April 2, 2008...10:27 pm
कलिंगनगर तथा पोस्को–विरोधी आंदोलन : कारपोरेट द्वारा कुचलने की कोशिशें
(का. राजेन्द्र षडंगी ने कलिंगनगर तथा पोस्को–विरोधी आंदोलनों के समक्ष मौजूदा चुनौतियों के बारे में एक पत्र 20 मार्च को देश भर में भेजा था।हम यहां उक्त पत्र का संक्षिप्त अनुवाद प्रकाशित कर रहे ह। – संपादक)
13 मार्च, 2008 को टाटा के गुंडों ने कलिंगनगर आन्दोलन के कार्यकर्ता जोगेन जमुदा पर दिनदहाड़े गोली चलाई। 19 मार्च को विश्वस्त सूत्रो से जानकारी मिली कि टाटा की जाजपुर रोड स्थित इकाई में प्राइवेट सुरक्षाकर्मी के रूप में लगभग 70 सशस्त्रा गुंडे ठहरे हुए हैं। यह स्थान कलिंगनगर से पांच किलोमीटर दूर है। 29 नवम्बर, 2007 को पोस्को के गुंडों ने बालीतुठा में पोस्को स्टील प्लांट का विरोध कर रहे लोगों पर बमों से हमला किया। पोस्को के दबाव में प्रशासन ने ढाई साल से रूके सर्वे कार्य को भारी पुलिस बंदोबस्त के बीच शुरू कराया। ये अलग–थलग घटनायें नहीं हैं बल्कि बड़ी कम्पनियों की नई कार्ययोजना है। पुलिस व प्रशासन द्वारा विस्थापन, सेज, जन–विरोधी औद्योगिकरण व भूमि अधिग्रहण के खिलाफ जनता के संघर्ष को दमन के जरिये कुचलने की खबरें आती रही हैं। 2 जनवरी, 2006 को कलिंगनगर में पुलिस की गोलियों से 14 लोगों की शहादत अभी भी ताजा है। बिड़ला द्वारा बॉक्साईट खनन का विरोध कर रहे काशीपुर के आदिवासियों पर पुलिस गोलीबारी में तीन की हत्या तथा टाटा द्वारा चिल्का झील पर कब्जे के विरोध में पांच लोगों की हत्या उल्लेखनीय है। इन घटनाओं की जनवादी ताकतों व बुद्धिजीवियों ने व्यापक विरोध किया। लगता है अब कारपोरेट केवल सरकार पर निर्भर रहने की जगह विरोध को कुचलने में खुद भी आगे आ रहे हैं तथा सरकार कारपोरेट की गुंडा वाहिनी को वैधता प्रदान कर रही है। इस प्रकार विरोध का दमन करने के लिए सरकार व कारपोरेट मिलकर प्रयासरत हैं।
खदानों व औद्योगिक क्षेत्रो में कम्पनियों द्वारा विरोध को कुचलना कोई नई बात नहीं है। कारपोरेट हितों के आड़े आने वाले लोगों की हत्याओं के लिए आपराधिक तत्वों का इस्तेमाल मुम्बई, जमशेदपुर जैसे स्थानों के लिए आम है। कम्पनियों के अपराधिक कार्यों का उचित पर्दाफाश नहीं किया गया है। साथ ही विस्थापन, सेज, जन–विरोधी औद्योगिकरण व भूमि अधिग्रहण के विरोध को हिंसक रूप से कुचलने की कारपोरेटों की रणनीति निश्चिय ही नई बात है। पुलिस व प्रशासन ऐसी हिंसा के समय मूकदर्शक बने रहे। यहां सवाल विशाल पूंजी निवेश से मुनाफा कमाने का नहीं है। यह तो खुलेआम लूट–खसोट का मामला है तथा कारपोरेट इसे जल्दी से जल्दी करना चाहते हैं। उड़ीसा में 5 लाख करोड़ की पूंजी