लेबनान की घटनायें मध्यपूर्व की सामरिक स्थिति में बदलाव को मजबूती से सामने लाती रही हैं। साथ ही ये सामने लाती रही हैं मयपूर्व में अमेरिकी प्रशासन के प्रयासों की विफलता। 2006 में इजराईल द्वारा लेबनान पर हमले को नये मयपूर्व की प्रसव वेदना बताने वाली अमेरिकी विदेश सचिव हिजबुल्ला के हाथों इजराईल की पराजय के बाद युद्धविराम के प्रयासों का समर्थन करती नजर आईं। 2006 के इजराईल–हिजबुल्ला युद्ध ने अपनी इच्छा का नया मयपूर्व बनाने के अमेरिकी प्रयासों को करारा झटका दिया। इराकी जनता के गौरवपूर्ण राष्ट्रीय युद्ध की पृष्ठभूमि में इजराईल के खिलाफ हिजबुल्ला की सफलता ने अमेरिकी साम्राज्यवाद की ताकत की सीमा को विश्व जनता के सामने नंगा कर दिया। नया मध्यपूर्व बनाना तो दूर, अमेरिका को पुराना मध्यपूर्व बचाने के लिए जुटना पड़ा।
2008 की गर्मियों में एक बार फिर अमेरिकी विदेश सचिव कोंडालीजा राईस ने बेहद गर्म मौसम की भविष्यवाणी कर डाली। उनकी उक्ति सही साबित भी हुई लेकिन दो साल पहले की तरह एक बार फिर इस तरह से जो अमेरिका की इच्छा के विपरीत थी। 12 मई को जब इजराईली संसद के सामने अमेरिकी राष्ट्रपति बुश हिजबुल्ला तथा फिलीस्तीनी संगठन हमस के खिलाफ विष–वमन करते हुए उन्हें आतंकवादी करार दे रहे थे, उसी समय कतार में अमेरिका–परस्त लेबनान सरकार के नेता हिजबुल्ला के साथ शांति वार्ता में लगे थे। इस शांति वार्ता में अमेरिका–परस्त सिनोरिया सरकार को हिजबुल्ला की शत्र्तों को मानना पड़ा। सिनोरिया सरकार की हठार्मिता के चलते पिछले डेढ़ साल से लेबनान में गतिरोध बना हुआ था तथा पिछले छह माह से अधिक से राष्ट्रपति की कुर्सी खाली पड़ी थी। इस वर्ष की गर्मियां काफी गर्म रहीं लेकिन यह गर्मी अमेरिका–परस्त ताकतों को काफी झुलसा गयी। कतार समझौते के बाद राष्ट्रपति के चुनाव के समय ईरान, सीरिया तथा अन्य अरब देशों के प्रतिनिधियों के साथ अमेरिका समेत अन्य पश्चिमी देशों के प्रतिनिधि भी मौजूद थे।
2006 में इजराईली हमले के दौरान, जिसमें एक हजार से अधिक लेबनानी नागरिकों की जान गई, इजराईल ने लेबनान की अधिरचना को तहस–नहस कर दिया तथा अस्पतालों, स्कूलों, अनाथगृहों, वृद्धाओं को भी बमबारी से नहीं बख्शा, लेबनान सरकार मूकदर्शक बनी रही। युद्ध के बाद इजराईल के बजाये वह इजराईली हमले का मुंहतोड़ जवाब देने वाले हिजबुल्ला के खिलाफ लग गई तथा इजराईल व अमेरिका की तर्ज पर हिजबुल्ला के निशस्त्रिकरण की मांग उठाने लगी जिसने इजराईल से हमले से लेबनान की हिफाजत की थी। इस पृष्ठभूमि में हिजबुल्ला ने सरकार में एक तिहाई भागीदारी की मांग की। संसद में उनके समर्थकों को इससे अधिक प्रतिनिधित्व हासिल है। सरकार द्वारा हिजबुल्ला तथा अन्य ताकतों की जायज मांगों से इंकार कर दिये जाने के बाद लेबनान में