April 2, 2008...8:30 pm
बोकारो (झारखण्ड) - बी.एस.एल. विस्थापितों का संघर्ष
झारखण्ड स्थित सार्वजनिक क्षेत्र के बोकारो स्टील प्लांट (बी.एस.एल.) के विस्थापितों का संघर्ष फिर भड़क उठा है। विस्थापन क्षेत्र के बदराटाण्ड गांव में बी.एस.एल. प्रबन्धन बाउंड्री दीवार बनाना चाह रहा था जिसका विस्थापित विरोध कर रहे थे। 6 मार्च, ‘08 को प्रशासन भारी पुलिस बल के साथ पहुंचा और आंसू गैस, लाठियों व रबड़ की गोलियों से विस्थापितों पर हमला किया जिसमें कई को गंभीर चोटें आईं। विस्थापितों के कार्यालय का झण्डा फाड़ दिया गया, कार्यालय का सामान लूट लिया गया व कई मोटरसाइकिलों व साइकिलों को गाड़ी से कुचल दिया गया। इस दमन के विरोध में अगले दिन 7 मार्च को बोकारो बंद का आवाह्न किया गया जिसे जनता का व्यापक समर्थन मिला। बंद के दौरान आक्रोशित जनता ने लाठियां भांजते पुलिस को कई जगह मुंहतोड़ जवाब दिया जिसमें दो पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हुए। विस्थापितों के व्यापक रोष को देखते हुए प्रबन्धन ने दीवार का निर्माण रोक दिया। विस्थापितों ने थोड़ी दूरी तक जो दीवार बनी थी उसे तोड़ डाला।
10 मिलियन (1 करोड़) टन क्षमता के बोकारो स्टील प्लांट के लिए सरकार द्वारा 50 वर्ष पूर्व ग्रामीणों की करीब 44,000 एकड़ जमीन अधिग्रहित की गई थी। अंतत: केवल 23,000 एकड़ जमीन पर 4 मिलियन टन का प्लांट, कार्यालय, आवास इत्यादि बने एवं बाकी जमीन खाली पड़ी रही जिस पर अब बी.एस.एल. कब्जा करना चाह रहा है। 50 वर्षों में विस्थापितों की तीन पीढि़यों के गांव–घर इस जमीन पर बसे हैं और वे जमीन पर खेती कर गुजारा करते हैं। बिहार (झारखण्ड) सरकार ने इन गांवों को बी.एस.एल. के अंतर्गत मानकर यहां कोई विकास कार्य नहीं किया। बी.एस.एल. ने भी सड़क, पानी, बिजली, स्कूल, स्वास्थ्य सेवा इत्यादि इन गांवों को उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी नहीं उठाई और इन्हें अपने हाल पर छोड़ दिया। मुआवजा व नौकरियों के मामले में भी विस्थापित उपेक्षित रहे हैं। मुआवजा की राशि के संबंध में विस्थापितों के 10,000 मुकदमे कोर्ट में भुगतान के निर्णय के लिए लंबित हैं। बी.एस.एल. प्रबन्धन के 2006 के खुद के सर्वेक्षण के अनुसार भी 5600 विस्थापित नौकरी की प्रतीक्षा–सूची में हैं। वास्तविक आंकड़ा कहीं अधिक है और विस्थापितों के बच्चों की दो पीढि़यां नौकरी योग्य हो चुकी हैं।
विस्थापितों ने खाली पड़ी करीब 7300 एकड़ जमीन बी.एस.एल. से वापस लिये जाने के लिए कई वर्ष पहले संघर्ष किया था तथा तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू यादव ने जमीन सरकार द्वारा वापस लेने की घोषणा भी की थी, पर यह मात्रा घोषणा बन कर रह गयी। कानूनन यह जमीन 50 वर्ष पूर्व सार्वजनिक उद्देश्य के लिए सार्वजनिक खर्च पर अधिग्रहित की गयी थी। किन्तु अब उदारीकरण– निजीकरण की नीतियों के तहत इस जमीन से भारी मुनाफा कमाने के लालच ने बी.एस.एल. व झारखण्ड सरकार दोनों को आकर्षित किया है। बी.