निवेश के प्रस्ताव आये हैं तथा सरकार ने सहमति–पत्रो पर हस्ताक्षर करने की मुहिम चला रखी है। पिछले 70 सालों में उड़ीसा में उद्योगों व अधिरचना परियोजनाओं में कुल पूंजी निवेश 50 हजार करोड़ का रहा है। अत: कम्पनियां अपनी लूट–खसोट के लिए किसी भी अपराध को करने के लिए तैयार हैं तथा किसी भी हद तक और किसी भी स्तर तक कर सकते हैं। कलिंगनगर व पोस्को–विरोधी आन्दोलनों में हाल की घटनायें इसकी साक्षी हैं। कुछ वर्ष पूर्व काशीपुर से शुरू होकर अब यह कारपोरेट की एक पूरी नीति व रणनीति बन चुकी है।
कलिंगनगर व एरास्मा की जनता ने कारपोरेट के हमलों का अभी तक बहादुरी से सामना किया है। वे टाटा व पोस्को को उचित जबाव देने के लिए 25 मार्च (कलिंगनगर) तथा 1 अप्रैल (एरास्मा) में विशाल सभायें कर रहे हैं। हम सभी बुद्धिजीवियों, जनपक्षीय राजनैतिक ताकतों तथा सभी संबंधित नागरिकों का आवाह्न करते हैं कि वे शीघ्रातिशीघ्र अपना विरोध दर्ज करायें तथा टाटा व पोस्को की आपराधिक गतिविधियों को रोकने में सहयोग करें।
जोगेन जमुदा पर नियोजित हमला
13 मार्च को चाण्डिया गांव के जोगेन जमुदा पर मोटरसाईकिल सवार गुंडों ने ढोलापत्थर चौक पर गोलियां चलाईं जो कलिंगनगर थाने से कुछ ही फासले पर है। जोगेन साप्ताहिक बाजार से अपनी मां व एक अन्य रिश्तेदार के साथ लौट रहे थे, जब पीछे से आकर गुंडों ने गोलियां चलाईं तथा उनके गिरने पर उन्हें मारने की कोशिश की। यह सब बेहद संगठित तरीके से आनन–फानन में किया गया जो हमलावर गुंडों को दिये गये प्रशिक्षण को दर्शाता है। आन्दोलन के कार्यकर्ताओं ने उन्हें कटक मेडिकल कॉलेज पहुंचाया। उन्हें ले जाने वाली गाड़ी को चंडीखोल पुलिस ने जानबूझकर अधे घंटे से अधिक देर तक रोके रखा जबकि उन्हें मरीज की नाजुक स्थिति की जानकारी थी। यह सब पुलिस ने टाटा के इशारे पर किया ताकि जोगेन की जान न बचायी जा सके। लेकिन टाटा व पुलिस के हमले के बावजूद जोगेन के हौसले बुलंद हैं।
टाटा व पोस्को नंदीग्राम से सीख रहे हैं
दमन की यह नई रणनीति नंदीग्राम से सीखी गई है। पिछले एक साल से टाटा व सरकार द्वारा कलिंगनगर में घुसने के सभी प्रयासों को विस्थापन–विरोधी जनमंच द्वारा विफल कर दिये जाने के बाद टाटा ने आन्दोलनकारियों को डराने तथा कुछ लोगों को प्रलोभन देने के प्रयास तेज कर दिये। जब पोस्को प्रतिरोध संग्राम समिति के दृढ़ विरोध के चलते पोस्को व सरकार के सभी प्रयास विफल हो गये तो पोस्को ने अपनी रणनीति बदली। नंदीग्राम के अनुभव ने इन कारपोरेटों की सहायता की। जब 14 मार्च, 2007 को सी.पी.