्ट आंदोलन– 1 – एस.एस. महल

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विचारधारात्मक विकास की प्रक्रिया से गुजरकर भगत सिंह एक क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट में विकसित हुए। उस समय के राजनीतिक वातावरण तथा पारिवारिक माहौल के चलते अल्पायु में ही वे राष्ट्रीय आन्दोलन में शामिल हो गये। औपचारिक शिक्षा को छोड़कर असहयोग आन्दोलन में कूद गये। असहयोग आन्दोलन के बीच में ही वापस लिये जाने तथा बरदोली सत्याग्रह के भी वापस लिये जाने के कारण उनका मोहनदास करमचंद गांधी तथा उनके सहयोगियों के नेतृत्व से विश्वास टूट गया तथा वे क्रान्तिकारी विचारों की ओर आकर्षित हुए। उन्होंने दुनिया के क्रान्तिकारी आन्दोलनों का अध्ययन किया। उस समय वे विचारधारा के बारे में स्पष्ट नहीं थे तथा अराजकतावाद और साम्यवाद दोनों के प्रति आकर्षित थे। उस समय वे रेडिकल राष्ट्रवादी थे। भगत सिंह तथा उनके साथियों की कुछ कार्रवाईयां निश्चय ही अराजकतावाद से प्रेरित थीं। परन्तु, भगत सिंह अराजकतावादी विचारधारा से संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने उपलब्ध माक्र्सवादी साहित्य का गंभीरता से अध्ययन किया। गिरफ्तारी के बाद जेल जीवन में उन्हें इस अध्ययन के लिए समय मिला। अपने जीवन के अंतिम काल तक वह कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी में विकसित हो चुके थे। (भगत सिंह का विचारधारात्मक विकास, प्रतिरोध का स्वर, नवम्बर 2006)

पूर्वाग्रहग्रस्त रवैया

तत्कालीन कम्युनिस्टों का भगत सिंह के प्रति रवैया काफी पूर्वाग्रहग्रस्त था। हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसियेशन (हि.सो.रि..) के नेताओं तथा कार्यकर्ताओं के विचारधारात्मक विकास को प्रक्रिया के रूप में समझने का उन्होंने प्रयास नहीं किया। तत्कालीन कम्युनिस्ट नेताओं ने हि.सो.रि.. के नेताओं के इस विकास के उच्चतम बिन्दु को नहीं देखा। कम्युनिस्ट नेताओं की प्रतिक्रिया बेहद नकारात्मक थी। वे केवल एक बिंदु पर अटक गये कि हि.सो.रि.. के युवा क्रान्तिकारी आतंकवादी थे। कम्युनिस्ट नेताओं ने भगत सिंह तथा उनके साथियों को आतंकवादी करार देने के लिए औपनिवेशिक शासन की निंदा आलोचना की, परन्तु उन्होंने खुद उन्हें आतंकवादी का तमगा दिया। भगत सिंह तथा उनके साथियों के बारे में समकालीन कम्युनिस्ट नेता सोहन सिंह जोश ने अपनी पुस्तक भगत सिंह से मेरी मुलाकात में लिखा : मैंने नौजवान भारत सभा में भगत सिंह उनके साथियों की आतंकवादी प्रवृति से खुद को अलग चिन्हित किया। अत: स्पष्ट है कि जोश उन्हें आतंकवादी समझते थे। भगत सिंह के बारे में उन्होंने आगे लिखा: वे व्यक्तिगत अथवा ग्रुप कार्रवाईयों को तरजीह देते थे तथा ब्रिटिश हिंसा का जवाब देशभक्त प्रतिहिंसा से देने में विश्वास रखते थे। यह समझ से परे है कि प्रतिक्रांतिकारी हिंसा का जवाब क्रांतिकारी हिंसा से देने को आतंकवाद कैसे कहा जा सकता है? बल्कि माक्र्सवादलेनिनवाद के अनुसार यह वर्ग युद्ध का बुनियादी लक्षण है। सोहन सिंह जोश आगे लिखते हैं : वे ऐसे देशभक्त थे जो और इंतजार नहीं करना चाहते थे, बल्कि प्रतीक्षा करने धीमे चलने की नीति से नफरत करते थे। गांधी की अहिंसा की अप्रभावी नीति को परास्त करने की भगत सिंह की समझ गलत कैसे थी ? साथ ही, तथ्य के रूप में, प्रतीक्षा करने धीमे चलने की अपनी नीति के जरिए गांधी राष्ट्रीय आन्दोलन की धार कुंद कर रहे थे तथा ब्रिटिश सरकार से समझौता करने की दिशा में बढ़ रहे थे। जोश और आगे लिखते है : भगत सिंह बमों तथा पिस्तौलों के इस्तेमाल से कुछ ऐसा करना चाहते थे जिससे सोये हुए छात्रो युवाओं को जगाया जा सके। उनके विचारों का सार प्रस्तुत करते हुए श्री सोहन सिंह जोश इस तरह भगत सिंह को आतंकवादी चिन्हित करते हैं।

