April 10, 2008...12:17 am

कम्युनिस्ट क्रांतिकारी बु‌द्धिजीवी का. राजेन्द्र षडंगी को लाल सलाम!

Jump to Comments

प्रखर कम्युनिस्ट क्रांतिकारी बुद्धिजीवी, कृषि पर साम्राज्यवादी हमले के प्रबल विरोधी तथा जबरन विस्थापन के विरुद्ध जन संघर्षों की राष्ट्रीय स्तर पर उभरती आवाज का. राजेन्द्र षडंगी का 27 मार्च, 2008 को भुवनेश्वर में निधन हो गया। वे 48 वर्ष के थे।

का. राजेन्द्र का जन्म 15 जून, 1960 को उड़ीसा के खोरदा जिले के नारिसो गांव में हुआ था। पारिसो के प्राथमिक स्कूल में प्राथमिक शिक्षा पाने के बाद उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा भुवनेश्वर के सैनिक स्कूल में प्राप्त की। कटक के राविन्शा कॉलिज से विज्ञान में स्नातक शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने उत्कल विश्वविद्यालय वाणी विहार से सांख्यिकी में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त की। तदोपरांत उन्होंने कोलकाता स्थित भारतीय सांख्यिकी संस्थान से आपरेशनल प्रबन्धन तथा गुणवत्ता नियंत्राण में स्नातकोत्तर डिप्लोमा प्राप्त किया।

शिक्षा पूरी करने के बाद 1983 में का. राजेन्द्र नेशनल डेयरी डवलैपमेंट बोर्ड, आनन्द में धिकारी के रूप में नियुक्त हुए तथा वरिष्ठ धिकारी के पद पर पदोत हुए। खाद्य तेलों के क्षेत्रा में एन.डी.डी.बी. के हस्तक्षेप के साथ एन.डी.बी.बी. ने उन्हें आयल उड़ीसा भेजा तथा उन्होंने उड़ीसा सरकार के उपक्रम पश्चिम उड़ीसा सहकारी तेल बीज निगम के प्रबंध निदेशक का कार्यभार संभाला। वहां बारबार अन्य निदेशकों से उनका टकराव हुआ। साथ ही, नरसिंह रावमनमोहन सिंह की नई आर्थिक नीतियों के दौर में सरकार की नीति खाद्य तेलों के घरेलू उत्पादन के खिलाफ रही। इसके चलते उन्होंने निगम के प्रबंध निदेशक पद से इस्तीफा दे दिया।

1999 में उड़ीसा के तटीय क्षेत्रो पर महाचक्रवात के विनाश के बाद राहतकार्यों में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभायी। इन राहतकार्यों के दौरान अनेक बुद्धिजीवियों से उनके संबंध स्थापित हुए जो बाद के वर्षों में भी उनके सक्रिय सहयोगी रहे। इन्होनें मिलकर लोकपख्य की स्थापना की तथा का. राजेन्द्र इसके संयोजक रहे। काशीपुर में उत्कल एल्यूमिना से विस्थापित आदिवासियों पर दमन के खिलाफ विरोध में उन्होंने सक्रिय हिस्सेदारी की।

महाचक्रवात पर राहतकार्यों के बाद वे जनता के मुद्दों पर संघर्षों में जुट गये। 2000 में उन्होंने अपने मित्रो के साथ मिलकर उड़ीसा खाद्य धिकार अभियान का गठन किया जिसका मकसद खेती तथा खाद्य आपूर्ति पर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों बड़े पूंजीपति घरानों के खिलाफ मुहिम चलाना था। इसी दौर में, 2002 में उन्होंने दिल्ली में जन विज्ञान कांग्रेस आयोजित करने में भी भाग लिया। का. राजेन्द्र उनके मित्रो ने डी.एफ.आई.डी. (ब्रिटिश सरकार की सहायता एजेन्सी) के खिलाफ आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी जिसमें क्रांतिकारी संगठनों तथा `वामपार्टियों ने भाग लिया। उन्होंने विश्व बैंक द्वारा प्रोत पानी पंचायतों के खिलाफ मुहिम में उल्लेखनीय भूमिका निभायी तथा इनकी आड़ में सरकार की पानी के निजीकरण की मुहिम का पर्दाफाश किया।

इसी दौर में वे भारतीय कृषि, इसके बीजों की विविधता तथा सम्पत्ति को बचाने की जरूरत पर जोर देने लगे एवं बीजों, खाद कीटनाशकों के जरिए साम्राज्यवादी ताकतों द्वारा भारतीय खेती पर हमला कर उसे नियंत्रित करने की मुहिम के खिलाफ प्रचार में लग गये। अपने पिता श्री नातवर षडंगी के साथ मिलकर वे साम्राज्यवादी हमले का व्यावहारिक विरोध करने के लिए वैकल्पिक खेती की विधियों का प्रयोग करने लगे। देश भर में किसानों की आत्महत्याओं के लिए वे साम्राज्यवादपरस्त खेती के मॉडल को जिम्मेदार समझते थे तथा इसके लिए विदेशी कम्पनियों द्वारा बीजों पर नियंत्राण को प्रमुख हथियार समझते थे।

