बढ़ते खाद्य संकट तथा बढ़ती कीमतों की मुख्य दोषी केन्द्र व राज्य सरकारों द्वारा लागू की जा रही नयी आर्थिक नीतियां ही है, भले ही शासक दल इस दोष को अन्यथा मोड़ने का प्रयास करें। सरकारी आंकड़े स्वयं इसका सबूत है।
वित्तमंत्री श्री चिदम्बरम ने बेशर्मी से इस महंगाई के लिए अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में गेहूँ की बढ़ी हुई कीमत 2200 रुपये कुन्तल पर दोष मढ़ा है और बजट भाषण में कहा कि अन्तर्राष्ट्रीय बाजारों में गेहूँ के दाम 88 फीसदी बढ़ गये है और चावल के दाम 15 फीसदी। वास्तव में उन्हें सबसे पहले इस बात का जवाब देना चाहिए था कि क्यों भारत जैसा कृषि प्रधान देश गेहूँ के लिए विदेशों से आयात पर निर्भर हो गया जबकि भारत को अनाज का निर्यातक होना चाहिये। विश्व व्यापार संगठन व विश्व बैंक के निर्देशों पर लागू की जा रही नयी आर्थिक नीति इसकी अनुमति नहीं देती। वे भारत में खेती को और असुरक्षित बनाना चाहते है। इससे किसानों की जमीन से बेदखली तेजी से होगी तथा साम्राज्यवादियों व दलाल शासक वर्गों द्वारा प्राकृतिक संसाधनों तथा सस्ते श्रम का शोषण तेज हो सकेगा।
एक ओर लोग बेरोजगार और भूखे है, दूसरी ओर सरकार उनकी खेती की जमीनें बड़े पैमाने पर व्यावसायिक एवं कारपोरेट गिद्धों को विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाने, उद्योग लगाने, शहरी आवास योजनाओं, व्यावसायिक इलाकों का निर्माण करने, गंगा एक्सप्रेस–वे जैसी योजनाएं लागू करने तथा खेती में व्यावसायिक खेती व बायोडीजल के लिए कारपोरेट फार्मिंग कराने के लिए दे रही है। इन जमीनों को ये घराने सस्ते दाम पर खरीदकर, मूल्य वृद्धि का लाभ उठाकर महंगा बेचकर भारी मुनाफा कमाते है जिसे भारत सरकार विकास दर में वृद्धि गिनती है।
यही नहीं, उपरोक्त सभी कामों के लिए सरकार उद्योगपतियों को करों में भारी छूट दे रही है। इन्हें सफल करने के लिए सरकार का व बकों का पैसा लगा रही है, जबकि खेती की लागत के तमाम सामानों, विशेषकर डीजल, आदि पर भारी कर लागू है और अन्य सुविधाओं में कोई छूट नहीं है। आर्थिक संकट के नाम पर खाद पर सब्सिडी, राशन व्यवस्था, खाद्य सुरक्षा आदि पर से सरकारी खर्च लगातार घटाया जा रहा है। परिणाम यह है कि अनाज का उत्पादन बढ़ना बंद हो गया है और अनाज पैदा करने वाला क्षेत्राफल लगातार घट रहा है।
पैदावार व क्षेत्रफल
