April 29, 2008...3:01 am

बढ़ती महंगाई, सरकार व शासक पार्टियां

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बजट भाषण में वित्तमंत्री चिदम्बरम ने स्वीकार किया था कि महंगाई की दर बढ़ने वाली है जब उन्होंने विश्व बाजार में खाद्य फसलों की बढ़ती कीमतों का जिक्र किया था। इस भाषण से यह संकेत मिला कि भारत सरकार महंगाई को `विश्व संकटके नाम लिख खुद को बचाने की तैयारी में है।

पिछले एक माह में तीव्र गति से महंगाई दर 7.4 प्रतिशत तक पहुंच गयी और सरकार ने `विश्व महंगाईतथा `हम महंगाई आयात कर रहे हैं‘ (कपिल सिब्बल, केन्द्रीय विज्ञान मंत्री) का ढिंढोरा पीटना शुरू किया। परन्तु, सरकारें जितना भी चाहें, जनता यह बात आसानी से समझ रही है कि सरकारों की नीतियां ही भारत को दुनिया भर में खाद्य फसलों की कमी का शिकार बना रही हैं तथा चौतरफे रूप से महंगाई बढ़ा रही हैं।

विश्व बाजार में जो भी चल रहा है, भारत में खाद्य फसलों की उपलब्धि के संकट का सीधा रिश्ता कृषि नीतियों से है। वैश्वीकरण के दौर में ठोस समझ रही है किसानों को खेती से हटाकर अन्य ग्रामीण कार्यों से जोड़ना है। इसी के अनुकूल तमाम नीतियां बनीं। बढ़ते आयात को मदद देने के लिए भारत में सार्वजनिक क्षेत्रा में खाद की कम्पनियां बंद कर दी गयीं। विश्व व्यापार संगठन की शर्तों के तहत गेहूं का आयात (कम से कम 3 प्रतिशत) शुरू हुआ, किसानों को हमारे जैसे देशों में दी जा रही सब्सिडी सहायता बंद की गई जबकि साम्राज्यवादी देशों में यह कायम रही, मंडियों में निजी कम्पनियों बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिए रास्ते खोल दिये गये, सरकारों द्वारा किसानों को दिया जा रहा न्यूनतम समर्थन मूल्य (एम.एस.पी.) लागत से कम रखी गई, राशन व्यवस्था इतनी संकुचित कर दी गई कि वह अप्रभावी हो गई, देश में खाद्य तेलों के उत्पादन को बहुत कम कर दिया गया ताकि आयात के रास्ते खुलें आदि। 1995 में विश्व व्यापार संगठन में भारत को शामिल करने के विरोधो के दौरान जितने सवाल उठाये गये थे वे तमाम अब सच्चाई के रूप में सामने रहे हैं। ये साम्राज्यवादपरस्त नीतियां ही भारत में मौजूदा कमरतोड़ महंगाई के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं; विश्व संकट का असर दूसरी बात है और अगर `महंगाई आयात हो रही हैतो यह इसलिए कि शासक ऐसा चाहते हैं।

मनमोहनचिदम्बरम को विश्व बैंक द्वारा सिखाये गये गणित के चलते सारे आंकड़े झूठों पर आधारित हैं और उनका गणित विज्ञान के नजरिये से गलत है। जिस गरीबी रेखा को लेकर राशन व्यवस्था लागू की जा रही है वह रेखा ही झूठों पर आधारित है। अब पता चला है कि महंगाई दर तय करने के आंकड़े भी झूठे हैं। इसकी गिनती करने के लिए सामानों का जो आधार चुना गया है (बास्केट) वह भी इस्तेमाल के अनुकूल नहीं है तथा अलगअलग सामानों को दिया जा रहा वजन भी गलत है। इसके अलावा महंगाई दर निकालने के लिए सामानों का थोक दर इस्तेमाल होता है जो यह तो बिल्कुल भी नहीं दिखाता कि खुदरा स्तर पर जनता उस सामान को किस कीमत पर खरीद रही है। 2005 में सरकार द्वारा एक कमेटी (टास्कफोर्स) का गठन किया गया था जिसने सुझाव दिया था कि महंगाई दर गिनने में आधार वर्ष 2004–’05 होना चाहिए (पर अभी भी 1993–’94 इस्तेमाल हो रहा है), जिन सामानों को बास्कट में शामिल किया गया है उससे दुगुनी को शामिल करना चाहिए (अभी 435 वस्तुओं का इस्तेमाल होता है) तथा किस सामान को कितना वजन दिया जाता है, इसे बदलना चाहिए। सरकार ने इन सुझावों को नजरंदाज किया है, जिससे तय है कि असली महंगाई दर 7.4 प्रतिशत से कहीं ऊंची है।