एस.एल. दावा कर रही है कि उसे प्लांट की क्षमता के विस्तार के लिए जमीन चाहिए जबकि वास्तविकता यह है कि इस जमीन के बड़े हिस्से को बी.एस.एल. जे.के. सीमेंट फैक्ट्री, पावर प्लांट व अन्य निजी कंपनियों को बेचना चाह रहा है। पहले से कब्जे में की गई जमीन को बी.एस.एल. रिहायशी कालोनी, शॉपिंग सेंटर इत्यादि के लिए विस्थापितों को मुआवजे की दर से 100 गुना अधिक दर पर निजी हाथों में बेच चुका है। झारखण्ड उच्च न्यायालय ने जब सब जमीन पर बी.एस.एल. के मालिकाना अधिकार को स्वीकार किया तो अब झारखण्ड सरकार ने उच्चतम न्यायालय में अपील दायर कर मांग की है कि बी.एस.एल. उसके साथ लंबी अवधि के किरायेदार के रूप में करारनामा (लीज डीड) करे ताकि जमीन की भविष्य की खरीद–फरोख्त में सरकार को भी हिस्सा मिले।
दोनों में से किसी के हिसाब–किताब में विस्थापितों का भविष्य कहीं नहीं है। बी.एस.एल. नौकरी देने की बात अभी भी करता रहता है किन्तु वास्तविकता यही है कि पिछले 20 वर्षों में 1 हजार नौकरियां भी नहीं दी गयी हैं। दूसरी तरफ, पुराने प्लांट में कुल नियमित नौकरियां अधे से अधिक घटकर अब कर्मियों की संख्या 20,000 से कम है और घटती जा रही हैं। सच तो यह है कि अगर प्लांट का विस्तार भी हो तो विस्थापितों को नौकरी मिलने की संभावनाएं नहीं के बराबर हैं।
बोकारो के विस्थापितों के कई संगठन बने हुए हैं जिनमें विभिन्न संसदीय पार्टियों का नेतृत्व है। कई बार संघर्ष हुए हैं जिनमें मुख्य मांग नौकरियों की ही रही है। आम तौर पर जब कभी संघर्ष ने बड़ा रूप धारण किया तो थोड़ी–सी नौकरियां मंजूर हुईं जिनमें विभिन्न नेताओं का अलग–अलग कोटा निर्धारित हो गया और नौकरियों की बिक्री हो गयी।
देश के विस्थापितों के संघर्षों का नया दौर जो कलिंगनगर से शुरू हुआ, जिसमें मुआवजा व नौकरी की बात छोड़कर जमीन ही नहीं देने का सवाल मुख्य बना, का बोकारो के विस्थापितों पर भी प्रभाव पड़ा और उसका एक तबका नौकरियों के भ्रमजाल की सच्चाई समझने लगा है। इस बार कई विस्थापित संगठनों ने मिलकर विस्थापित संयुक्त मोर्चा का गठन किया है एवं घर–जमीन बचाओ की मांग को प्रमुख मांग बनाकर कुछ महीनों से संघर्ष का विस्तार किया जा रहा है। इस्पात मंत्री राम विलास पासवान के दौरे का विस्थापितों ने व्यापक विरोध किया था। दूसरी ओर, विभिन्न संसदीय पार्टियां विस्थापितों के आन्दोलन पर वर्चस्व के लिए होड़ कर रही हैं। विस्थापितों की जमीन नहीं छोड़ने की भावनाओं को देखते हुए अभी तक ये पार्टियां इस मांग का औपचारिक समर्थन कर रही हैं किन्तु साथ–साथ नौकरी के भ्रमजाल के किसी समझौते के लिए विस्थापितों को गुमराह करने के लिए प्रयासरत भी हैं।
अखिल भारतीय किसान मजदूर सभा (ए.आई.आई.के.एम.एस.) जान देंगे, जमीन नहीं देंगे के विस्थापितों के नारे का पूर्ण समर्थन कर रही है और उसके कार्यकर्ता संघर्ष में सक्रिय भागीदारी कर रहे हैं।
Leave a Reply
You must be logged in to post a comment.
You must be logged in to post a comment.