जहां 1999–2000 में 452 लाख हेक्टेयर जमीन पर धान उगता था, 2005–’06 में यह घटकर 435 लाख हे. रह गया। इसी दौर में गेहूँ का क्षेत्राफल 275 लाख हे. से घटकर 266 लाख हे. रह गया। 1990 के बाद से ही अनाज के उत्पादन की वृद्धि दर जनसंख्या वृद्धि दर से कम हो गई है। इस दौर में गेहूँ का सबसे अधिक उत्पादन वर्ष 1999–2000 में 764 लाख टन हुआ था (जो 2005–’06 में 695 लाख टन रहा) और धान का सबसे अधिक उत्पादन 2001–’02 में 933 लाख टन हुआ (जो 2005–’06 में 910 लाख टन रहा)। इसी तरह दालों का उत्पादन 1990–’91 में 143 लाख टन से बढ़कर 2003–2004 में 149 लाख टन हुआ और 2005–’06 में फिर से घटकर 131 लाख टन रह गया। गौर करने की बात यह है कि 1960–’61 में भी दालों का उत्पादन 127 लाख टन था।
‘90 के दशक में खाद्य का उत्पादन लगभग 1.8 फीसदी प्रतिवर्ष की दर से बढ़ा और अब पिछले 7 साल से लगभग 2130 लाख टन पर स्थाई है (यह 2005–’06 में 2080 लाख टन रहा)। इसी तरह तालिका से स्पष्ट है कि मुख्य फसलों के क्षेत्राफल में 1990–’91 के बाद से यानी नई आर्थिक नीतियों के लागू होने के दौर में क्षेत्रफल घटता रहा है। इस दशक में गेहूँ और धान, दोनों की खेती के क्षेत्रफल भी घट गए है। जब सरकार योजनाबद्ध ढंग से अनाज की पैदावार घटा रही है तो विदेशों पर निर्भरता तो बढ़ेगी ही। इसके बावजूद श्री चिदम्बरम खेती में 2.6 फीसदी वृद्धि का दावा कर रहे ह। जाहिर है कि यह वृद्धि अनाज के उत्पादन से नहीं, ग्रामीण अंचलों में अन्य व्यावसायिक कामों के कारण होनी है।
अनाज की पैदावार के घटने के और भी कारण है। खेती की सुविधाओं की बदहाली के कारण अन्य देशों के मुकाबले भारत में खेती की उत्पादकता बेहद कम है। उदाहरण के लिए भारत में प्रति हेक्टेयर जमीन पर औसत गेहूँ का उत्पादन 27.1 कुन्तल होता है जबकि चीन में 42.5 कुन्तल, इंग्लैण्ड में 77.7 और फ़्रांस में 75.8 कुन्तल होता है। इसी तरह धान की प्रति हेक्टेयर पैदावार भारत में 29 कुन्तल है जबकि जापान में 64.2 कुन्तल, कोरिया में 67.3 कुन्तल, अमेरिका में 78.3 कुन्तल और मिस्र में 98 कुन्तल है। तिल्हन की पैदावार भी भारत में प्रति हेक्टेयर मात्रा 8.6 कुन्तल है जबकि ब्राजील में यह 24.8 कुन्तल है, अमेरिका में 26.1 और जर्मनी में 40.7 कुन्तल है।
कम पैदावार के अन्य कारण
इसके कई कारण है; जैसे समय पर पर्याप्त सिंचाई न मिलना, उचित गुणवत्ता के खाद, बीज, कीटनाशक दवाओं आदि का समय पर न मिलना, जो कि इनके महंगे होने के कारण और सरकारी व्यवस्था के अभाव में निजी ठेकेदारों का वर्चस्व, मिलावट आदि होने के कारण होता है। सरकारी सुविधाओं के और कम किये जाने से फसल बेचने की सुरक्षा तथा तकनीकी सहयोग व्यवस्था भी चौपट है और इसका भी असर दिखता है। किसानों की पैदावार संकटग्रस्त है और बचत अथवा आमदनी होने के स्थान पर वे कर्ज जाल में फंसते गये है और जमीनों से बेदखल होकर खेतिहर मजदूर बनते गए है। इस संकट को हल करने और खेती को सुरक्षित करने की जगह सरकार स्वयं किसानों को व्यावसायिक उपयोग के लिए जमीन बेचने के लिए प्रोत्साहित कर रही है।
सिंचाई चौपट