कालाबाजारी, जमाखोरी के सवाल पर केन्द्र सरकार ने प्रांतीय सरकारों के खिलाफ निशाना साधा - कानून हैं, पर सरकारें इस्तेमाल नहीं कर रहीं। पर, देश के लगभग सभी बड़े शहरों में बड़े पूंजीपति घरानों ने खुदरा व्यापार में प्रवेश किया है तथा `बिग एप्पल‘, `6 से 10′, `रिलायंस फ़्रेशआदि बाजार के मुकाबले सस्ते दामों पर परचून के सामान सब्जियां आदि बेच रहे हैं। जमाखोरी रोकने के कानून क्या कांग्रेस नेतृत्व वाले प्रांतों में ही इनके गोदामों के खिलाफ इस्तेमाल किये गये हैं? क्या राशन की दुकानों में जिनके मालिकों के इलाके के नेताओं से घनिष्ठ संबंध होते हैं कालाबाजारी रोकी जा रही है ।

संसद में बहस के एक दिन पूर्व 16 अप्रैल, 2008 को चिदम्बरम ने घोषणा की कि इस्पात सीमेंट की कम्पनियां `समूह‘ (कार्टेल) के तौर पर काम कर कीमतें बढ़ा रही हैं तथा उनके खिलाफ कदम उठाये जायेंगे। अगले दिन इस्पात मंत्री जे. प्रसाद ने बयान दिया कि इस्पात कम्पनियां ऐसा कुछ नहीं कर रही हैं। इस सवाल पर सरकार के अंदर इतना तीव्र विवाद हुआ कि कीमतों पर मंत्रिमंडल की एक उपकमेटी की बैठक को ही रद्द कर दिया गया !

विपक्षी पार्टियों के घडि़याली आंसू

संसद सत्र के शुरू होने के साथसाथ विपक्षी पार्टियों का महंगाईविरोधी गुस्सा बढ़ता गया है, हालांकि सारी पार्टियां उस किसी भी नीति का विरोध नहीं कर रही हैं जो महंगाई बढ़ा रही हैं तथा ही अपने प्रांतीय सरकारों द्वारा कोई और नीति अथवा कृषि के प्रति या खुदरा व्यापार के प्रति कोई और रवैया रख रही हैं। पहले भाजपा ने जगहजगह सभायें करने की घोषणा की, जबकि एन.डी.. के राज में भी तेल के दाम तीन बार बढ़ाये गये थे। फिर सरकारी वाम पार्टियां (जिन्होंने मार्च, ‘08 में अपनीअपनी पार्टी कांग्रेसों में महंगाईविरोधी आंदोलन लेने का फैसला किया था) यू.एन.पी.. (विशेषकर मुलायम सिंह) के साथ मिलकर रैलियां निकालने लगीं। परन्तु, जिस दिन संसद में बहस रखी गयी थी, उस दिन महंगाई पर बहस में भाग लेने के लिए केवल मुट्ठीभर सांसद मौजूद रहे इतनी हास्यास्पद स्थिति थी कि सी.पी.आई. को जनता के नाम माफी मांगना उचित लगा ! इस बहस में भी, खाद्य मंत्री शरद पवार ने महंगाई के लिए जनता को दोषी ठहराया जो कि खाने के सामान पर ज्यादा खर्च करने लगी है ! भारत में हालत यह है कि सरकार को कोई जरूरत नहीं महसूस हुई कि ऐसे जनविरोधी झूठों के प्रचारक को पद से हटाया जाये, और ही विपक्ष (जो कि संसद में मौजूद ही कम थी) को ऐसी कोई मांग करने की जरूरत लगी।

संशोधनवादियों की भूमिका

इस बहस में सी.पी.एम. के येचुरी ने कांग्रेसियों को यह बताना जरूरी समझा कि वे अपने नेता सोनिया गांधी के अनुसार नहीं चल रहे हैं, क्योंकि : माह पहले श्रीमती गांधी ने गेहूं पर `फारवर्ड टे्रडिंगपर पाबंदी लगाने का जिक्र किया था।

सी.पी.एम. ने `फारवर्ड टे्रडिंगपर रोक की मांग (जो एक जरूरी मांग तो है क्योंकि इसके जरिये कल के दाम को तय करके कम्पनियां आज के सामान के दाम बढ़वा देती हैं) को महंगाई के विरुद्ध प्रचार में मुख्य मांग का दर्जा दिया है, कि कृषि पर मार (जिस नीति में वह शामिल है) तथा उपजाऊ भूमि को किसानों से छीनने को। सी.पी.एम. का मांगपत्र आवश्यक सामानों की सूचि बढ़ाओ, डीजलपेट्रोल के दाम घटाओ, राशनव्यवस्था व्यापक करो, जमाखोरी के खिलाफ कानून रद्द करो आदि तो शासकों की साम्राज्यवादपरस्त नीतियों का जिक्र करता है और ही खाद्य फसलों के पैदावार पर हमलों का, जो कि भारत में महंगाई के मुख्य सवाल हैं।