केवल समकालीन कम्युनिस्ट नेताओं का भगत सिंह तथा उनके साथियों के प्रति रवैया पूर्वाग्रहों से ग्रस्त था, बल्कि यह रवैया बाद के वर्षों में भी जारी रहा। सी.पी.आई. नेता जी. धिकारी ने सी.पी.आई. के इतिहास से संबंधित दस्तावेजों का संपादन किया तथा पहले दो ग्रंथ 1974 में प्रकाशित हुए। जहां कहीं भी वे हि.सो.रि.. का हवाला देते हैं वहां वे हि.सो.रि.. के साथ आतंकवादी जोड़ना नहीं भूलते। इससे काफी स्पष्ट है कि सी.पी.आई. का मुख्य नेतृत्व भगत सिंह उनके साथियों को हमेशा आतंकवादी मानता रहा है।

परन्तु इन कम्युनिस्टों को भगत सिंह के लेखों को पढ़कर अपनी समझ पर शायद शर्म आये। भगत सिंह ने लिखा था : 1905 से बम के रास्ते का अनुसरण किया गया। यह भारत के क्रान्तिकारी आन्दोलन पर दर्दनाक टिप्पणी है। अभी भी इसके इस्तेमाल तथा दुरूपयोग को महसूस नहीं किया गया है। साथ ही, जिस सजीवता क्षमता से उन्होंने आतंकवाद के बारे में लिखा वह शायद उनके समकालीन कम्युनिस्टों की रचनाओं में नहीं मिलता। भगत सिंह ने लिखा : आतंकवाद क्रान्तिकारी मानसिकता का जनता में गहराई से पहुंचने का प्रायश्चित है। इस प्रकार यह ऐसा करने में हमारी विफलता की स्वीकारोक्ति है। भगत सिंह ने आगे लिखा: हर देश में इसका (आतंकवाद का) इतिहास इसकी विफलता का इतिहास है। फ़्रान्स, रूस, जर्मनी, बाल्कन देशों तथा स्पेन, हर जगह वही कहानी है। इसकी पराजय के बीज इसी के अन्दर छुपे हैं। भारत के ठोस संदर्भ में उन्होंने आतंकवाद पर टिप्पणी की : आतंकवाद बहुत हुआ तो साम्राज्यवाद को पार्टी के साथ समझौता करने के लिए मजबूर कर सकता है। ऐसा समझौता पूर्ण स्वतंत्राता हासिल करने से बहुत दूर की बात है। इस तरह आतंकवाद बहुत हुआ तो समझौते सुधारों की किस्त हासिल कर सकता है जिसके लिए गांधीवाद पूरी ताकत से लगा है। (भगत सिंह की रचनाएं, पृष्ठ 361)