इनमें से सिंचाई की समस्या एक बहुत भयानक समस्या बन कर उभर रही है। कहा जा रहा है कि भूगर्भ से ज्यादा पानी खींचने के कारण जल स्तर गिर गया है। बुन्देलखण्ड, विदर्भ, आंध्र, कर्नाटक, पंजाब सभी जगह यही समस्या बताई जा रही है। इसका समाधान है गहरे तालाबों की खुदाई और नहरों द्वारा सिंचाई व्यवस्था, जिसे सरकार ने लम्बे समय से नजरंदाज कर रखा है। तालाबों की 3 मीटर गहरी खुदाई का आदेश होता है, पर आम तौर पर केवल घास छील कर कार्य पूरा घोषित कर दिया जाता है।
सिंचाई के आंकड़ों पर नजर डालें तो मामला स्पष्ट हो जाता है। यद्यपि खुद सरकारी आंकड़ों में काफी विरोधाभास है, कृषि मंत्रालय के एक आंकड़े के अनुसार भारत में कुल बोई जाने वाली 14.11 करोड़ हेक्टेयर जमीन में से वर्ष 2000–’01 तक मात्रा 5.47 करोड़ हैक्टेयर यानी 38.75 फीसदी सिंचित थी। एक अन्य आंकड़े के अनुसार लगभग 60 फीसदी जमीन की सिंचाई का प्रबन्ध 2002, नवीं योजना के अन्त तक किया जा चुका था। इसमें से धान की खेती की लगभग 53 फीसदी सिंचित है और गेहूँ की लगभग 88 फीसदी और पिछले 10 सालों से बिना किसी विकास के यही स्थिति बनी हुई है। आठवी योजना के अंत तक के आंकड़े बताते है कि कुल सिंचित क्षेत्रफल में से 47.3 फीसदी कुंओं और ट्यूबवेलों द्वारा सिंचित है और जमीन की सतह पर एकत्रा पानी, यानी तालाबों, नहरों व नदियों से शेष क्षेत्र सिंचित है। कुल सिंचित क्षेत्र में से जमीन के नीचे से पानी खींच कर सिंचाई की व्यवस्था सन् 1952–’56 (पहली पंचवर्षीय योजना) में 29 फीसदी थी जबकि आठवीं योजना में यह बढ़कर 47.3 फीसदी हो गई। इस सारी सिंचाई व्यवस्था में से सिंचित जमीन के भी काफी बड़े हिस्से में सिंचाई का काम पूरा नहीं हो पाता जो सिंचाई बंदोबस्त के खराब रखरखाव के कारण है।
इस सब से स्पष्ट है कि सरकार सिंचाई साधनों को सुधारने के पक्ष में नही है तथा सिंचाई में जो भी सुधार हुआ है उसमें से ज्यादातर ट्यूबवेलों के मायम से किसानों के निजी प्रयासों से हुआ है। भारी वर्षा वाले देश में, जहां धरती की सतह पर पानी के भंडारण तालाब आदि के विकास पर मुख्य जोर होना चाहिए था, वहां सरकार ने जमीन के नीचे से पानी खिंचने पर जोर दिया है। अब वह जल स्तर नीचे जाने का रोना रो रही है। इतने पर भी तालाबों, नहरों की खुदाई पर जोर देने की जगह पिछली दो पंचवर्षीय योजनाओं से सरकार का मुख्य जोर ड्रिप व टपक सिंचाई पर है जो बड़ी कम्पनियों को लाभ पहुंचाएगी और किसानों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ लाद देगी। इस बजट में कहा गया है कि इसके अंतर्गत 5,48,000 हे. भूमि लाई जाएगी।