इसी क्रम में उन्होंने बहुराष्ट्रीय कम्पनियों तथा बड़े पूंजीपति घरानों द्वारा खनन विशालकाय उद्योगों की स्थापना के लिए आदिवासियों अन्य किसानों को विस्थापित किये जाने का विरोध करना शुरू किया। अखिल भारतीय किसान मजदूर सभा द्वारा भुवनेश्वर में अक्तूबर 2005 में आयोजित अखिल भारतीय आदिवासी सम्मेलन के आयोजन में उन्होंने काफी सहयोग किया। दक्षिण उड़ीसा में आदिवासियों में सक्रिय लोक संग्राम मंच को भी उनका सहयोग लगातार मिला।

कलिंगनगर में पुलिस द्वारा 14 आदिवासियों की हत्या के विरुद्ध समर्थन जुटाने में उन्होंने अथक परिश्रम किया तथा कलिंगनगर आन्दोलन के समर्थन मार्गदर्शन में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। 2 जनवरी, 2006 को कलिंगनगर के आदिवासियों पर पुलिस हमले के समय मारे गये एक पुलिसकर्मी की हत्या के षड्यंत्र के शिकायत केस में अन्य लोगों के साथ उन्हें भी आरोपित किया गया, परन्तु वे दृढ़ता के साथ आंदोलन का समर्थन करते रहे। जगतसिंहपुर जिले में पोस्को के खिलाफ आन्दोलन का उन्होंने शुरू से समर्थन किया तथा विभिन्न रूपों में इसमें भागीदारी की। मार्च 2007 में नंदीग्राम में सी.पी.एम. गुंडों द्वारा किसानों पर पाशविक हमले के खिलाफ कलिंगनगर के आंदोलन के एक प्रतिनिधिमण्डल को लेकर वे नंदीग्राम गये। खड़गपुर में सी.पी.एम. सरकार की पुलिस ने उन्हें अन्य नेताओं कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया। इसके बावजूद वे नंदीग्राम पहुंचे जहां संघर्षरत किसानों को उन्होंने उड़ीसा के विस्थापनविरोधी आंदोलनों की ओर से समर्थन दिया।

देश भर में सेजविरोधी विस्थापनविरोधी आंदोलनों को समन्वित करने तथा तेज करने के लिए भुवनेश्वर में एक अखिल भारतीय सम्मेलन का आयोजन किया गया जिसमें उन्होंने नेतृत्वकारी भूमिका निभायी। उन्होंने जबरन विस्थापन, सेज तथा जमीन हथियाने के खिलाफ संघर्षों का अखिल भारतीय मंच तैयार करने के लिए पहलकदमी ली। इन सभी आंदोलनों तथा इनका नेतृत्व समर्थन कर रही एवं साम्राज्यवादी हमले का विरोधी कर रही राजनैतिक ताकतों को एक मंच पर लाने के लिए उन्होंने सक्रिय प्रयास किये। अपने अथक प्रयासों तथा आंदोलनों को सैद्धांतिक व्यावहारिक योगदान के चलते का. राजेन्द्र षडंगी विस्थापनविरोधी आंदोलनों की अखिल भारतीय आवाज के रूप में उभर रहे थे।

का. राजेन्द्र गैरसरकारी संगठनों (एन.जी..) के कट्टर सिद्धांतनिष्ठ विरोधी थे। एन.जी.. के प्रभाव में आयोजित विश्व सोशल फोरम के खिलाफ उन्होंने भुवनेश्वर के बुद्धिजीवियो को गोलबंद किया। इस मुद्दे पर उनकी मजबूती ने उड़ीसा के विस्थापनविरोधी आंदोलनों से एन.जी.. को दूर रखने को संभव बनाया तथा एन.जी.. द्वारा पेश खतरों के प्रति जागरूकता बढ़ाने में उन्होंने योगदान किया।

का. राजेन्द्र के मातापिता जीवित हैं। उनकी दो बहनें तथा एक भाई है। का. राजेन्द्र की पत्नी का निधन 1996 में एक दुर्घटना में हो गया था। उनका एक 18 वर्षीय पुत्र है।