एम. की पश्चिम बंगाल सरकार ने पुलिस द्वारा 14 लोगों की हत्या करायी तब उसका व्यापक विरोध हुआ। परन्तु, जब उसी सरकार ने नवम्बर 2007 में नंदीग्राम के किसानों पर पुलिस के सहयोग से सी.पी.एम. गुंडावाहिनी द्वारा हमला कराया तो राज्य सरकार ने इसे स्थानीय लोगों के दो ग्रुपों के बीच हिंसा की संज्ञा दी। उड़ीसा के एक बड़े उद्योगपति वैजयंती पंडा, जो शासक बीजद की ओर से राज्य सभा सदस्य हैं, राज्य सरकार को खुलेआम सलाह दे रहे हैं कि वह भूमि अधिग्रहण के खिलाफ आन्दोलनों को कुचलने के लिए पश्चिम बंगाल सरकार से सीखे।
कारपोरेट ने उड़ीसा में नंदीग्राम मॉडल पर अमल करने का निर्णय लिया। 29 मार्च की खबर निश्चय ही साबित करती है कि टाटा ने कलिंगनगर के खिलाफ सशस्त्रा गुंडावाहिनी तैयार की है। कलिंगनगर में टाटा तथा एरास्मा में पोस्को को क्रमश: प्रफुल्ल गढ़ई (राज्य के वित्तमंत्री व सुकिंडा के विधायक) तथा दामोदर राउत (बीजद के महासचिव, पूर्व मंत्री व एरास्मा के विधायक) में सक्षम सहयोगी मिले हुए हैं। वे दोनों ही उड़ीसा के ताकतवर नेता हैं। इनके सहयोग से तथा सरकार, जिला प्रशासन व पुलिस से मिलकर कारपोरेट ने दमन की नई रणनीति तैयार की है।
कलिंगनगर : जनता द्वारा हमलों का मुकाबला
जोगेन पर हमले की खबर फैलते ही बड़ी संख्या में स्थानीय लोग वीर भूमि (अंबागडिया) पर जमा हुए तथा इस हमले को टाटा कंपनी द्वारा आंदोलन के नेताओं व कार्यकर्ताओं पर हमले के लिए तैयार की गई गुंडावाहिनी के प्रयास का हिस्सा बताया। विस्थापन–विरोधी जनमंच ने जोगेन के हमलावरों को तुरंत गिरफ्तार करने, जाजपुर जिले के पुलिस तथा प्रशासन के अअधिकारियों को हटाने, कलिंगनगर में टाटा की कार्रवाईयों पर रोक लगाने, राज्य सरकार द्वारा आंदोलन की मांगों पर सार्थक बातचीत शुरू करने आदि मांगों को लेकर 14 मार्च, ‘08 की शाम तक एन.एच.–200 अवरुद्ध किया।
उल्लेखनीय है कि जोगेन जमुदा पर हमले के कुछ दिन पहले आंदोलन के एक अन्य नेता नटी अंगरई पर टाटा के गुंडों ने हमला किया था। लगभग 6 माह पहले टाटा ने सुकिंडा थाने के पास गुंडों के लिए एक प्रशिक्षण शिविर का आयोजन किया था। इन गुंडों को प्रशिक्षण के लिए जमशेदपुर से पेशेवर हत्यारों को बुलाया गया था। यह सारी सूचना प्रशासन को दी गयी थी तथा 2 जनवरी, ‘08 को कलिंगनगर शहादतों की दूसरी बरसी पर इस आशय का प्रस्ताव भी पास किया गया था।
साथ ही पुलिस विभिन्न बहानों से आंदोलन पर दमन की योजना बनाती रही है। 30 जनवरी, 2008 को भुवनेश्वर से सी.पी.आई. (एम–एल)–जनशक्ति के एक नेता अन्ना रेड्डी के साथ अंबागडिया की नानिका जमुदा की गिरफ्तारी के बाद पुलिस और प्रशासन ने कलिंगनगर आंदोलन के बारे में तरह–तरह की कहानियां प्रचारित कर आंदोलन पर दमन तेज करना चाहा। लोगों को आतंकित करने के लिए बड़ा पुलिस बल अंबागडिया पहुंचा परन्तु रात के पहर भी 1000 आदिवासियों के एकदम जमा हो जाने पर पुलिस बल को वापस लौटना पड़ा।