इस दौरान पुरानी बड़ी सिंचाई परियोजनाओं में एक नयी समस्या यह आ गई है कि इनमें से कई योजनाओं का पानी खेती की जगह अब औद्योगिक व शहरी इस्तेमाल के लिए दिया जा रहा है। ये योजनाएं बड़े पैमाने पर विश्व बैंक के निर्देशन में व शर्तानुसार लागू की जा रही ह। इस बजट में भी कहा गया है कि विश्व बैंक कर्नाटक व आंध्र सरकारों को 9 लाख हे. भूमि की सिंचाई के लायक नहरों व तालाबों की मरम्मत के लिए पैसा देगा।
ऐसे में अनाज के संकट की भयावह स्थिति का पता बढ़ते कुपोषण, टी0बी0 व खून की कमी आदि जैसी बीमारियों के बढ़ने, भुखमरी, ग्रामीण इलाकों से पलायन, कर्जदारी, आत्महत्याओं आदि से चलता है। नई आर्थिक नीतियों के अन्तर्गत प्रति व्यक्ति खाद्या की उपलबता 1991 में 510 ग्राम से घटकर 2001 में 416 ग्राम रह गयी और दालों की उपलबता 1951 में 60.7 ग्राम से घटकर 2001 में 30 ग्राम रह गयी है।
मण्डियों में विदेशी कम्पनियों का वर्चस्व, राशन का अभाव
इस संदर्भ में किसानों के आम संकट को इस तरह बढ़ाने के अलावा नयी आर्थिक नीतियों ने कुछ और विशेष योगदान भी किया है। यह है मण्डियों में निजी क्षेत्र की कम्पनियों का प्रवेश कराकर, सरकारी न्यूनतम समर्थन मूल्य व सरकारी खरीद की व्यवस्था चौपट करना और राशन व्यवस्था को लगभग समाप्त करना।
राशन व्यवस्था के आंकड़े बताते है (भ्रष्टाचार और गरीबी रेखा की समस्याओं को अगर छोड़ भी दिया जाए) कि 1991 में 208 लाख टन अनाज राशन में बंटा था। इसके बाद यह लगातार कम किया जाता रहा और सन् 2000 में मात्रा 130 लाख टन बंटा। चुनाव की तैयारी में 2003 में फिर एकाएक 225 लाख टन राशन बांटा गया। आंकड़े दिखाते है कि 1951 से सरकारें कुल उपलब अनाज का 10 फीसदी से ज्यादा राशन की दुकानों में बांटती रही हैं। केवल दो ऐसे दौर आए है जब सरकार ने उपलब राशन में से 10 फीसदी से कम राशन में बांटा है। पहला था वर्ष 1953 से 1963 के बीच और दूसरा है 1999 से 2002 के बीच।
इसी दौर में सरकारी खरीद की स्थिति भी काफी खराब हुई है, खास तौर पर गेहूँ की। वर्ष 2001–’02 में सरकार ने 206.3 लाख टन गेहूँ खरीदा था, पर 2005–’06 में केवल 147.9 लाख टन खरीदा। यही वह दौर है जिसमें बड़ी–बड़ी विदेशी कम्पनियों, आई0टी0सी0, कारगिल आदि ने भारत की मण्डियों में कांटे लगाकर किसानों से सीधी खरीद की है। इसी दौर में सरकार ने गेहूँ व चावल का निर्यात भी किया, और यही समय है जब भुखमरी, कुपोषण आदि की समस्याएं भयानक रूप लेकर सामने आई है।
बाजार में आपूर्ति की कमी और दामों का बढ़ना कम पैदावार और विदेशी कम्पनियों द्वारा मंडियों से अनाज खरीद कर जमाखोरी करने से उत्पन्न हुई है। यह सस्ता अनाज विदेशी कम्पनियों के फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री में प्रयुक्त होता है जिसके विकास के आधार पर मनमोहन सरकार खेती में विकास होने का दावा कर रही है। इतने संकट के बावजूद इस वर्ष का आर्थिक सर्वेक्षण ग्रीनफील्ड खेती के नाम पर 100 फीसदी विदेशी पूंजी निवेश का सुझाव देता है और फसलों की बीमा के लिए 51 फीसदी विदेशी पूंजी की सिफारिश करता है। इससे कम्पनियों द्वारा फसलों की खरीद पर पकड़ और खाद्य संकट और बढ़ेगा।