अपने संक्षिप्त राजनीतिक जीवन में उन्होंने विविध सवालों पर जनांदोलनों में उल्लेखनीय योगदान किया तथा अपनी छाप छोड़ी। का. राजेन्द्र के जीवन में तीन काल स्पष्ट देखे जा सकते हैं। पहला, जब वे नौकरी में थे, दूसरा जब वे जनता के सवालों से जुड़े तथा तीसरा जब वे कम्युनिस्ट क्रांतिकारी बने। पहले दौर में उनकी समझ उन आम बुद्धिजीवियों जैसी थी जो समझते हैं कि असली बात व्यवस्था की नहीं, बल्कि व्यक्तियों की है; यदि व्यक्ति अच्छा है तो वह जनपक्षीय काम कर सकता है। सरकारी नीतियों भ्रष्ट तत्वों से टकराव ने उनके नौकरशाहीकेन्द्रित भ्रम को दूर कर दिया। दूसरे दौर में उनका मुख्य जोर मयमवर्गीय बुद्धिजीवियों पर रहा जिनको गोलबंद कर वे सरकार पर जनविरोधी नीतियों से पीछे हटने का दबाव बनाने के लिए प्रयासरत रहे। इन आंदोलनों के क्रम में वे समझ गये कि साम्राज्यवाद के दलालों की सरकार से यह अपेक्षा व्यर्थ है। असली सवाल इस व्यवस्था को बदलने का है जिसे किसानों मजदूरों के क्रांतिकारी संघर्षों के जरिये ही नवजनवादी क्रांति को विजयी बनाकर ही पूरा किया जा सकता है। माक्र्सवादलेनिनवादमाओ विचारधारा के अध्ययन ने उन्हें संशोधनवादियों के भ्रामक माक्र्सवाद के प्रति सचेत किया, उनके दृष्टिकोण में गुणात्मक परिवर्तन किया तथा वे क्रांतिकारी पार्टी को सशक्त करने की जरूरत को समझने लगे। पिछले एक वर्ष से वे माक्र्सवादी साहित्य के गहन अध्ययन में जुट थे। `अच्छेनौकरशाह से जनवादी बुद्धिजीवी से कम्युनिस्ट क्रांतिकारी में विकास उनके वर्गीय दृष्टिकोण में विकास का भी क्रम था। इसमें नौकरशाह से जनवादी मध्यम वर्ग तथा उससे आगे बढ़कर मेहनतकशों का नजरिया अपनाने का भी क्रम था।

यदि इतने व्यापक परिवर्तन के बावजूद का. राजेन्द्र के जीवन तथा दृष्टिकोण में एक निरंतरता रही तो उसका कारण उनका जनपक्षीय चरित्र बौद्धिक ईमानदारी थी। उनमें अनुभवों से सीखने तथा इन सबकों पर दृढ़तापूर्वक खड़ा होने की विलक्षण क्षमता थी। यह क्षमता मध्यम वर्गीय बुद्धिजीवियों में कम ही मिलती है तथा जीवन के मध्यकाल में तो और भी कम। पिछले तीन वर्षों में उन्होंने अपना जीवन पूरी तरह बदल दिया था। वे आर्थिक उपार्जन के सभी उपाय छोड़कर पूरी तरह क्रान्ति के काम में लग गये थे। उनमें नेतृत्व की क्षमता भी काफी थी और इसका मुख्य स्रोत आंदोलन से जुड़े हर तरह के कार्य को समर्पण के साथ करने की उनकी तत्परता थी। काम को बिना समर्पण से करने के वे निर्मम आलोचक थे तथा इसके लिए वे खुद सबसे पहले प्रस्तुत रहते थे।

क्रांतिकारी कम्युनिस्ट में उनका विकास अनुकरणीय है। भारत में नवजनवादी क्रांति की विजय के लिए ऐसे समर्पित तथा क्षमतावान क्रांतिकारी बुद्धिजीवियों की बड़ी संख्या में जरूरत है। का. राजेन्द्र षडंगी को सी.पी.आई.(एमएल)–न्यू डेमोक्रेसी की श्रद्धांजलि!

स्मृति सभाएं

का. राजेन्द्र षडंगी को श्रद्धांजलि देने के लिए 2 अप्रैल, 2008 को भुवनेश्वर में श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया। लोहिया अकादमी हॉल में हुई सभा में बड़ी संख्या में राजनैतिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों तथा विस्थापनविरोधी आंदोलनों के नेताओं ने भाग लिया। वक्ताओं ने जनांदोलनों में उनके योगदान का स्मरण करते हुए कहा कि जनता के साम्राज्यवादविरोधी तथा विस्थापनविरोधी आंदोलनों को तेज करना ही उनको सच्ची श्रद्धांजलि है।

4 अप्रैल, ‘08 को दिल्ली में गांधी शांति प्रतिष्ठान में जनहस्तक्षेप ने का. राजेन्द्र षडंगी की स्मृति में सभा का आयोजन किया जिसमें क्रांतिकारी कार्यकर्ताओं तथा बुद्धिजीवियों ने भाग लिया। वक्ताओं ने विस्थापनविरोधी आंदोलनों में उनकी नेतृत्वकारी भूमिका का स्मरण करते हुए इन संघर्षों को समर्थन जारी रखने का निर्णय लिया।

6 अप्रैल, ‘08 को लोक संग्राम मंच ने ब्रह्मापुर में श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया जिसे लोक संग्राम मंच .आई.के.एम.एस. के नेताओं ने संबोधित किया।

का. राजेन्द्र की स्मृति में उनके पैतृक गांव नारिसो में 7 अप्रैल, ‘08 को सभा की गयी।

Leave a Reply

You must be logged in to post a comment.

You must be logged in to post a comment.