अपने बारे में भगत सिंह ने लिखा : इस विषय पर मेरे विचारों को गलत समझने का काफी अवसर है। ऊपरी तौर पर मैंने एक आतंकवादी के रूप में काम किया, परन्तु मैं एक आतंकवादी कदापि नहीं हूं। मैं एक क्रान्तिकारी हूं जिसके विशिष्ट, ठोस दीर्घकालीन कार्यक्रम पर निश्चित विचार हैं। इस बारे में उन्होंने और कहा : उन्हें लाईनों के बीच में पढ़ने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। मैं अपनी पूरी ताकत से कहना चाहता हूं कि मेरे क्रान्तिकारी जीवन के कार्यों की छोटीसी अवधि को छोड़कर मैं कभी भी आतंकवादी नहीं रहा। ही मैं वर्तमान में आतंकवादी हूं। इसके बावजूद भी यदि ये कम्युनिस्ट उन्हें आतंकवादी करार देने में लगे हैं तब या तो उनके विचार पूर्वाग्रहग्रस्त हैं या इसके पीछे कुछ अन्य गहरे कारण हैं। हम इस बिंदु पर बाद में चर्चा करेंगे।

साम्राज्यवाद तथा भारत के पूंजीपतियों का गठजोड़

उस समय मौजूद कम्युनिस्टों की सभी धाराओं तथा एम.एन. रॉय से लेकर भगत सिंह तक सभी संगठनों के बीच एक बात समान थी। सभी सहमत थे कि कांग्रेस का गांधीवादी नेतृत्व भारत के पूंजीपतियों का प्रतिनिधित्व करता था तथा उसका राजनीतिक प्रतिनिधि था; यद्यपि 1925 का कानपुर सम्मेलन इस बिन्दु पर इतना स्पष्ट नहीं था। पार्टी कार्यक्रम कम्युनिस्ट पार्टी का बुनियादी दस्तावेज था। सत्यभक्त, जो सम्मेलन के संयोजक थे, द्वारा प्रस्तुत कार्यक्रम सम्मेलन द्वारा पारित किया गया तथा कोई वैकल्पिक कार्यक्रम सम्मेलन के सम्मुख नहीं था। पारित कार्यक्रम धिकारी द्वारा संपादित दस्तावेजों में शामिल किया गया है। रूसी लेखकों, जिनमें मेलंकोव शामिल थे, ने टिप्पणी की कि काम के तरीकों कम्युनिस्ट इंटरनेशनल से संबंधन पर सत्यभक्त के दूसरों के साथ मतभेद थे। (धिकारी, ग्रंथ 2) उक्त सम्मेलन द्वारा पारित कार्यक्रम का दस्तावेज बताता है कि इसके लेखकों को माक्र्सवाद की कोई गहरी समझ नहीं थी। उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद सामंतवाद को उखाड़ फेंकने का कार्यक्रम नहीं, बल्कि मजदूर किसानों के जीवन तथा काम की हालतों को बेहतर बनाने का कार्यक्रम अपनाया। राजसत्ता के दखल तथा उसके लिए जरूरी वर्ग संघर्ष का कोई हवाला नहीं दिया गया। साथ ही, यह कहा गया कि जब 90 प्रतिशत मेहनतकश जनता अपने श्रम के फल की रक्षा के लिए संगठित होगी तब शेष 10 प्रतिशत के पास उनके सामने समर्पण करने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं होगा। (कम्युनिस्ट पार्टी के इतिहास के दस्तावेज, ग्रंथ 2, पृष्ठ 633)