वैसे अभी उनका एजेन्डा पूरा नहीं हुआ है। वे खेती का इससे भी ज्यादा `विकास‘ करना चाहते है। कृषि मंत्री श्री शरद पवार ने घोषणा की है कि सन् 2017 तक परिवहन के तेल का कुल 10 फीसदी हिस्सा वनस्पति स्रोतों से आएगा और इसके लिए एक नयी बायो फ्यूल पॉलिसी तैयार हो रही है। इसके अंतर्गत 120 लाख हेक्टेयर जमीन, यानी वर्तमान खेती की लगभग 8.5 फीसदी पर बायो फ्यूल (डीजल–पेट्रोल आदि) तैयार होगा।
सरकारी तर्क
सरकार घडि़याली आंसू बहाकर मौसम (कम वर्षा), खेती में कम निवेश (जिसके लिए वह खुद जिम्मेदार है) तथा `बीज पुराने पड़ गए है‘ को दोष देकर समझती है लोग संतुष्ट हो गए है। साथ ही धोखा देने के लिए कहती है कि खेती में बहुत विकास हो रहा है। जहां 1950 के दशक में सकल घरेलू उत्पाद में खेती का योगदान 50 फीसदी से ज्यादा था जो 2007–’08 में घटकर मात्रा 17.5 फीसदी रह गया है परंतु खेती पर निर्भर जनता के प्रतिशत में कमी अपेक्षाकृत काफी कम है।
सीपीएम, सीपीआई, सपा, बसपा और भाजपा जैसे सभी शासक दल विदेशी कम्पनियों का समर्थन कर रहे है। सीपीएम का कहना है कि राज्यों को राशन कम दिया गया, आयात पर टैक्स ज्यादा है, खेती में अग्रिम व्यापार (फारवर्ड ट्रेडिंग), जमाखोरी व कालाबाजारी आदि इस संकट के लिए जिम्मेदार है। पर 4 सालों से तो वे खुद इनको लागू करा रहे थे। और, इसका सबसे ज्यादा लाभ जिसे हो रहा है, विदेशी कम्पनियाँ, उनका कोई विरोध उसने नहीं किया।
विपक्षी एनडीए भी राज्यों के साथ सौतेला व्यवहार और समय रहते प्रबंध न करने की बात कहकर चुनावी रूप से इस सवाल को भुनाने की तैयारी में है। पर सच यही है कि वह भी समस्या के प्रमुख पहलु, घटते उत्पादन और बढ़ते विदेशी हस्तक्षेप, से ध्यान हटाना चाहते है।
अद्र्धसामंती पिछड़ापन और साम्राज्यवादी `आधुनिकीकरण`
यह सारा संकट इसलिए भी ज्यादा भयानक है और आम लोग इसके विरुद्ध लड़ पाने में इसलिए भी कमजोर है क्योंकि ग्रामीण भारत में ये नीतियां गांव की एक विशिष्ट मौलिक पृष्ठभूमि पर थोपी गई है। यह है खेती की जमीन पर जमींदारों का वर्चस्व जो उत्पादन करने वाले किसानों की मेहनत के फल का महत्वपूर्ण हिस्सा पहले ही हड़प लेते है। किसान पैसे के अभाव में लागत की समस्या से ग्रसित रहते है और इनके वर्चस्व के कारण ग्रामीण अंचल में उत्पादन की पिछड़ी व्यवस्था बनी रहती है।