हुए व्यापक प्रदर्शनों ने साबित कर दिया कि लेबनान की जनता का बड़ा हिस्सा हिजबुल्ला के पक्ष के समर्थन में है। सिनोरिया सरकार की हठार्मिता के चलते लेबनान में राष्ट्रपति का चुनाव नहीं हो सका क्योंकि शासक मोर्चे के पास पर्याप्त बहुमत नहीं था। लेबनान में शासन प्रणाली तैफ समझौते के अनुसार है जो दरअसल लेबनान के विभिन्न समुदायों के बीच सत्ता में हिस्सेदारी का समझौता है। संसद में सीटों का बंटवारा भी जनसंख्या के आधार पर न होकर विभि समुदायों के बीच सत्ता में हिस्सेदारी के आधार पर है।
परन्तु अमेरिका की शह पर सिनोरिया सरकार ने तैफ समझौते की भावना के विरुद्ध सत्ता पर एकाधिकार के प्रयास शुरू किये। इसके क्रम में 6 मई, ‘08 को सिनोरिया सरकार ने हिजबुल्ला के दूर संचार प्रणाली पर कब्जा कर लिया तथा बेरुत हवाई अड्डे के सुरक्षा निदेशक को हिजबुल्ला से सहानुभूति रखने के आरोप में हटा दिया। हिजबुल्ला की दूर संचार प्रणाली पर हमले का मकसद उसकी सैन्य क्षमता कुंठित करना था। सिनोरिया सरकार के इस हमले को 8 मई, ‘08 को हिजबुल्ला के नेता हसन नसरल्ला ने युद्ध की घोषणा करार दिया।
9 मई का दिन लेबनान की राजनीति में बहुत महत्वपूर्ण साबित हुआ। हिजबुल्ला के लड़ाकुओं ने सिनोरिया सरकार के सहयोगियों के दस्तों को बेरुत शहर से खदेड़ दिया। साद हरीरी के अखबार तथा टी.वी. चैनल के कार्यालय को बंद कर दिया। कुछ घंटों में ही सरकार से जुड़ी पार्टियों के सशस्त्रा दस्तों ने घुटने टेक दिये। बेरुत के साथ ही लेबनान के अन्य शहरों में भी सरकार समर्थक तथा विरोधी दस्तों के बीच झड़पें भड़क गईं। त्रिपोली तथा लेबनान के उत्तरी हिस्सों में हिजबुल्ला व उनके सहयोगियों ने सरकार समर्थकों को पराजित कर दिया। सिनोरिया सरकार द्वारा शुरू किया गया युद्ध कुछ दिनों में ही तय हो गया। सरकार समर्थकों ने अपना गुस्सा लेबनान की सेना पर निकालते हुए आरोप लगाया कि वह सरकार की मदद करने की जगह तटस्थ बनी रही। लेबनान की सेना ने इन झड़पों में भाग नहीं लिया, परन्तु संघर्षरत दस्तों के बीच शांति स्थापना के लिए हस्तक्षेप किया। अंतत: सेना ने सिनोरिया सरकार के 6 मई के फैसलों को निरस्त कर शांति बहाल की। लेबनान की सिनोरिया सरकार द्वारा सेना तथा हिजबुल्ला के बीच गृह युद्ध भड़काने की साजिश विफल हो गयी। इजराईली हमले में लेबनानी सेना की निष्क्रियता की पक्षार सिनोरिया सरकार सेना को हिजबुल्ला के खिलाफ युद्ध में उतारना चाहती थी। सिनोरिया सरकार समर्थक पार्टियों में सबसे बड़े घटक के नेता साद हरीरी (पूर्व प्रधानमंत्री रफीक हरीरी के पुत्र) एक बड़ी निर्माण कम्पनी के मालिक हैं जिसकी गणना दुनिया की 500 सबसे बड़ी कम्पनियों में होती है। शायद इजराईल द्वारा विवंस में उन्हें अपने कारोबार के बेहतर अवसर नजर आये हों !