यद्यपि, एक स्थान पर पूर्ण स्वतंत्राता हासिल करने का हवाला है; परन्तु, साम्राज्यवाद, स्थानीय वर्गों से उसके संबंधो तथा मित्रों शत्रुओं का कोई हवाला नहीं है। यह कार्यक्रम धिकाधिक मजदूरों, किसानों अन्य मेहनतकश तबकों की आर्थिक स्थिति सुधारने का कार्यक्रम है। यद्यपि, सत्यभक्त सम्मेलन द्वारा केन्द्रीय कमेटी में चुने गये, परन्तु उन्होंने पार्टी से इस्तीफा दे दिया। तब पार्टी इन बिन्दुओं पर सही समझ की ओर आगे बढ़ी। 1927 में पार्टी की केन्द्रीय कार्यकारिणी की विस्तारित बैठक द्वारा पारित कार्यक्रम के अनुसार यह पार्टी की समझ है कि मेहनतकश जनता की ऊर्जा से स्वराज हासिल किया जा सकता है जबकि कांग्रेस पार्टी के बुर्जुआ नेतृत्व ने साबित किया है कि वह समझौते के लिए साम्राज्यवाद से मेलजोल कर रहा है जो जनता के हितों के विरुद्ध है। (गन्रथ 3 बी, पृष्ठ 212) यह समझ एम.एन. रॉय की तत्कालीन रचनाओं में भी सम्मिलित है।

भगत सिंह तथा उनके साथी साम्राज्यवाद भारतीय बुजुर्आ, जिनका प्रतिनिधित्व कांग्रेस का गांधीवादी नेतृत्व करता था, के बीच गठजोड़ के सवाल पर स्पष्ट थे। भगत सिंह ने कांग्रेस पार्टी तथा उसके नेतृत्व में संघर्ष के वर्ग चरित्र पर भी विचार रखे। उन्होंने कहा : यह संघर्ष कुछ पूंजीपतियों तथा मध्यमवर्गीय दुकानदारों के समर्थन से लड़ा जा रहा है। परन्तु ये वर्ग, विशेषकर पूंजीपति, अपनी सम्पत्ति को खतरे में डालने का साहस नहीं करते। (क्रान्तिकारी पार्टी का कार्यक्रम) कांग्रेस नेताओं की राजनीतिक दिशा उनके वर्ग चरित्र से निकलती है कि वे साम्राज्यवाद के खिलाफ जीवनमृत्यु के संघर्ष में नहीं जाना चाहते। इस सवाल पर भगत सिंह ने लिखा : इसलिए मैं कहता हूं कि ये पूर्ण स्वतंत्राता नहीं चाहते। धिक राजनैतिक आर्थिक दबाव डालकर वे पूंजीपतियों के लिए धिक सुधार रियायतें चाहते हैं। इसलिए मैं कहता हूं कि वर्तमान संघर्ष का खात्मा किसी समझौते में या बिना कुछ हासिल किये होगा। (वही) उन्होंने आगे लिखा : भारतीय पूंजीवाद विदेशी साम्राज्यवाद से रोजाना धिकाधिक सहयोग कर रहा है। कुछ नेताओं द्वारा डोमिनियन स्तर स्वीकार करना दिखाता है कि हवा किधर बह रही है। भारत की जनता को धोखा देकर तथा उनकी पीठ में छुरा घोंपकर भारतीय पूंजीपति सरकार में धिक हिस्सा चाहते हैं। (हि.सो.रि.. का घोषणापत्रा) हम देख सकते हैं कि उनकी रचनाओं में भारतीय पूंजीवाद साम्राज्यवाद से गठजोड़ कर रहा था और इसीलिए उसके प्रतिनिधि के रूप में उभर रही कांग्रेस पार्टी ब्रिटिश सरकार से समझौता कर रही थी। इस बिन्दु पर सी.पी.आई., भगत सिंह एम.एन. रॉय एकराय पर थे। तथापि, भगत सिंह की स्पष्टता काफी उल्लेखनीय है।

गठजोड़ तथा गैरऔपनिवेशिकरण का सिद्धांत

भारतीय पूंजीवाद साम्राज्यवाद के बीच सहयोग तथा कांग्रेस ब्रिटिश सरकार के बीच समझौते पर सहमति थी। इसका आधार क्या था ? इस पर मतभेद उभरने लगे जो बाद में काफी गंभीर हो गये। यह मतभेद कम्युनिस्ट इंटरनेशनल की छठी कांग्रेस में सामने आये जहां एम.एन. रॉय ने गैरऔपनिवेशिकरण का सिद्धांत प्रस्तुत किया। रॉय के विचार में ब्रिटिश साम्राज्यवाद