बड़े सामंतों के वर्चस्व में साम्राज्यवादियों व दलाल पूंजीपतियों की कम्पनियों के आधुनिक रूप, जैसे आधुनिक खाद, बीज, कीटनाशक दवा, ट्रैक्टर, हारवेस्टर जैसी मशीनें, आधुनिक सिंचाई व्यवस्था, बैंक कर्ज, आदि सभी में नयी तकनीक के माध्यम से फसल की पैदावार से होने वाले आर्थिक लाभ का बड़ा हिस्सा, खेती शुरू होने के पहले ही कम्पनी, उसके दलाल तथा जमींदार लूट लेते है; कुछ लागत के महंगे दाम द्वारा और कुछ सामंती लूट तथा कर्ज द्वारा। इस साम्राज्यवादी आधुनिकीकरण का सबसे ताजा हमला खेती की जमीन पर विशेष आर्थिक क्षेत्रो का निर्माण, खेती की जमीन पर उद्योग लगाना तथा उस पर शहरीकरण करना है। इसने खाद्य संकट को और गहरा किया है।
खाद्यन्न उत्पादन (लाख टन में ) व क्षेत्रफल (लाख हेक्टेयर में)
|
|
1960–’61 |
1970–’71 |
1980–’81 |
1990–’91 |
1999–’00 |
2000–’01 |
2001–’02 |
2002–’03 |
2003–’04 |
2004–’05 |
2005–’06 |
|
खाद्यन्न (उत्पादन) |
820 |
1084 |
1296 |
1764 |
2098 |
1968 |
2129 |
1748 |
2132 |
1984 |
2083 |
|
(क्षेत्रफल) |
1156 |
1243 |
1267 |
1278 |
1231 |
1210 |
1229 |
1139 |
1234 |
1201 |
1219 |
|
अनाज (उत्पादन) |
693 |
966 |
1190 |
1621 |
1964 |
1857 |
1995 |
1636 |
1983 |
1852 |
1952 |
|
(क्षेत्रफल) |
920 |
1018 |
1042 |
1032 |
1020 |
1007 |
1008 |
934 |
1000 |
973 |
995 |
|
दाल (उत्पादन) |
127 |
118 |
106 |
143 |
134 |
110 |
133 |
111 |
149 |
131 |
131 |
|
(क्षेत्रफल) |
236 |
226 |
225 |
247 |
211 |
203 |
220 |
205 |
235 |
228 |
224 |
|
चावल (उत्पादन) |
346 |
422 |
536 |
743 |
897 |
850 |
933 |
718 |
885 |
831 |
910 |
|
(क्षेत्रफल) |
341 |
376 |
401 |
427 |
452 |
447 |
449 |
412 |
426 |
419 |
435 |
|
गेहूँ (उत्पादन) |
110 |
238 |
363 |
551 |
764 |
697 |
728 |
658 |
722 |
686 |
695 |
|
(क्षेत्रफल) |
129 |
182 |
223 |
242 |
275 |
257 |
263 |
252 |
266 |
264 |
266 |
|
ज्वार (उत्पादन) |
98 |
81 |
104 |
117 |
87 |
75 |
76 |
70 |
67 |
72 |
80 |
|
(क्षेत्रफल) |
184 |
174 |
158 |
144 |
102 |
99 |
98 |
93 |
93 |
91 |
88 |
|
मक्का (उत्पादन) |
41 |
75 |
70 |
90 |
115 |
120 |
132 |
112 |
150 |
142 |
151 |
|
(क्षेत्रफल) |
44 |
58 |
60 |
59 |
64 |
66 |
66 |
66 |
73 |
74 |
77 |
|
बाजरा (उत्पादन) |
33 |
80 |
53 |
69 |
58 |
68 |
83 |
47 |
121 |
79 |
77 |
|
(क्षेत्रफल) |
115 |
129 |
117 |
105 |
89 |
98 |
95 |
77 |
106 |
92 |
96 |
|
चना (उत्पादन) |
63 |
52 |
43 |
54 |
51 |
39 |
55 |
42 |
57 |
55 |
56 |
|
(क्षेत्रफल) |
93 |
78 |
66 |
75 |
61 |
52 |
64 |
59 |
70 |
67 |
71 |
|
तूर (उत्पादन) |
21 |
19 |
20 |
24 |
27 |
22 |
23 |
22 |
24 |
23 |
26 |
|
(क्षेत्रफल) |
24 |
27 |
28 |
36 |
34 |
36 |
33 |
34 |
35 |
35 |
36 |