हिजबुल्ला के खिलाफ सिनोरिया सरकार के `युद्ध‘ का हिस्सा न बनकर लेबनान की सेना ने जनता में अपनी प्रतिष्ठा को बढ़ाया। साथ ही, सिनोरिया सरकार को समझौते के लिए भी बाध्य किया। 2006 में इजराईली हमले के बाद से लेबनान की जनता में हिजबुल्ला की प्रतिष्ठा बढ़ी है। 9 मई की घटनाओं तथा इससे पूर्व विपक्षी दलों के विरोध–प्रदर्शनों ने साबित कर दिया कि लेबनान की जनता का बड़ा हिस्सा हिजबुल्ला व उसके सहयोगी विपक्षी दलों का समर्थन कर रही है। उसके सहयोगियों का समर्थन शियाओं तक सीमित नहीं है जैसा कि साम्राज्यवादी मायम प्रचार करते हैं, बल्कि सभी समुदायों के लोग उनके साथ हैं। इसीलिए सिनोरिया सरकार फिर से चुनाव कराने की मांग को अस्वीकार करती रही है।
12 मई को कतार में हुए समझौते के तहत सेनायक्ष माइकेल सुलेमान को राष्ट्रपति चुनने का रास्ता साफ हो गया। समझौता का सबसे महत्वपूर्ण पहलू हिजबुल्ला तथा सहयोगियों की यह मांग स्वीकार किया जाना है कि उन्हें कैबिनेट में एक तिहाई से अधिक प्रतिनिधित्व मिले ताकि महत्वपूर्ण फैसले उनकी सहमति के बिना न किये जा सकें। कैबिनेट में 30 स्थानों में से 16 स्थान शासक गठबंधन को, 11 स्थान हिजबुल्ला तथा सहयोगी पार्टियों को तथा 3 स्थान राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत सदस्यों के लिए रखे गये हैं। समझौते में घरेलू विवादों में सशस्त्रा बलों के इस्तेमाल की मनाही है, परन्तु अमेरिका तथा उसके पिट्ठुओं की हिजबुल्ला के निशस्त्रिकरण की मांग का जिक्र नहीं है। भविष्य में चुनाव प्रणाली को जनसंख्या के अनुरूप बनाने की विपक्ष की मांग भी सिद्धांतत: स्वीकार कर ली गई है। कुल मिलाकर सिनोरिया सरकार को अपने युद्ध की विफलता की कीमत चुकानी पड़ी है।
हिजबुल्ला ने एक तरफ इजराईल के खिलाफ सशस्त्र बल को मजबूत किया, साथ ही चुनावों के जरिये लेबनान की राजनीति में सार्थक हस्तक्षेप का रास्ता अपनाया। इजराईल की हमलावर कार्रवाईयों के खिलाफ इनके नेतृत्व में सशक्त प्रतिरोध ने लेबनान की जनता में इनकी जड़ें गहरी की तथा लेबनान के अमेरिकी साम्राज्यवाद–विरोधी हिस्सों को एक वृहत मोर्चे में जमा किया। आज हिजबुल्ला व उसके सहयोगी लेबनान में निर्णायक ताकत हैं तथा मध्यपूर्व की राजनीति में हिजबुल्ला एक महत्वपूर्ण कारक बन चुका है।
लेबनान की घटनाएं मध्यपूर्व में अमेरिकी साम्राज्यवादी साजिशों को लगा एक और करारा झटका है। 2006 की पराजय के बाद इजराईली हमले की धमकी का असर खत्म हो गया। दरअसल, इराक पर अमेरिकी फौजी कब्जे के खिलाफ इराकी जनता के राष्ट्रीय युद्ध ने अमेरिकी साम्राज्यवाद को उलझा दिया है, उसकी बेलगाम युद्ध–पिपासा पर लगाम लगा दिया है तथा मयपूर्व के अमेरिका–परस्त शासकों की भूमिका को बढ़ा दिया है। अमेरिका की सऊदी अरब, खाड़ी देशों, मिस्र, जॉर्डन के तानाशाहों पर निर्भरता बढ़ी है। अगर अमेरिकी राष्ट्रपति बुश अब ईरान के खिलाफ कूटनीतिक तरीकों पर जोर दे रहे हैं तथा `एकतरफा‘ तरीके को छोड़कर यूरोप के साम्राज्यवादी सहयोगियों के साथ मिलकर चलने की बात कर रहे हैं तो इसका बड़ा श्रेय इराक व अफगानिस्तान की आजादी–परस्त जनता के बहादुराना राष्ट्रीय युद्धों को है। पिछले वर्षों के घटनाक्रम ने स्पष्ट किया है कि तीसरी दुनिया के उत्पीडि़त राष्ट्रों की जनता साम्राज्यवाद, विशेषकर अमेरिकी साम्राज्यवाद, के खिलाफ संघर्ष में अग्रणी भूमिका निभा रही है।
लेबनान में अमेरिकी मंसूबों को मिले करारे झटके से सीरिया को अलग–थलग करने के प्रयासों को धक्का लगा है। इजराईली शासकों ने तुर्की के शासकों के मायम से सीरिया में `शांति वार्ता‘ के लिए सम्पर्क स्थापित किया है।
मध्यपूर्व वास्तव में उथल–पुथल के दौर में है जिसके केन्द्र में फिलीस्तीनी जनता का राष्ट्रीय संघर्ष है। यदि अमेरिका तथा इजराईल के शासक फिलीस्तीनी जनता की राष्ट्रीय आकांक्षाओं का सम्मान कर न्यायसंगत समझौते के लिए तैयार नहीं होते तो अरब जनता का संघर्ष उन्हें आक्रामक रवैया छोड़ने को बाध्य करेगा जैसा कि लेबनान में सिनोरिया सरकार को करना पड़ा।