जमाखोरी के खिलाफ तथा कानून राशन व्यवस्था की व्यापकता मांग करती सी.पी.एम. यह बताना तो भूल ही गयी कि बांकुरा मालदा (. बंगाल) में उन्होंने राशन व्यवस्था में कालाबाजारी करते सी.पी.एम. काडरों के खिलाफ क्या कदम उठाये हैं। इन दोनों शहरों में खाद्य दंगे 2007 के अंतिम महीनों में हुए थे।

भूखी जनता : सरकारी नीतियों का आधार दिखाते खाद्यमंत्री के बयान

शरद पवार के बयान बाद में सांसद स्वामीनाथन द्वारा थोड़े मीठे शब्दों में पत्राकारों के सामने उन्हीं बातों को दोहराने पर सरकार को कोई आपत्ति नह है। सरकार क्या, सारी संसदीय पार्टियां जानती हैं कि 1947 से अब तक खाद्य सामग्री में प्रचुरता का सवाल जनता के एक बड़े भाग के भूखे रहने के साथ जुड़ा हुआ है। एफ... के अनुसार भारत की 1/5 जनता गरीबी के कारण कुपोषण से ग्रस्त है। 2004–’05 के राष्ट्रीय सैम्पल सर्वे ने बताया था कि 77 प्रतिशत जनता प्रतिदिन 20 रुपये से कम खर्च कर पाती है। असल में विश्व व्यापार संगठन का दस्तावेज भी बहुत स्पष्ट रूप से कहता है कि बहुत गरीब लोगों की खाद्य जरूरतों का सवाल राशन व्यवस्था अनुदानों से ही हल होगा।

भारत के राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (सरकार का 5000 करोड़ का `फ्लैगशिप कार्यक्रम‘) के तहत घोषणा की गई थी कि 2012 तक `सबके लिए खाद्य सुरक्षाहो जायेगी। बयानों में कहा गया था कि गेहूं और चावल के उत्पादन में ठहराव को तोड़ते हुए चावल का उत्पादन 10 मिलियन टन, गेहूं का 8 मिलियन टन दालों का 2 मिलियन टन बढ़ाया जायेगा ताकि 2012 तक खाद्य फसलों का उत्पादन 230 मिलियन टन हो।

अब सांसद स्वामीनाथन ने अर्ज किया है कि पवार ठीक ही बता रहे हैं, यह सब आंकड़े तो गड़बड़ा जायेंगे। कारण? सरकार पहले ही घोषित कर चुकी है कि उत्पादन मांग से 4.15 मिलियन टन कम है। परन्तु अब यह तथ्य लाया जा रहा है कि कमी इसलिए आएगी क्योंकि 16,000 करोड़ रुपये रोजगार गारंटी योजना द्वारा जनता तक पहुंचेगा। (बेरोजगारों में परिवार के केवल एक सदस्य को केवल 100 दिन का रोजगार मिलेगा, वह भी न्यूनतम वेतन से कम पर !) सांसद महोदय ( सरकार) का कहना है कि गरीब अपने आमदनी का 60 प्रतिशत खाद्य सामग्री पर खर्च करते हैं, यानी 8,000 करोड़ रुपये से धिक और इस पर खर्च होगा। इससे खाद्य जरूरतों के आंकड़े `गड़बड़ा जायेंगे आंकड़े तो इन लोगों के भूखे रहने पर आधारित थे !

इसके अलावा पवार साहब कहते हैं कि आंकड़े यूं भी गड़बड़ायेंगे क्योंकि `खाने के तरीके बदलरहे हैं तथा दक्षिण के लोग भी रोटी खा रहे हैं। फिर चावल संकट क्यों? ऐसे सवालों पर मंत्री दिमाग नहीं लगाते ! योजना आयोग की सदस्या सी.पी.एम. समर्थक जयती घोष ने बताया है कि पशु भी मोटा अनाज खाते हैं और ऐसे अनाज का भी उत्पादन करना पड़ता है तथा इसके आंकड़े जरूरतों में जोड़ने के कारण सारा गणित गड़बड़ा जाता है। शायद यह माना जा सकता है कि यह सब कोई नई बातें या अनजान बातें नहीं हैं, इसलिए स्पष्ट है कि सरकार के आंकड़े गड़बड़ाये केवल इसलिए हैं क्योंकि सरकार निराधार आंकड़े घोषित करती है।

सारे सवालों के साथ जुड़ा कालाबाजारी का सवाल भी है। कई बार चर्चा उठी है कि गेहूं का आयात तभी क्यों सूझता है जब विश्व बाजार में कीमतें बढ़ती हैं? किसी सरकार ने इसका जवाब नहीं दिया।

सरकार ने कभी यह नहीं स्पष्ट किया और ही विपक्ष ने यह पूछा कि खाद्य सुरक्षा मिशन खाद्य फसलों का उत्पादन बढ़ायेगी कैसे जबकि कृषि को योजनापूर्वक मारा जा रहा