जाजपुर के पुलिस आधीक्षक कलिंगनगर आंदोलन के खिलाफ लगातार धमकियां जारी करते रहे हैं।
इरास्मा की जनता ने सर्वे काम को विफल किया
12 फरवरी को ढिंकिया, पटना तथा माहला गांव के लोगों ने जगतसिंह पुर के जिला कलक्टर तथा एस.पी. के नेतृत्व में सशस्त्र पुलिस बल का सामना किया। यह घटना पोस्को द्वारा सर्वे काम को पूरा करने की प्रक्रिया में हुई जब विरोध के बावजूद जिला प्रशासन ने इन गांवों में घुसने का प्रयास किया।
अभय साहू के नेतृत्व में ढिंकिया, माहला तथा पटना के 2000 लोग प्रशासनिक अधिकारियों के सामने डट गये जो 300 से अधिक सशस्त्रा पुलिस बल के साथ आगे बढ़ रहे थे। 12 फरवरी से पहले इन गांवों के लोगों ने पोस्को स्टील प्लांट के लिए प्रस्तावित 4004 एकड़ जमीन में से लगभग 1200 एकड़ जमीन चिन्हित की थी तथा वे पुलिस को इस सीमा में ना घुसने देने के लिए कृतसंकल्प थे। महिला आंदोलनकारियों ने आगे आकर पुलिस को गोली चलाने की चुनौती दी। इन तीन गांवों के लोग परंपरागत हथियारों से लैस थे तथा युवा इंकलाब जिंदाबाद, साम्राज्यवाद मुर्दाबाद के नारे लगा रहे थे। टकराव की स्थिति तीन घंटे तक बनी रही। इसके बाद प्रशासन को वापस जाना पड़ा। तत्पश्चात लोगों ने सर्वे टीम द्वारा गाड़े गये खंभों को उखाड़ना और नष्ट करना शुरू किया। गोविंदपुर गांव के खंभे तभी उखाड़ दिये गये तथा अगले दो दिन में नोलिया साही, नुआगांव तथा गढ़कुजंग के खंभे भी उखाड़ दिये गये। ढिंकिया, पटना तथा माहला गांव के लोगों ने अपने क्षेत्र की सफल रक्षा द्वारा आंदोलन में नई उर्जा का संचार किया तथा यह भावना पूरे क्षेत्रा में बलवती होती जा रही है। नुआगांव में भी आंदोलन फिर मजबूत हो रहा है।
पोस्को के बारे में सरकार की योजना को विफल करने तथा उड़ीसा व देश भर के विस्थापन–विरोधी संघर्षों को बल प्रदान करने के लिए पोस्को प्रतिरोध संग्राम समिति ने 1 अप्रैल, 2008 को बालितुठा में विकल्प समावेश का आवाह्न किया है।
बड़ी कम्पनियां लूट–खसोट की काफी जल्दी में हैं तथा विरोध को कुचलने के लिए सरकार का हाथ बंटा रही हैं। कलिंगनगर तथा एरास्मा की जनता अभी तक उनके हमलों का समुचित जवाब दे रही है। सभी जनपक्षीय राजनैतिक ताकतों तथा जनवादी बुद्धिजीवियों का कर्तव्य है कि वे इस चुनौती के सामने एकताबद्ध होकर खड़े हों तथा विस्थापन–विरोधी आंदोलन के खिलाफ इन कम्पनियों की कार्रवाईयों को बेनकाब करें व उन पर रोक लगायें। इन कम्पनियों के खिलाफ कार्रवाई का वक्त आ गया है ।